हॉल ऑफ नेशन को संरक्षित रखने की मांग वाली याचिका खारिज

Navodayatimesनई दिल्ली/ब्यूरो। दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने प्रगति मैदान में ‘हॉल ऑफ नेशंस’ को तोड़े जाने की प्रक्रिया शुरू होने से एक दिन पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने भवन के शिल्पकार की इसे संरक्षित रखने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी।

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अदालत ने याचिका में कोई दम नहीं होने की बात करते हुए उसे खारिज कर दिया। यह याचिका राज रेवल ने दायर की थी। उन्होंने भवन का डिजाइन तैयार किया था, जिसका निर्माण 1972 में हुआ था। अदालत का फैसला धरोहर इमारतों की रक्षा के लिए गठित हेरिटेज कंजर्वेशन कमिटी (एचसीसी) के फैसले पर आधारित है। एचसीसी ने कहा था कि सिर्फ 60 साल या उससे अधिक पुरानी इमारतों को धरोहर के दर्जे के लिए विचार किया जाएगा।

हॉल ऑफ नेशंस प्रगति मैदान के दिल्ली प्रदर्शनी मैदान में स्थित है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हॉल ऑफ नेशंस सिर्फ 45 साल पुराना है और एचसीसी दिशा-निर्देशों के अनुसार विरासत ढांचे के तौर पर विचार किए जाने का हकदार नहीं है। अदालत ने कहा कि चूंकि एचसीसी दिशा-निर्देशों को चुनौती नहीं दी गई है, इसलिए वास्तुकार को ढांचे की रक्षा की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। ये दिशा-निर्देश इस साल फरवरी में तैयार किए गए थे।

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अदालत ने यह भी कहा कि वास्तुकार ने दिल्ली शहरी कला आयोग के तीन मार्च के फैसले को चुनौती नहीं दी थी, जिसने एकीकृत प्रदर्शनी केंद्र के लिए योजना को मंजूरी दी थी, जो प्रगति मैदान में बनेगा। अदालत ने हालांकि कहा कि उसका फैसला वास्तुकार को कॉपीराइट अधिनियम के तहत कोई भी राहत मांगने से नहीं रोकेगा। उसके तहत किसी कलाकृति में संशोधन किया जाता है या उसे विकृत किया जाता है तो वह क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है।

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