Tuesday, Jan 23, 2018

ब्लॉग: पूर्व नाजी यातना शिविर में नग्न वीडियो के फिल्मांकन विरुद्ध आक्रोश

  • Updated on 12/6/2017

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। कला निकाय द्वारा नाजियों के पूर्व यातना शिविर में एक गैस चैम्बर में नग्न पुरुषों और महिलाओं को ‘गेम आफ टैग’ खेलते दिखाने से इस यातना भरे दौर में से जिंदा बचे लोगों के समूहों में घोर आक्रोश भर गया है।
इस वीडियो का फिल्मांकन पोलैंड के शहर ग्डांस्क के निकट स्टटथोव यातना शिविर में किया गया था और इसे 2015 में क्राकोव  के समकालीन कलासंग्रहालय में प्रदर्शित  किया गया। इसमें मुट्ठी भर पुरुषों और महिलाओं को उस पूर्व यातना शिविर के गैस चैम्बर के चारों ओर एक-दूसरे का नग्नावस्था में पीछा करते दिखाया गया है जहां नाजियों द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध दौरान लगभग 65 हजार लोगों की हत्या की गई थी। मरने वालों में अधिकतर लोग यहूदी थे और यातना तथा नरसंहार के उस दौर को ‘होलोकास्ट’ के नाम से जाना जाता है।

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इस होलोकास्ट में से जो किसी तरह जिंदा बचे वे पोलैंड के राष्ट्रपति आंद्रेइ ड्यूडा से स्पष्टीकरण मांग रहे हैं कि इस जगह पर फिल्मांकन करने  की अनुमति क्यों दी गई। उल्लेखनीय है कि इस वीडियो को एक कला अवस्थापना के रूप में एक प्रदर्शनी में दिखाया गया। इस प्र्रदर्शनी का नाम था-‘‘पोलैंड-इसराईल-जर्मनी: आस्विट्ज के अनुभव’’ और जोरदार विरोध प्रदर्शनों के बाद इसे हटा दिया गया था। उस समय संग्रहालय में उस स्थान का खुलासा नहीं किया गया था जहां वास्तव में वीडियो का फिल्मांकन हुआ था। 

इसराईल स्थित ‘आर्गेनाइजेशन आफ होलोकास्ट सर्वाइवर्ज’, ‘सिमोन वीसैंथल सैंटर’ तथा अन्य कई गुटों द्वारा इस सप्ताह जब राष्ट्रपति ड्यूडा से मुलाकात की गई तो यह खुलासा हुआ कि वीडियो का फिल्मांकन स्टटथोव  यातना शिविर के खंडहरों में किया गया था। उल्लेखनीय है कि इस समाचार से कुछ ही सप्ताह पूर्व यह खबर आई थी कि स्टटथोव के 2 पूर्व गार्डों पर द्वितीय विश्व युद्ध दौरान यातना शिविर में हुई हत्याओं में संलिप्तता का आरोप लगा है।

इनमें से एक बोर्कन में रहने वाला 93 वर्षीय वृद्ध है जो जून 1942 से सितम्बर 1944 तक की अवधि में यातना शिविर में तैनात रहा था, जबकि दूसरा वुप्परतल का रहने वाला 92 वर्षीय बुजुर्ग है जो जून 1944 से मई 1945 तक इस यातना शिविर में तैनात रहा था। दोनों ने ही कहा है कि शिविर में होने वाली हत्याओं की उन्हें कोई जानकारी ही नहीं थी। 

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उल्लेखनीय है कि यहां मौत के शिकार हुए 65 हजार लोगों में से कुछ लोगों की गोली मार कर हत्या की गई थी जबकि कुछेक को गैस चैम्बरों में भून दिया गया था, जबकि अन्य या तो कुषोपण के कारण मौत का शिकार हुए या फिर ठंड के कारण मर गए। जर्मन पुलिस ‘एस.एस.’ ने 1944 में इस यातना शिविर में पोलैंड के 100 से अधिक नागरिकों तथा 70 सोवियत युद्ध बंदियों की हत्या की थी। 1944 के अंत में यहूदियों की अज्ञात संख्या को गैस चैम्बरों में भून दिया गया था। जून 1944 और अप्रैल 1945 के बीच एस.एस. के एजैंटों ने कई सौ यहूदियों को गर्दन के पीछे गोली मारकर मारा था। 

उल्लेखनीय है कि शिविर में तैनात एस.एस. के डाक्टरों और नर्सों ने 140 से अधिक लोगों की हत्या की थी जिनमें से अधिकतर यहूदी और बच्चे थे। 1942 के अंत से लेकर 1944 के अंत तक ये हत्याएं उनके दिल में गैसोलीन तथा फिनोल के इंजैक्शन लगाकर की गई थीं। सोवियत सेना ने 9 मई 1945 को इस शिविर को नाजियों से मुक्त करवाया था और उसी दिन द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया था। (मे.टु.)

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