Blog: झटकों के बाद कितना बदला है हिंदू धर्म!

Navodayatimes नई दिल्ली/शंभूनाथ शुक्ल। ठीक 61 वर्ष पहले हिंदू धर्म को सबसे बड़ा झटका तब लगा था जब आज के ही रोज 1956 में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने अपने दस लाख अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया था। नागपुर की बौद्ध दीक्षाभूमि पर श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु महास्थिवर बोधानंद की उपस्थिति में डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के साथ लगभग पांच लाख लोग परम्परागत हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म की नई शाखा ‘नवयान’ में चले गए। इसके अगले ही रोज अम्बेडकर क्रमश: तीन लाख और दो लाख अन्य दलितों को बौद्ध धर्म के नवयान में लाए थे।

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यह दीक्षा उन्होंने स्वयं दी थी। बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर ने दलितों के इस धर्मान्तरण को बौद्धों का ‘नवयान’ बताते हुए कहा था कि हमारे द्वारा स्वीकर किया गया यह बौद्ध पंथ पुराने बौद्ध पंथों- बज्रयान और महायान से पूर्णतया भिन्न है। हम लोग परम्परागत बौद्धों की कर्म और पुनर्जन्म की थ्योरी को नहीं मानते न आगे मानेंगे।

हिंदू धर्म के ज्ञात इतिहास में यह हिंदू धर्म और समाज को सबसे बड़ा झटका था। एक साथ दस लाख लोगों के हिंदू धर्म छोडऩे की घटना पहले कभी नहीं घटी। पर हिंदुओं की दिक्कत यह थी कि वे कुछ कर भी नहीं सकते थे क्योंकि, हिंदू धर्म के पुरोहित वर्ग ने इस धर्म को बंधनों से ऐसा जकड़ दिया था कि इन बंधनों को तोडऩा मुश्किल था।

हालांकि, डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर इस घटना के 20 वर्ष पहले ही कह चुके थे कि वे अब हिंदू रहकर नहीं जीना चाहते। उनकी इस घोषणा के बाद मुस्लिम, ईसाई, सिखों और बौद्धों ने उनको अपने-अपने पाले में लाने की कोशिश की थी लेकिन अम्बेडकर ने पूरे बीस साल इस चिंतन में लगाए कि कौन-सा धर्म दलितों के लिए अधिक उपयोगी रहेगा।

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22 मई 1936 को लखनऊ में एक सर्वधर्म सभा हुई थी, उसमें मुस्लिम, ईसाई, सिखों और बौद्धों के प्रतिनिधि आए थे साथ ही कई जाने-माने दलित राजनेता भी। इस सभा में प्रसिद्ध कांग्रेसी दलित नेता जगजीवन राम भी गए थे लेकिन डॉक्टर अम्बेडकर इस सभा में नहीं गए। सभी ने दलितों को अपने पाले में लाने के कोशिश की लेकिन चूंकि अम्बेडकर ने किसी भी धर्म के बारे में कुछ नहीं कहा, इसलिए दलित चुप रहे। कुछ दिनों बाद दस जून को वह एक इटैलियन बौद्ध संत लोकनाथ डॉक्टर अम्बेडकर से मिलने उनके मुंबई स्थित आवास पर भी गए लेकिन डॉक्टर अम्बेडकर ने अगले 20 वर्षों तक कोई फैसला नहीं किया।

डॉक्टर अम्बेडकर के इस फैसले के पीछे पिछले कई वर्षों से चले आ रहे दलित आंदोलन को भी समझना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में स्वामी अछूतानंद परिहार ने सबसे पहले दलित आंदोलन शुरू किया था। यद्यपि वे स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन से उभरे थे और 1905 से 1912 तक वे आर्य समाज से जुड़ रहे। किंतु अछूतों के प्रति आर्य समाज की हीला-हवाली से नाखुश होकर उन्होंने आदि-धर्म आंदोलन चलाया और भारतीय अछूत महासभा का गठन किया। आदि धर्म आंदोलन एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन था और प्राचीन भारत की सांस्कृतिक और नस्लीय पहचान से अपने को जोडऩे लगा।

इनका मानना था कि दलित और आदिवासी ही भारत के मूल निवासी हैं, इनके अलावा बाकी लोग बाहर से आए हुए हैं। उसी समय बाबू मंगूराम ने पंजाब में भी एक ऐसा ही आंदोलन शुरू किया। हालांकि वे गदर पार्टी से जुड़े रहे थे। 1909 में वह अमरीका चले गए थे और वहां कैलिफोर्निया में नौकरी करने लगे। वहीं, पर बाबू मंगूराम गदर पार्टी से जुड़े और भारत से अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने की नीयत से वे भारत में क्रांतिकारियों की मदद के लिए हथियार भेजने लगे थे। 1925 में वे दलित आंदोलन की तरफ मुड़े और आदि डंका साप्ताहिक का प्रकाशन भी शुरू किया। पर वे इसे बहुत आगे नहीं बढ़ा पाए तथा अम्बेडकर के आंदोलन की तरफ मुड़ गए। इन सारे दलित आंदोलनों के पीछे दलितों/अछूतों की अपनी पीड़ा थी।

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वे हिंदू समाज के अंदर अपनी स्थिति से उबर नहीं पा रहे थे। भले उनके पास पैसा आ गया लेकिन वृहत्तर ङ्क्षहदू समाज उन्हें उनका सम्मान और बेहतर पहचान देने को राजी नहीं था। इसलिए उन्हें लगने लगा कि हिंदू समाज को छोड़े बिना उनकी मुक्ति संभव नहीं। उधर, बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर सारे धर्मों के दर्शन और उनके व्यावहारिक पक्ष का अध्ययन कर रहे थे। उनका मन बार-बार बौद्ध धर्म की ओर खिंच रहा था। दो वजहें थीं।

एक तो बौद्ध धर्म मूल रूप से भारत से ही उपजा था और इसी ने सबसे पहले अलौकिकता को छोड़ा और धर्म को मनुष्य मात्र के लिए ग्राह्य बनाया। बुद्ध ने ही सबसे पहले कहा था धर्म एक साधन है वह साध्य नहीं है। तभी डॉक्टर अम्बेडकर ने बुद्धचर्या में बुद्ध के उपदेशों को पढ़ा। उसी में एक उपदेश था कि एक बार भगवान बुद्ध से उनके प्रिय शिष्य आनंद ने पूछा कि भगवान यदि मार्ग कंटकाकीर्ण (कांटों से भरा) हो और उस मार्ग से गुजरना जरूरी तो क्या करना चाहिए।

भगवान बुद्ध ने जवाब दिया कि दो उपाय हैं आनंद। या तो उन कांटों को एक-एक कर हटाते हुए रास्ता पूरा करें मगर इसमें समय बहुत लगेगा। दूसरा उपाय है कि जूते पहनकर उन कांटों के ऊपर से निकल जाया जाएं। इसमें समय व्यर्थ नहीं जाएगा। बस डॉक्टर अम्बेडकर को यही उपाय सूझ गया कि अगर दलितों को सम्मान से जीना है तो हिंदू धर्म उन्हें छोडऩा ही पड़ेगा और इसके लिए बुद्ध का बताया रास्ता ही सर्वोत्तम है। 

डॉक्टर अम्बेडकर के जाने के बाद असंख्य दलित ‘नवयान’ की तरफ आकर्षित होने लगे। अब तो हिंदू धर्म के धार्मिक पंडितों से लेकर समाज सुधारकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी लगने लगा कि यदि दलितों को न रोका गया तो हिंदू धर्म और समाज की इतनी बड़ी क्षति होगी कि जल्द ही हिंदू इतिहास में विलीन हो जाएंगे। पर राजनीतिक नेतृत्व तो सबसे अधिक लचीला होता है और धार्मिक नेतृत्व थोड़ा कट्टर।

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मगर यह ऐसा झटका था जिसे सब ने महसूस किया और समाज में दलितों की पहचान और सम्मान के लिए उन्हें आरक्षण से लेकर उनके विरुद्ध होने वाले सामाजिक अत्याचार पर नकेल कसी गई। पर इसके बाद आज तक दलितों के अंदर एक कसक बनी हुई है कि हिंदू समाज में उन्हें बराबरी का सम्मान नहीं प्राप्त है।

हालांकि, अंतरजातीय विवाहों और पारस्परिक हेल-मेल ने चीजों को बदला है। पर दलितों को लेकर समाज में एक हिचक है और वह सवर्णों से अधिक उन जातियों में ज्यादा है जिन्हें पिछड़ी और मध्यवर्ती जातियां कहा जाता है। इसके पीछे राजनीति और राजनेता हैं। सत्य तो यह है कि जब तक जातीय राजनीति का ध्रुवीकरण बंद नहीं होगा तब तक हर जाति अपने-अपने खांचे में बनी रहेगी।

हिंदुओं की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वे जाति से नहीं उबर पा रहे। एक पक्ष सुधरता है तो दूसरा पक्ष तलवार तान लेता है। आज हिंदुओं को गौर करना होगा कि वे जाति की दीवार तोड़कर सामाजिक और धार्मिक गैरबराबरी को समाप्त करें। तब ही भविष्य के झटकों से वे मुक्त हो पाएंगे।

दलित आंदोलन की शुरुआत
अछूतानंद परिहार ने सबसे पहले दलित आंदोलन शुरू किया था। यद्यपि वे स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन से उभरे थे और 1905 से 1912 तक वे आर्य समाज से जुड़ रहे। 

बौद्ध धर्म के ‘नवयान’ में  आए दलित
नागपुर की बौद्ध दीक्षाभूमि पर श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु महास्थिवर बोधानंद की उपस्थिति में डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के साथ लगभग पांच लाख लोग हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म की नई शाखा ‘नवयान’ में चले गए।

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