भंसाली ने जिस खिलजी को दिखाया Zero असल में था वो Hero, पढ़ें उसकी गाथा

भंसाली ने जिस खिलजी को दिखाया Zero असल में था वो Hero, पढ़ें उसकी गाथा

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। फिल्म पद्मावती को लेकर देश में इतना विवाद चल रहा है कि आज देश के नौजवान से लेकर बूढ़ो तक की जबान पर पद्मावती का नाम है।  इतनी तो रानी पद्मावती अपने दौर में भी प्रसिद्ध नहीं हुई होगी। खैर जानें दो आगे बढ़ते है संजय लीला भंसाली की फिल्म पर पद्मावती को लेकर  लोगों ने इतना हा हुल्ला किया हुआ है कि शायद वो भूल गए की फिल्म में और भी किरदार है। बात करते हैं अलाउद्दीन खिलजी की क्या 20 साल तक दिल्ली पर राज करने वाला सुल्तान क्या वाकई में खलनायक था या इतिहास कुछ और गवाही देता है? 

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दिल्ली के इतिहास को अपने कदमों से नापने वाले स्तंभकार और आम आदमी के इतिहासकार आर वी स्मिथ से जब अल्लाउद्दीन खिलजी को लेकर बात हुई तो उन्होंने खिलजी का कुछ इस तरह बखान किया, "अलाउद्दीन खिलजी औरतबाज नहीं था, जैसा कि पद्मावती फिल्म में उसे दिखाया गया है। पद्मावती फिल्म ने एक ऐसे बादशाह की छवि को बिगाड़ कर रख दिया है जिसने मंगोलों से हिंदुस्तान की हिफाजत की।

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बेहद सभय व्यक्ति थे खिलजी 

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के अध्यक्ष और मध्यकालीन भारत के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर सैयद अली नदीम रज़ावी बताते  है कि फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को बेहद क्रूर, जंगली और बर्बर राजा के तौर पर दिखाया है। लेकिन असल में वो अपने दौर के सबसे  सांस्कृतिक व्यक्ति थे जिन्होंने कई ऐसे क़दम उठाए जिनका असर आज भी दिखता है। राजवी बताते है कि देश में अलाउद्दीन के बारे में पूरा रिकॉर्ड है। सबसे शिक्षित बादशाहों में उनका नाम आता है। 

दिल्ली पर तुर्कों की हूकूमत की शुरुआत के बैद खिलजी वंश के लोगों ने ही हिंदूस्तान के लोगों को हूकूमत में शामिल किया था। प्रोफेसर बताते है कि खिलजी वंश से पहले दिल्ली पर शासन करने वाले सुल्तान जिनमें इल्तुतमिश, बलबन और रज़िया सुल्तान भी शामिल हैं ये सभी अपनी हूकूमत में स्थानीय लोगों को शामिल नहीं करते थे। उनके शासनकाल में तुर्कियों को ही शामिल किया जाता था शासन काल को तुर्क शासन कहा जाता था।  

जब खिलजी ने महंगाई पर लगाई रोक 

मूल्य नियंत्रण की अलाउद्दीन खिलजी की नीति को उस दौर का सबसे अच्छा फैसला कहा जा सकता है। खिलजी ने बाजार में विकने वाली सभी चीजों के दाम नियंत्रित कर दिए थे। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर नज़फ़ हैदर का कहना है कि बाज़ार से संबंधित अलाउद्दीन ख़िलजी की नीतियां बहुत मशहूर हैं। खिलजी ने बाजार को नियंत्रित करने के साथ-साथ चीजों के दाम भी तय कर दिए थे। 

प्रोफ़ेसर हैदर ये भी मानते हैं कि अलाउद्दीन ख़िलजी के बाज़ार में मूल्य नियंत्रित करने की एक बड़ी वजह ये भी है कि उनके पास एक बड़ी सेना थी जिसे सामान मुहैया कराने के लिए उन्होंने दाम निश्चित कर दिए थे।

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ऐसे की भ्रष्टाचार पर रोक 

कालाबजारी रोकने के लिए खिलजी ने शाही भंडार शुरु किए थे। इन भंडारो में बड़ी मात्रा में खाद्यान रखे जाते थे और यहीं से विक्रेताओं को मुहैया कराए जाते थे ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि बाजार में किसी चीज की कमी न हो और कालाबाज़ारी न की जा सके। किसी भी किसान और व्यापारी को तय दाम से अधिक पर सामान बेचने की अनुमति नहीं थी। इतना ही नहीं बाजार में आने और जाने वाले सामान का हिसाब रका जाता था। साथ ही एक व्यक्ति को कितना सामान बेचा जाना है वो भी तय किया गया था।

Navodayatimesकिसानों के लिए फायदा 

प्रोफेसर राजवी का कहना है कि खिलजी ने काफी सारे बड़े बड़े काम कि है लेकिन उनके सबसे बड़े कामों में से एक है कृषि सुधार। खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के दायरे में आने वाले इलाक़े की ज़मीनों का सर्वेक्षण करवाकर उन्हें खलीसा व्यवस्था में लिया था। साथ ही कोई कर नहीं लिया जाता था। 

खिलजी ने लोगों को अपने शासन में सम्मलित करने के एक फायदा ये हुआ कि नीति भी उनके हिसाब से बनने लगी। उस जमाने में जानवर चराने और घर बनाने के लिए लोगों से कर लिया जाता था। खिलजी को दौर में सरकार और ग्रामीणों के बीच में आने वाले चौधरियों और मुक़द्दमों के अधिकार भी सीमित कर दिए गए थे और उनसे भी कर लिया जाता था। साथ ही साहूकारों की लूट खसोट को रोकने के लिए उन्होंने घोड़ों को दागने की प्रथा की शुरूआत की ।       

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में इतिहास के एक और प्रोफेसर राकेश बाताबयाल पद्मावती को लेकर छिड़े विवाद में कहते हैं कि इस विषय में इतिहासकारों के लिए कुछ बोलने की गुंजाइश ही नहीं बची है क्योंकि यह अभिव्यक्ति की आजादी, कलात्मकता और राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है। प्रोफेसर बाताबयाल कहते हैं, "हिस्ट्री इज प्रोडक्शन आफ नॉलेज लेकिन आज देश में ऐसी ताकतें पैदा हो गई हैं जो इतिहास को नहीं मानतीं।" उनका कहना है कि इतिहास के ज्ञान के नाम पर जहालत इतनी है कि फिल्मों को ही इतिहास मान लिया जाता है। हमें यह समझना होगा कि फिल्म इतिहास नहीं है। वह बताते हैं ।

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कैसा बना था खिलजी सुल्तान 

प्रौफेस हैदर का कहना है कि जब मंगोल सानिक हार गए थे तो मंगोल की सेना के सैनिकों को कटे हुए सर वॉर ट्राफी के तौर पर दिल्ली में प्रदर्शित किए थे। उन्होंने ऐसा मंगोलों में खौफ पादा करने के लिए किया था। अलाउद्दीन ख़िलजी अपने चाचा और ससुर ज़लालुद्दीन खिलजी के दौर में 1291 में कड़ा प्रांत (अब कड़ा यूपी के कौशांबी ज़िले में है और मानिकपुर प्रतापगढ़ ज़िले में है) के गवर्नर बने थे। खिलजी धीरे-धीरे ताकतवर हो रहा था। उनेके ससूर को भी आंदाजा नहीं था कि एक दिन वो उन्हें ही सत्ता से बेदखल  कर देंगे। उनके ससुर बात करने के लिए कड़ा आए थे तब खिलजी के एक विश्वासपात्र कमांडर ने ज़लालउद्दीन खिलजी की हत्या कर दी थी। ससुर की  मौत के बाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने कड़ा में सत्ता संभाल ली। दिल्ली में आने के बाद खिलजी ने दूबारा अपनी ताजपोशी करवाई थी।          

Navodayatimesकैसे आई पद्मावती 

 दिल्ली दैट नो वन नोज और  दिल्ली - अननोन टेल्स आफ ए सिटी  जैसी किताबों के लेखक आर वी स्मिथ कहते हैं, खिलजी ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए चितौड़ पर आक्रमण किया था, पद्मावती को जीतने के लिए नहीं । चितौड़ के राजा रतन सिंह को हराने के बाद जब उन्होंने रानी पद्मिनी की खूबसूरती के चर्चे सुने तो वह उत्सुकतावश उसे देखना चाहता था। जैसा कि सब किस्सों कहानियों में सुनते आए हैं कि राजपूत रानी एक विशाल आईने के सामने आकर खड़ी हो गई और खिलजी ने उस आईने में केवल रानी पद्मिनी का अक्स देखा था।

स्मिथ कहते हैं कि खिलजी की मौत के करीब ढाई सौ साल बाद भक्तिकाल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ की रचना की और उसे रोचक बनाने के लिए उसमें बहुत सी काल्पनिक बातें जोड़ी । फिल्म उसी काल्पनिक कहानी पर आधारित है। वह इस आम धारणा को भी गलत बताते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी के हाथों में पडऩे से बचने के लिए रानी पद्मावती ने जौहर किया था। वह राजपूत राजा रतन सिंह के जंग में हार जाने के बाद रवायत के चलते महल की बाकी महिलाओं के साथ चिता में कूद गई थी। 

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