शशिकला को सजा : राजनीतिक उथल-पुथल की ओर अग्रसर है तमिलनाडु

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तमिलनाडु में सरकार बनाने का दावा कर रही प्रदेश की दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की सहायक पी.के. शशिकला को सुप्रीमकोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा ने प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। 

इस फैसले का व्यापक रूप में स्वागत हुआ है। इस फैसले ने जहां शशिकला को मुख्यमंत्री बनने से रोक दिया है, वहीं सजा के कारण वह 10 वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगी। इसके अलावा उन्हें 10 करोड़ रुपए जुर्माना भी अदा करना होगा और साढ़े 3 वर्ष सलाखों के पीछे गुजारने पड़ेंगे। (वैसे तो उन्हें 4 वर्ष की सजा हुई है लेकिन 6 माह की सजा वह पहले ही काट चुकी हैं।)

एक सप्ताह पूर्व शशिकला ने मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी ठोंकी थी लेकिन प्रदेश के राज्यपाल सी. विद्यासागर राव ने फैसला लेने में विलम्ब किया था जो सुप्रीमकोर्ट के निर्णय के मद्देनजर बहुत ही न्यायसंगत प्रतीत होने लगा। सामान्य स्थिति में राज्यपाल ने शशिकला के अन्नाद्रमुक विधायक दल की नेता चुने जाने के तत्काल बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी होती।

यहां तक कि जब अस्थायी मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम ने उन्हें सूचित कर दिया कि वह अपना इस्तीफा वापस ले रहे हैं और दोनों दावेदारों के समर्थकों की संख्या को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई थी तो राज्यपाल को उनके शक्ति परीक्षण के लिए तत्काल सदन का सत्र बुलाना चाहिए था। 

इस दायित्व को निभाने में विलम्ब करने और प्रदेश से अनुपस्थित रहने के कारण राज्यपाल को आलोचना का निशाना बनना पड़ा था क्योंकि उनके साथ कोई सम्पर्क साधना मुमकिन नहीं हो रहा था। उन्हें यह स्पष्ट कर देना चाहिए था कि वह फैसले का इंतजार करेंगे क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि इसका आरक्षित फैसला एक सप्ताह के अंदर सुना दिया जाएगा।

यह स्पष्ट था कि राज्यपाल को निर्णय लेने से जो बातें रोक रही थीं उनमें से एक यह थी कि शशिकला के विरुद्ध आय से अधिक सम्पत्तियों का मामला सुप्रीमकोर्ट में अटका हुआ था और इसका निर्णय एक सप्ताह के अंदर सुनाया जाना था। यह मामला 1996 से संबंध रखता है जब जयललिता पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने 3 अन्य सहआरोपियों- शशिकला, शशिकला की भाभी इलावारसी और शशिकला के भतीजे व जयललिता के दत्तक पुत्र वी.एन. सुधाकरण- के साथ साजिश रचकर 66.65 करोड़ रुपए की सम्पत्ति अर्जित की है जोकि उनकी आय के ज्ञात स्रोतों से बेमेल है

। अभियोजक ने कहा था कि जहां जयललिता मुख्य आरोपी है, वहीं अन्य तीनों इस अपराध की साजिश में शामिल हैं क्योंकि वे ही 32 बेनामी प्राइवेट कम्पनियों के मालिक हैं। 

एक विशेष अदालत ने सितम्बर 2014 में इन चारों को भ्रष्टाचार निरोधी अधिनियम एवं भारतीय दंडावली की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत दोषी करार दिया था और जयललिता को 4 वर्ष के साधारण कारावास तथा 1000 करोड़ रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। अन्य तीनों अपराधियों को उनकी तुलना में अल्पकालिक कारावास की सजा सुनाई गई थी और उन में से प्रत्येक को 10 करोड़ रुपए जुर्माना सुनाया गया था।

जयललिता ने सजा सुनाए जाने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और अंतरिम दौर के लिए ओ. पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री मनोनीत किया था। मई 2015 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने चारों ही दोषियों को बरी कर दिया और जयललिता फिर से मुख्यमंत्री के रूप में सत्तासीन हो गईं।

लेकिन कर्नाटक सरकार ने इनकी रिहाई के फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दे दी। गत वर्ष जून में न्यायमूॢत पी.सी. घोष तथा न्यायमूॢत अमिताव राय की खंडपीठ ने इस मामले में अपना फैसला आरक्षित रख लिया और संकेत दिया कि वे फरवरी के तीसरे सप्ताह में फैसला सुनाएंगे। अब चूंकि इस अवधि के दौरान जयललिता का देहावसान हो गया, इसलिए खंडपीठ के फैसले से शशिकला और अन्य दोनों दोषियों पर प्रभाव पडऩा तय था।

शायद शशिकला ने भी मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी ठोंकने का यही समय जानबूझकर चुना था। शशिकला के ऐसा करने का कोई तुक नहीं था क्योंकि उन्हें मुख्यमंत्री पद पर आसीन करने के लिए जनता की ओर से किसी प्रकार की मांग नहीं थी। इसलिए उनकी इस चाल का ‘मुहूर्त’ संदिग्ध था। 

यह स्पष्ट है कि तमिलनाडु राजनीतिक उथल-पुथल की ओर अग्रसर है। बेशक पन्नीरसेल्वम का मुख्यमंत्री बने रहना संभव है तो यह भी स्पष्ट संभावना है कि जिस प्रकार जयललिता ने पन्नीरसेल्वम की नियुक्ति की थी बिल्कुल उसी तर्ज पर शशिकला भी अपने किसी मोहरे को इस पद के लिए नियुक्त कर सकती हैं। शायद वह उचित समय का इंतजार और अपनी सजा के विरुद्ध अपील करना चाहेंगी। दोनों ही परिस्थितियों में वह अपनी पसन्द का व्यक्ति तभी आगे ला सकती हैं यदि विधायकों के बहुमत का समर्थन वह अपने साथ रख सकें।

लेकिन नए घटनाक्रमों की रोशनी में तथा विधायकों की और अधिक संख्या का पन्नीरसेल्वम की ओर झुकना संभव है क्योंकि कई सांसदों का समर्थन उन्हें पहले ही मिल चुका है। फिर भी पन्नीरसेल्वम इस समर्थन पर अधिक इतरा नहीं सकते क्योंकि वह जयललिता जैसे करिश्माई नेता नहीं हैं। इसलिए उन्हें लगातार दबाव का सामना करना पड़ेगा जिसके चलते राजनीतिक अस्थिरता की संभावना भी बनी रहेगी।
 

-विपिन पब्बी

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