गुरदासपुर चुनाव: EC स्वीकार करे नरेन्द्र मोदी की चुनौती

Navodayatimesसंसदीय उपचुनाव में कई पोलिंग बूथ्स पर केवल 30 प्रतिशत मतदान हुआ यानी 70 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट ही नहीं डाला। कुल 56 प्रतिशत मत डले। क्यों? इसलिए कि 6 महीने पहले ही तो लोगों ने वोट डाले थे। 3 साल पहले लोकसभा के चुनाव हुए। ऊपर से हिमाचल के चुनाव की घोषणा कर दी। गुजरात विधानसभा का चुनाव होगा। इसके बाद जनता को कर्नाटक का रुख करना पड़ेगा। जनता ने अभी उत्तराखंड, यू.पी., पंजाब, गोवा और मणिपुर विधानसभाओं के चुनाव देखे थे। हिमाचल, गुजरात और कर्नाटक के चुनावों के बीच ही कहीं पंजाब सरकार 4 महानगरों के निकाय चुनाव शुरू करवा देगी।  

यह कैसा देश है कि चुनावों का सिलसिला 12 महीने चलता ही रहता है। ई.वी.एम्ज कभी इस स्टेट तो कभी उस स्टेट में घूमती रहती हैं। कर्मचारी बेचारे थैले और मतपेटियां उठाए कभी इस राह, कभी उस राह। कोड ऑफ कंडक्ट से न जनता को राहत, न सरकारों को फुर्सत। ऐसे में मतदाता सोचने लगा है, ‘‘छोड़ो यार क्या वोट डालना, रोज ही तो वोट पड़ते हैं।’’ ऐसी ही प्रवृत्ति गुरदासपुर संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं में देखी गई।

शायद यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाना चाहतेे हैं। चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री की इस चुनौती को स्वीकार भी कर लिया परन्तु नीति आयोग का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में ऐसा कर पाना संभव नहीं। मैं हैरान हूं कि 5 विधानसभाओं के चुनाव 2017 में, 13 के 2018 में, 9 के 2019 मेें, एक का चुनाव 2020 में और शेष विधानसभाओं के चुनाव 2021 में होने हैं। चुनावी सिलसिला खत्म ही नहीं होता।
सोचना चुनाव आयोग ने है कि अगर लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाते हैं तो इसके परिणाम क्या होंगे?  उन विधानसभाओं का क्या होगा जिनका 5 साल का कार्यकाल चुनाव के समय पूरा नहीं हुआ? क्या सरकार भंग होने वाली विरोधी पाॢटयों की सरकारों को मना पाएगी? क्योंकि विरोधी दल समय से पहले विधानसभाओं को भंग नहीं करने देंगे।

1967 तक तो लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही हुआ करते थे। समस्या तब खड़ी हुई जब दुर्भावना से अनुच्छेद 356 के तहत कुछ विधानसभाएं भंग कर दी गईं। इन्हीं दुर्भावनाओं से देश रोज चुनावों की गिरफ्त में है। एक साथ चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग ने 12000 करोड़ रुपए केन्द्र सरकार से मांगे हैं परन्तु उसे अभी तक केवल 3400 करोड़ रुपए ही उपलब्ध हुए हैं। चुनाव एक साथ करवाने के लिए चुनाव आयोग को 40 लाख ई.वी.एम्ज चाहिएं। 
लॉ कमीशन भी चाहता है कि चुनाव संबंधी सुधार किए जाएं। संसद की स्टैंङ्क्षडग कमेटी फार पर्सन एंड पब्लिक ग्रीवैंसिस और लॉ एंड जस्टिस कमेटी ने भी कहा है कि देश में चुनाव 5 सालों में सिर्फ एक बार होने चाहिएं। इसके लिए केन्द्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172 और 174 में संशोधन करना होगा। मोदी सरकार इतना काम तो आसानी से कर ही सकती है। 

रोज-रोज के चुनावों से मतदाता आजिज हो चुका है। चुनाव आयोग यह तो सोच ले कि देश का कितना पैसा नित-नित के चुनावों में खर्च हो रहा है। जन-धन की हानि हो रही है। चुनाव आयोग ने एक पाॢलयामैंट हलके में चुनावी खर्च की सीमा 70 लाख रुपए रखी है और खर्च आता है 70 करोड़ रुपए। यह पैसे की बर्बादी कैसे रुकेगी? चुनाव के दौरान शराबबंदी का तो ऐलान होता है पर सप्ताह भर जो शराब की नदियां बहती हैं, उन्हें चुनाव आयोग ने नहीं देखा? अत: मेरा चुनाव आयोग, केन्द्र सरकार तथा राजनीतिक दलों से निवेदन है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ और 5 साल में सिर्फ एक बार करवाने के लिए एकजुट हों।

इससे  मतदाताओं में ऊर्जा आएगी, सरकारों का वित्तीय और प्रशासनिक बोझ घटेगा, बार-बार के कोड ऑफ कंडक्ट से सरकारें बचेंगी, सरकारों, उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों की सिरदर्दी खत्म होगी, राजनीतिक दल चुनावी घोषणा पत्रों को पूरा करने में आनाकानी नहीं कर सकेंगे तथा चुनाव आयोग अपनी कार्यप्रणाली को उत्तरदायी बना सकेगा। 

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।

FacebookGoogle+TwitterPinterestredditDigglinkedinAddthisTumblr