यूपी में बड़ी जीत के बड़े मायने

Navodayatimesउत्तर प्रदेश चुनाव परिणाम भारतीय जनता पार्टी के एक बड़ी सफलता तो है हीं, साथ में यह सालों पहले से चली आ रही जाति आधारित मतदान प्रक्रिया और सांप्रदायिक राजनीति को भी नई दिशा देने वाली रही है। हालांकि, इसे सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय के नाम पर की जा रही बंटवारे की राजनीति के खिलाफ अंतिम जीत नहीं कही जा सकती है लेकिन इसे उन लोगों के खिलाफ एक लोकप्रिय जनादेश तो जरूर कह सकते हैं।

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अगर इस हार से ऐसे नेता सीख नहीं लेते तो यह उनके लिए बहुत गंभीर बात होगी। सामाजिक मुद्दे केवल जाति और धर्म से संबंधित नहीं होते हैं। जो राजनीतिक दल और नेता इसे नहीं समझ पा रहे हैं, उन्हें ऐसे हीं हार का सामना करना पड़ेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि नरेंद्र मोदी का करिश्मा, अमित शाह की रणनीति, भाजपा के विकास का एजेंडा और इसके द्वारा भ्रष्टाचार मुक्त शासन के लिए किए गए गंभीर प्रयासों का इस चुनाव के ऊपर काफी प्रभाव पड़ा है, लेकिन अगर किसी पार्टी को इतनी बड़ी जीत मिलती है, तो इसका कारण इस सामान्य कारणों से कुछ अलग होता है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि विपक्षी दलों द्वारा एक चुनी गई सरकार का इस तरह से विरोध करना लोगों को स्वीकार नहीं है। यूपी के लोगों ने यह अनुभव किया कि विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के विकास के एजेंडे को भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। असहिष्णुता का मुद्दा से लेकर पुरस्कार वापसी के मामलों ने लोगों के अंदर विपक्षी दलों के लिए नकारात्मक भावना पैदा किया, तो दूसरी ओर भारतीय एकता-अखंडता के नाम पर किए गए सर्जिकल स्ट्राइक और भ्रष्टाचार को खत्म करने के  मकसद से किया गया नोटबंदी का फैसला लोगों को सरकार की नियत के प्रति आश्वस्त किया।   

बसपा सुप्रीमो मायावती ने जिस आधार पर इवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया है, अगर वह आधार सही है तो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ये लोग इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि लोग सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर भी वोट दे सकते हैं। इसका मतलब यह भी है कि इन लोगों ने तय कर लिया था कि सांप्रदायिकता का डर दिखाकर तथा फतवा आदि से ही इस समुदाय का वोट लिया जा सकता है और उसे विकास की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

लेकिन, मायावती की रणनीति विफल रही और वे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी जीत नहीं पाईं। दूसरी ओर मुस्लिम को बिना उम्मीदवार बनाए भारतीय जनता पार्टी को उन क्षेत्रों में जीत हासिल हुई। इससे एक स्तर पर यह साबित होता है कि  पार्टी उसके साथ, उसके बिना और उससे घृणा करके भी सत्ता में आ सकती है। 

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इसी रणनीति के तहत भाजपा इतने सालों से गुजरात में शासन कर रही है। दूसरे धर्मनिरपेक्ष गठबंधन जहां 20 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के वोट पाने के लिए प्रयास कर रहे थे, भाजपा ने उसे उपेक्षित किया और सोशल इंजीनियरिंग के दम पर इतनी बड़ी जीत हासिल की। हालांकि, यह परिणाम न तो मुस्लिमों लिए बहुत अच्छी है और नहीं ही भारत के समेकित धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राजनीति के लिए। लोकतंत्र में आपसी सहमति और रुचि के मुद्दों को अनुबंध, बातचीत एवं आगे बढऩे के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है। इसे न तो अलगाव और न हीं अस्वीकृति के आधार पर लम्बे समय तक चलाया जा सकता है। 

देखा जाय तो इस चुनाव परिणाम से यह स्पष्ट हो गया है कि अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति से इसके विरोध में ध्रुवीकरण भी होता है। दूसरी ओर इसके कारण अल्पसंख्यकों का राजनीति में प्रतिनिधित्व भी कम हो जाता है। इसलिए भाजपा और मुस्लिम को गंभीरता से इसके ऊपर बात करनी चाहिए और एक -एक नतीजा पर पहुंचना चाहिए। पिछले कुछ सालों से विकास की राजनीति ने अपनी एक नई पहचान बनाई है। इसने युवाओं को जाति से ऊपर उठकर विकास की ओर जाने के लिए एक आधार उपलब्ध कराया है। हालांकि, अखिलेश चुनाव हार गए लेकिन मोदी और अखिलेश दोनों ने हीं विकास की राजनीति को हवा दी थी एवं अपनी ओर आकर्षित किया। 

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इस चुनाव परिणाम ने जातीय समीकरण को भी नए तरह से परिभाषित किया है और एक जाति विशेष के आधिपत्य वाली पार्टी को नकार दिया है। यादव-मुस्लिम समीकरण के आधार पर दूसरी ओबीसी जातियों के वोट लेने वाले पार्टी को भी इससे सबक लेना चाहिए क्योंकि वे अब किसी ऐसी पार्टी के साथ नहीं रहना चाहते, जिसमें उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम हो। यह समय है राजनेताओं के लिए इस मुद्दे पर विचार करने का। इसलिए अब राजनेताओं को जाति और संप्रदाय के आधार पर की जाने वाली राजनीति से इतर विकास की राजनीति करने की सोचनी चाहिए। 

मिहिर भोले

                                                                                                                                         

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