जीवन की संध्या: बेटे को मृत देह छूने से रोकने के लिए वृद्ध मां ने अपनी देह ही कर दी दान

जीवन की संध्या: बेटे को मृत देह छूने से रोकने के लिए वृद्ध मां ने अपनी देह ही कर दी दान

प्राचीन काल में माता-पिता के एक ही आदेश पर संतानें सब कुछ करने को तैयार रहती थीं पर आज जमाना बदल गया है। बुढ़ापे में जब बुजुर्गों को बच्चों के सहारे की सर्वाधिक जरूरत होती है, अपनी गृहस्थी बस जाने के बाद अधिकांश संतानें बुजुर्गों से उनकी जमीन-जायदाद अपने नाम लिखवाकर  उनसे आंखें फेर कर उन्हें अकेला छोड़ देती हैं। 

अक्सर मेरे पास ऐसे बुजुर्ग अपनी पीड़ा व्यक्त करने आते रहते हैं जिनकी दुख भरी कहानियां सुन कर मन द्रवित हो उठता है। इसी सिलसिले में उक्त कथन की पुष्टिï करने वाला एक बहन का पत्र हमें हाल ही में मिला है जिन्होंने अपना नाम और पता नहीं लिखा और वह लिखती हैं : 

‘‘मैं ‘जीवन की संध्या’ के अंतर्गत लिखित आपके लेख हमेशा पढ़ती हूं और आज मैं अपनी कालोनी की एक आंटी की व्यथा आपसे सांझी करना चाहती हूं। गिद्दड़बाहा की रहने वाली यह आंटी एक करोड़पति घराने से संबंध रखती हैं तथा सवा-डेढ़ साल से अपनी बेटी के घर में ही रह रही हैं।

‘‘उनका एक बेटा और एक बेटी है। पांच साल पूर्व उनके पति की मृत्यु के 2 महीने बाद ही उनके बेटे ने सारी जायदाद अपने नाम करवा ली। आंटी कुछ बोल नहीं सकीं क्योंकि उन्हें डर था कि अगर उन्होंने बेटे की बात न मानी तो फिर उन्हें कौन संभालेगा और यह बेटा भी तंग करेगा।

‘‘परंतु सम्पत्ति अपने नाम करवाने के अगले दिन ही बेटे और बहू का रवैया बदल गया। बेटे और बहू ने शारीरिक और मानसिक रूप से उन्हें 3-4 साल बहुत तंग किया और जब आंटी से अपना अपमान और उत्पीडऩ सहन न हो सका तो उनकी बेटी उन्हें अपने पास ले आई। 

‘‘उनके बेटे ने धोखे से अपने पिता के झूठे हस्ताक्षर करके स्वयं ही चालाकी से वसीयत तैयार करवाई। वह इस बात को मानता भी है परंतु कहता है कि हिम्मत है तो अदालत में यह बात सिद्ध करके दिखा दो।

‘‘आंटी का कहना है कि उनका बेटा अमीर होने के साथ-साथ उसके अनेक राजनीतिज्ञों से भी संबंध हैं इसलिए वह सच कभी सिद्ध नहीं होने देगा। हालांकि उनकी बेटी उनकी बहुत देखभाल कर रही है फिर भी आंटी अपने घर जाने को बुरी तरह तड़प रही हैं। 

‘‘वह अपने बेटे से अपने रहने के लिए एक कमरा ही मांगती हैं जिसका घर से अलग रास्ता है परंतु बेटा उन्हें वह कमरा देने के लिए भी तैयार नहीं है। उसका कहना है कि ‘इससे मेरे घर का इंटीरियर खराब हो जाएगा।’ 

‘‘आंटी ने मरणोपरांत शरीर दान करने का फार्म भी सिर्फ इसलिए भर दिया है ताकि मरने के बाद उनका बेटा उनकी चिता को आग न दे पाए। इन सब बातों का भी बेटे पर कोई असर नहीं हुआ। 

‘‘सरकार को ऐसे बिगड़ैल बच्चों को सबक सिखाने के लिए अवश्य कुछ कड़े कानून बनाने चाहिएं ताकि जो कुछ इस करोड़पति आंटी के साथ हुआ है वह किसी और मजबूर मां के साथ न हो और किसी मां के दिल से कभी यह फरियाद न निकले कि ‘अगले जनम मोहे बेटा न दीजो’।’’

एक बदनसीब मां की उक्त कहानी निश्चय ही हृदय को द्रवित करने वाली है। वास्तव में ऐसी संतानें बुढ़ापे में मां-बाप को सहारा देने वाली लाठी बनने की बजाय कमर तोडऩे वाली लाठी ही सिद्ध हो रही हैं। 

इसीलिए हम अपने लेखों में यह बार-बार लिखते रहते हैं कि माता-पिता अपनी सम्पत्ति की वसीयत तो अपने बच्चों के नाम अवश्य कर दें परंतु इसे ट्रांसफर न करें। वह अपने बच्चों के साथ ही रहें परंतु छोटी-छोटी बातों के लिए उनकी आलोचना या टोकाटाकी न करें। 

ऐसा करके वे अपने जीवन की संध्या में आने वाली अनेक परेशानियों से बच सकते हैं, परंतु आमतौर पर वे यह भूल कर बैठते हैं जिसका खमियाजा उन्हें अपने जीवन की संध्या में भुगतना पड़ता है।    —विजय कुमार 

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