श्रीनगर उपचुनाव में हिंसा, जनता लोकतंत्र चाहती है अलगाववादी ही हैं इसके विरुद्ध

Navodayatimesलगभग 3 दशक से अलगाववाद व आतंकवाद की मार झेलते-झेलते लहूलुहान हो चुके धरती के स्वर्ग कश्मीर में बड़ी मुश्किल से हालात 2002 में पहली बार सामान्य होने लगे थे जब अलगाववादियों की धमकियों और बहिष्कार के आह्वान के बावजूद वहां श्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में शांतिपूर्वक तथा निष्पक्ष चुनाव हुए। 

उसके बाद किसी सीमा तक प्रदेश में चुनाव सुचारू रूप से होते रहे परंतु अब एक बार फिर अलगाववादियों ने घाटी में हालात सामान्य होने की प्रक्रिया को पलटने की कोशिशें तेज कर दी हैं।

इसका प्रमाण श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में मतदान के दौरान मिला जहां 200 से अधिक स्थानों पर हुई ङ्क्षहसक झड़पों में 8 लोगों की मृत्यु व मतदान अधिकारियों तथा सुरक्षा कर्मियों सहित 120 से अधिक लोग घायल हुए।
अलगाववादियों द्वारा लोगों को मतदान के बहिष्कार के आह्वान के चलते मतदान के विरोधियों ने कहीं मतदान केंद्रों पर पैट्रोल बम फैंके तो कहीं पथराव किया। यही नहीं, ‘गलवानपुरा’ में प्रदर्शनकारियों ने सी.आर.पी.एफ. के 12 जवानों को बंधक तक बना लिया। 

लोगों में व्याप्त भय के चलते मात्र 7.14 प्रतिशत ही मतदान हुआ और 12.60 लाख मतदाताओं में से मात्र 90 हजार ही मतदान करने पहुंचे। यह चुनावों के इतिहास में मतदान का सबसे कम आंकड़ा है।

यदि श्रीनगर लोकसभा चुनाव की बात की जाए तो 2014 में यहां 25.86त्न, 2009 में 25.55त्न, 2004 में 18.75त्न और 1996 में 40.94त्न मतदान हुआ था। इस बीच 1999 में सबसे कम 11.93त्न मतदान हुआ।  

इस निराशाजनक स्थिति में भी श्रीनगर से मात्र 50 किलोमीटर दूर गांदरबल जिले के ‘वांगट’ गांव में मतदान केंद्र नंबर 47 पर अलगाववादियों की धमकियों और चुनाव के बहिष्कार के आह्वान की परवाह न करते हुए बड़ी संख्या में लोगों ने मतदान किया और मतदान शुरू होने के बाद 10 बजे तक ही 997 में से 200 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुके थे।

इन लोगों का कहना है कि चाहे इस उपचुनाव का परिणाम कुछ भी निकले, इन्होंने बदलाव के पक्ष में मतदान किया है क्योंकि पी.डी.पी. और भाजपा की सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया। 

हालांकि अलगाववादियों ने श्रीनगर उप-चुनाव के दौरान 8 व्यक्तियों की मौत पर ‘दुख’ व्यक्त करते हुए इसके विरोध में 10 अप्रैल से 2 दिन के जम्मू-कश्मीर बंद का आह्वान किया है परंतु केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य करने की दिशा में किए जाने वाले प्रयासों को तारपीडो करके ये प्रदेश के हितों को ही आघात पहुंचा रहे हैं। 
इतना ही नहीं, युवाओं को सही रास्ते पर चल कर देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रेरित करने की बजाय हिंसा और पत्थरबाजी पर आमादा करके अलगाववादी उन्हें विनाश के रास्ते पर धकेल रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि पत्थरबाजों को जुम्मे अर्थात शुक्रवार के दिन पत्थरबाजी के लिए आमतौर पर 1000 रुपए, पैट्रोल बम फैंकने के लिए 1500 रुपए और आम दिनों में पत्थरबाजी के लिए 400 से 500 रुपए तक दिए जाते हैं।

30 वर्षों से घाटी में जारी ङ्क्षहसा से पहले ही बहुत तबाही हो चुकी है और यदि यही सिलसिला आगे भी जारी रहा तो इसके हितों को और ज्यादा क्षति पहुंचेगी। पर्यटकों का आगमन बंद हो जाने से यहां के लोगों की आय का बचा-खुचा जरिया भी समाप्त हो जाएगा जिससे उनकी कठिनाइयां ही बढ़ेंगी क्योंकि पर्यटन के अलावा यहां आय का कोई और साधन नहीं है। 
ऐसे में जहां अलगाववादियों ने मतदान में व्यवधान डाल कर अपनी नकारात्मक सोच का ही परिचय दिया है, वहीं गांदरबल के एक मतदान केंद्र के मतदाताओं ने बड़ी संख्या में मतदान के लिए पहुंच कर लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था की पुष्टि की है। 

इस बारे ध्यान देने वाली बात यह है कि ‘वांगट’ के मतदान केंद्र नंबर 47 के मतदाताओं की भांति ही प्रदेश के दूसरे हिस्सों की बहुसंख्या भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भागीदार बनना चाहती है परंतु युवाओं को वरगला कर अलगाववादियों द्वारा पाकिस्तान की शह पर करवाई जाने वाली हिंसा ने उनके कदमों को रोक रखा है।

अत: यदि अलगाववादी मतदाताओं से चुनावों का बहिष्कार करने की बजाय उनसे बदलाव के पक्ष में मतदान करवाते तो ज्यादा अच्छा होता क्योंकि तब सरकार को भी लोगों की नाराजगी का पता चल जाता।

—विजय कुमार 

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