दिल्ली की तुलना में मुंबई नगर निगम क्यों है बेहतर, जानिए

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नई दिल्ली/टीम डिजिटल।  राजधानी में गर्मी की शुरूआत हो गई है तो, दूसरे तरफ 23 अप्रैल को दिल्ली में नगर निगम चुनाव होने जा रहा है। ऐसे में सभी दलों द्वारा किए जा रहे चुनावी वादों से यह उम्मीद किया जा सकता है कि इस बार के चुनाव परिणाम दिल्ली की जनता के जीवन को बेहतर बना सकते हैं।  

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कैसे पूरा करेंगे नेता अपने वादे

हालांकि चुनाव प्रचार में किसी दल द्वारा यह साफ नहीं किया गया है कि यह वादे पूरे करने के लिए उनके पास फंड कहां से आएगा। जैसा की दिल्ली की जनता को पता है कि तीनों नगर निगम एक पुरानी नकदी की कमी के कारण जूझ रहे हैं जिसकी वजह से कर्मचारी हड़ताल करने के लिए मजबूर हैं। वहीं, दूसरी तरफ डेंगू समेत अन्य बीमारियों के प्रकोप और सिविक सेवाएं जांच ने के प्रयासों को नाकाम कर दिया है।

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बता दें कि वित्त वर्ष 2014-15 में दिल्ली के नगर निगमों का कुल बजट 9551 करोड़ रुपये था। दिल्ली की आबादी को देखते हुए यह राशि 5340 रुपये प्रति व्यक्ति हुई। नगरनिगम के बजट की करीब 40 प्रतिशत राशि कर्मचारियों, पार्षदों की तनख्वाह और दफ्तर खर्च देने में खर्च हुई। कूड़ा उठाने, सफाई करे इत्यादि पर प्रति व्यक्ति केवल 1258 रुपये खर्च हुआ । स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े मदों में प्रति व्यक्ति खर्च केवल 758 रुपये रहा।

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दिल्ली की मुंबई नगर निगम से तुलना

वित्त वर्ष 2016-17 में बीएमसी का सालाना बजट 37,052 करोड़ रुपये था। यानी बीएमसी का सालाना बजट दिल्ली नगर निगमों के संयुक्त बजट से पांच गुने से भी ज्यादा है। बीएमसी दिल्ली की तुलना में स्वास्थ्य मद में तीन गुना ज्यादा और शिक्षा मद में दो गुना ज्यादा प्रति व्यक्ति खर्च करता है। बता दें कि बीएमसी में रहने वालों की आबादी दिल्ली की तुलना में काफी कम है।

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दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश होने के कारण यहां के नगर निगम बीएमसी की तरह चुंगी कर, विकास कर और संपत्ति कर इत्यादि नहीं लेता। दिल्ली नगर निगमों की करीब 40 प्रतिशत आय राज्य सरकार के अनुदानों से होती है। मुंबई में जल आपूर्ति से बीएमसी को अच्छी कमायी होती है। दिल्ली में जल आपूर्ति के लिए अलग विभाग है।

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पूरे सेट अप को बदलने की जरूरत

राजधानी में नगर पालिकाओं के लिए संसाधन संपन्न बनने के लिए या तो दिल्ली में पूरे सेट अप को बदलने की जरूरत है या तो उन्हें अधिक अनुदान देना होगा। यह महत्वपूर्ण तथ्य  निश्चित रूप से मतदाताओं को लुभाने वाले राजनीतिक नेताओं के दिमाग में नहीं आते हैं।

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