Tuesday, Jan 23, 2018

स्कूली छात्र ‘पानी’ की बोतलों में ‘शराब’ ले कर जाने लगे

  • Updated on 12/13/2017

समूचे देश में शराब का सेवन लगातार बढ़ रहा है और उसी अनुपात में अपराध भी बढ़ रहे हैं। शराब के दुष्प्रभावों को देखते हुए ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पराधीनता के युग में यह घोषणा की थी कि यदि भारत का शासन आधे घंटे के लिए भी उनके हाथ में आ जाए तो वह शराब की सभी डिस्टिलरियों और दुकानों को बिना मुआवजा दिए ही बंद कर देंगे।
शराब से बड़ी संख्या में महिलाओं के सुहाग उजड़ रहे हैं, बच्चे अनाथ हो रहे हैं और देश की जवानी को नशों का घुन खोखला कर रहा है।

आमतौर पर लोगों को शराब से नशे की लत लगती है और जब वे शराब नहीं खरीद पाते तो अन्य सस्ते नशों और नकली शराब का सेवन शुरू करके अपना जीवन तबाह कर बैठते हैं। विडम्बना यह है कि अब बड़े शहरों में तो महिलाओं ने भी शराब का सेवन शुरू कर दिया है। 

इसके बावजूद सरकारों ने इस ओर से आंखें मूंद रखी हैं क्योंकि हमारे शासक नेता तो शराब को नशा ही नहीं मानते और इसकी बिक्री से होने वाली भारी-भरकम आय को वे खोना नहीं चाहते। 

नेता कुछ भी कहें, यह अटल सत्य है कि शराब एक नशा और जहर है तथा शराब के दुष्प्रभावों को देखते हुए ही देश के कुछ राज्यों बिहार, गुजरात, नागालैंड और केंद्र शासित क्षेत्र लक्षद्वीप में शराबबंदी लागू की गई है जबकि अन्य राज्यों में इसकी बिक्री धड़ल्ले से जारी है।

1 अप्रैल, 2016 को बिहार में शराबबंदी लागू करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी के फायदे गिनाते हुए गत दिवस कहा कि, ‘‘यह सही अर्थों में साम्प्रदायिक और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है।’’ 

उन्होंने सभी धर्मों में शराब के निषेध का हवाला देते हुए कहा कि, ‘‘शराबबंदी का विरोध करने वाले कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दलों के नेता बताएं कि यदि बिहार और गुजरात में इस सामाजिक बुराई को समाप्त करने का फैसला सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है तो पूरे देश में शराबबंदी क्यों नहीं जबकि देश में अपराधों का ग्राफ बढऩे में शराब सबसे बड़ी वजह है।’’

एक ओर जहां नीतीश कुमार ने देश में शराबबंदी का आह्वान किया है तो दूसरी ओर कर्नाटक से स्कूली छात्रों में शराबखोरी के बढ़ रहे रुझान का ङ्क्षचताजनक समाचार आया है। विभिन्न मदिरालयों और रेस्तरांओं के प्रबंधकों ने बेंगलूरू के कुछ स्कूलों के प्रबंधकों को जब यह सूचना दी कि उनके छात्रों ने छोटी आयु में ही शराबनोशी शुरू कर दी है तो उन्होंने इस मामले की पड़ताल करने का फैसला किया। 

पड़ताल के दौरान उन्हें गहरा धक्का लगा जब यह खुलासा हुआ कि अनेक छात्र अपनी पानी वाली बोतलों में सादा पानी या फलों के रस की बजाय शराब वाले पेय डाल कर ला रहे थे। 

एक स्कूल समूह के बोर्ड के एक सदस्य के अनुसार कम से कम 16 ऐसे मामले पकड़े गए हैं जिनमें छात्रों ने अपनी पानी वाली बोतल में शराब डाल रखी थी। उनके अनुसार पानी अथवा फलों के जूस में मिश्रित व पारदर्शी होने के कारण इसका पता लगाना कठिन होता है। 

अब उन्होंने शराब लेकर आने वाले छात्रों के माता-पिता को बुलाकर उनकी और उनके बच्चों की कौंसङ्क्षलग करवाने का सिलसिला शुरू किया है। इसके साथ ही अभिभावकों को इस मामले में अपने बच्चों पर नजर रखने की सलाह भी दी जा रही है।

बेंगलूरू की एक स्कूल टीचर तो उस समय दुविधा में पड़ गई जब उसने देखा कि 9वीं कक्षा का एक छात्र अपने साथ बीयर की बोतल ही ले आया। इस अध्यापिका का कहना है कि, ‘‘ग्रैजुएशन डे तथा पिकनिकों आदि के मौके पर हम लोग शराब पर निगरानी रखते ही थे लेकिन अब हमने महीने में एक बार औचक निरीक्षण करने का फैसला भी किया है।’’  

मनोवैज्ञानिक सी.आर. चंद्रशेखर का कहना है कि माता-पिता को बच्चों के सामने शराब न पीने का उदाहरण पेश करना चाहिए। बड़ों को शराब पीते देख कर बच्चे भी यही आदत अपनाने को प्रेरित होते हैं और दोस्तों द्वारा शराब पीने के लिए दबाव भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है और यदि छात्रकाल से ही बच्चों में शराब पीने की लत लग जाए तो भविष्य में यह कितना गंभीर रूप धारण कर सकती है यह सोच कर ही भय होता है।  —विजय कुमार 

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