यूपी चुनाव: यूपी की 403 सीटों पर भारी पड़ेगी ये 5 सीटें

Navodayatimes क्या मोदी का काम सर चढ़कर बोलेगा? दो दिन वाराणसी शहर में गुजारने के बाद निचोड़ यही है कि भले ही लोग मोदी के विकास के कामों के प्रति बहुत ज्यादा संतुष्ट नहीं हों लेकिन मौटे तौर पर अभी भी मोदी के साथ हैं। लेकिन जब वोट देने की बात आती है तो विकास पर जातिवाद हावी हो जाता है।

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एक ही घाट पर पंडित का वोट किसी एक दल को जा रहा है तो निषाद का किसी दूसरे दल को। घाट पर रिश्तेदार का दाह संस्कार करने आए किसी अन्य दल को वोट देने की बात करते हैं। गंगा किनारे अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस की छटा निराली होती है। किसी शास्त्रीय गायक की मधुर आवाज या फिर कानों में रस घोलने वाला वीणा वादन। आप उस संगीत में खोने ही लगते हैं कि आपकी नजरें सौ मीटर दूर गंगा किनारे की तरफ  जाती है, वहां लोग खुले में शौच करते और गंगा में कपड़े धोते नजर आ जाते हैं।

आप वहां से नजरें हटाते हैं और घाट की सीढिय़ां उतर गंगा किनारे चले जाते हैं। वहां लोग स्नान कर रहे हैं, पिंडदान करवा रहे हैं, हवन में लीन हैं। बची हुई पूजा सामग्री, फूल मालाएं, पॉलीथिन की थैलियां वहीं छोड़ लोग हर-हर गंगे का नारा लगा गर्म चाय पीने लगते हैं। जगह-जगह कचरा दिखता है। कुत्ते उस कचरे के ढेर में भोजन तलाशते दिख जाते हैं।

अस्सी घाट पर ही ट्रैक सूट में टहलते हुए मिले सुबोध। एक कंपनी में एरिया मैनेजर। पिछले 20 सालों से घाट पर घूमने आ रहे हैं। कहने लगे कि पहले सभी घाट गंदे हुआ करते थे, लेकिन अब कम से कम अस्सी घाट से राजेन्द्र घाट तक सफाई दिखती है। इसके लिए मोदी जी का शुक्रिया अदा करते हैं लेकिन साथ ही कहते हैं कि मोदी जी ने जो वादे किए थे, उसका 80 फीसद बकाया है। उनसे आगे एक स्वयंसेवी संगठन के युवक दिखे।

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गंगा किनारे की गंदगी साफ  करते। इनमें सन्नी भी हैं। बताते हैं कि कचरे के ढेर को नाव ले जाएगी। उन्हें दुख है कि यहां हवन आदि करवाने वाले यजमानों और पंडितों दोनों को समझाने के सारे प्रयास निष्फल साबित हुए हैं। वहीं पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से रिटायर हुए पंडित अनंत कुमार गौड़ मिले। कहने लगे कि वह रोज सुबह आधा घंटा गंगा किनारे सफाई करते हैं, यह सिलसिला पिछले 48 सालों से चला आ रहा है।

एक बार एक महिला को फूल मालाएं गंगा में डालने से रोका तो कहने लगी कि तुम क्या यहां के ठेकेदार हो, अकेली औरत को देखकर डराते हो, शर्म नहीं आती...। ऐसे में गंगा साफ  करने की नमामि गंगे योजना का क्या होगा...इस पर वह मुस्करा कर रह जाते हैं।  

गंगा किनारे से दोबारा सुबह-ए-बनारस स्थल पहुंचे तो योग अपने अंतिम चरण में था। योगीराज विजयप्रकाश मिश्रा से बात हुई। वह कहने लगे कि नजदीक ही अस्सी का नाला है, जहां से रोज करोड़ों लीटर गंदा पानी सीधे गंगा में समा रहा है। शहर से 30 करोड़ लीटर गंदा पानी रोज निकलता है, लेकिन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ( एसटीपी ) सिर्फ 10 करोड़ 20 लाख लीटर गंदे पानी को ही साफ  कर पाता है। बाकी का 20 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में सीधे मिल जाता है।

योगीराज के पास खड़े पंडित भवानी मिश्र कहने लगे कि वह 75 साल के हैं और आखिरी बार गंगा में डुबकी 20 साल पहले लगाई थी। कभी कांग्रेस के घोर समर्थक हुआ करते थे लेकिन अब मोदी जी के मुरीद हैं लेकिन अंधभक्त नहीं। कहने लगे कि अस्सी घाट को शोरूम की तरह सभी को दिखाया जा रहा है, क्योंकि यहां तक सीधे गाड़ी आती है।

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बाकी घाटों का हाल बुरा है। पंडित जी वैसे इस बात से खुश हैं कि मोदी जी के आने के बाद गंगा में नावें घूमने लगी हैं, जो नदी में बहाए शवों को निकाल कर मणि कर्णिका घाट पर ले जाती हैं। उनके अनुसार गंगा किनारे के सभी शवदाह गृह बंद कर दिए जाने चाहिए।    वाराणसी का नाम दो नदियों पर पड़ा है, अस्सी और वरुणा। मोदी ने अगर अस्सी घाट को सजाया है तो वरुणा घाट पर रिवर फ्रंट बनवा रहे हैं अखिलेश यादव। 219 करोड़ की परियोजना है।

वरुणा नदी में गिरने वाले नालों का गंदा पानी फिल्टर भूमिगत पाइपों से एसटीपी तक पहुंचाया जा रहा है। दोनों तरफ  सीढिय़ां भी बनाई जा रही हैं। यहीं घाट पर मिल गए कुमद सिंह। बीए कर रहे कुमद बताने लगे कि मोदी जी के गंगा साफ  करने के अभियान के बाद ही वरुणा की याद आई अखिलेश को। उनके साथ थे विजय सिंह। दोनों से जब रोजगार के बारे में पूछा गया तो दोनों ने एक स्वर में मोदी और अखिलेश को कोसना शुरू कर दिया। कहने लगे कि हम बेरोजगारों की किसी दल को चिंता नहीं है। 

अस्सी घाट से मुख्य शहर की तरफ  चलें तो छोटी गलियों में कूड़े के ढेर भी नजर आए और सफाई कर्मचारी भी। मुख्य सड़कें कमोबेश साफ  नजर आईं। शहर की 20 लाख की आबादी है। रोज 600 मीट्रिक टन कचरा निकलता है।

सफाईकर्मियों की संख्या 2700 है और लगभग इतनों की कमी भी बताई जाती है। ज्यादातर लोग सफाई से संतुष्ट नजर आए। साथ ही यह भी कहते सुने गए कि सफाई तो लोगों को खुद ही करनी है। शहर के बहुत से हिस्सों में कहीं फ्लाईओवर के बनते तो कहीं सड़क के चौड़े होने के कारण जाम मिला। लोगों का यही कहना है कि थोड़ी तकलीफ  तो उठानी ही पड़ेगी। अलबत्ता बिजली के खंभों पर तारों का जाल दिखा।

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एक वायदा तारों को भूमिगत करने का था लेकिन इस दिशा में 10 फीसद भी काम नहीं हुआ है।  वाराणसी के सांसद प्रधानमंत्री मोदी ने सांसद कार्यालय भी खोल रखा है। इसे मिनी पीएमओ भी कहा जाता है। यहां रोज औसतन सौ से ज्यादा शिकायतें आती हैं। इन दिनों तो चुनाव के कारण बंद पड़ा है कार्यालय और चुनावी गतिविधियों 
के लिए ज्यादा काम आ रहा है। यहां मिले पदाधिकारी राकेश वशिष्ठ। उनका कहना था कि जमीन, सड़कों, नालियों, अवैध निर्माण से लेकर पारिवारिक और पड़ोसी से झगड़ों तक की शिकायतें लोग करते हैं। 

इसके आलावा रेलवे स्टेशन चमक रहा है। ट्रॉमा सेंटर नया-नया खुला है। जब सब कुछ इतना खुशनुमा है तो यहां की 8 सीटों को लेकर भाजपा को आश्वस्त हो जाना चाहिए। मोदी जी को प्रतीक के रूप में सिर्फ  एक ही रैली करनी चाहिए लेकिन यह क्या? बनारस में अमित शाह डेरा डाले हुए हैं, मोदी सरकार के दर्जन से ज्यादा मंत्री रोज शहर में कहीं मीडिया से रूबरू हो रहे हैं तो कहीं जनता से।

खुद मोदी 3 दिन के बनारस दौरे पर हैं। मोदी के संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की 5 सीटें आती हैं। कहा जा रहा है कि इसमें से एक को छोड़कर बाकी में कांटे की टक्कर है। संघ से 30 सालों से जुड़े प्रेम प्रकाश गिरी का कहना है कि मुकाबला कांटे का है और मोदी की सियासी साख दांव पर है। साफ  है कि चूंकि यूपी में भाजपा मोदी के चेहरे और जादू के भरोसे हैं, लिहाजा यहां की 5 सीटें पूरे यूपी की 403 सीटों पर भारी पड़ रही हैं।

विजय विद्रोही

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