Blog: अब नहीं दिखेगी बचपन को रोशन करने वाली वो आतिशबाजियां

Edited by: Aishwarya Awasthi

Navodayatimesनई दिल्ली/ऐश्वर्य अवस्थी: चरागों के.. रोशनी के.. आतिशों के मायने क्या थे। पटाखों का दीदार ना हुआ इस बार .......बड़ी सूनी रहेगी दिवाली इस बार।  सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक बड़ा फैसले लेते हुए दिल्ली एनसीआर में पटाखा बेचने पर रोक लगा दी । सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिवाली के दौरान दिल्ली और एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री और भंडारण पर रोक लगाने वाले नवंबर 2016 के आदेश को बरकार रखते हुए यह फैसला सुनाया।

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इस फैसले के बाद से चारों हाहाकार मच गया है। बाजार से लेकर सोशल मीडिया तक मिली जुली राय देखने को मिल रही है। इस फैसले पर राजनीति की रोटियां भी जमकर सिकती नजर आ रही हैं। बात धर्म जाति की ना होकर सही गलत से हो तो बहुत ही आसानी से चीजे साफ हो सकती हैं ,लेकिन ऐसा कहां होने वाला। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ एक और याचिका दायर कर दी गई है। समझ ये नहीं आता है कि इस देश में रेपिस्ट और हत्यारे मस्त घूम रहे हैं उन पर कोर्ट इतनी फुर्ती से फैसला क्यों नहीं देता है।

Navodayatimesहो सकता है दूसरे पहलू में सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला ठीक भी हो लेकिन मेरे अंदर बस एक सवाल कौतूहल कर रहा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को एक औरत का गैंग रेप करने वालों पर यही खुर्ती दिखाते हुए फैसला नहीं लेना चाहिए। पता नहीं बता विवादित हो जाएगी लेकिन सोचने वाली है कि तमाम ऐसे मुद्दे हैं जो हमें हर रोज मार रहे हैं और माननीय सुप्रीम कोर्ट में सालों से बस लटके पड़ें हैं क्यों कोर्ट के पास इनके लिए बस है तो तारीख। 

बचपन की खो जाएंगी यादें
पटाखों पर रोक लग जाने से उन मासूमों से पूछो जो महीनों पहले से दिवाली के पटाखों को इंतजार करते हैं। जो अपनी पॉकेट मनी से पैसे बचाते केवल पटाखों को खरीदने के लिए। उन मासूनों से पूछो उनको कितना दर्द हो रहा है। जो महज इतना कह रहे हैं अब दुकानों पर पटाखे मिलेंगे नहीं तो हम दिवाली मनाएंगे कैसे कैसे मजे करेंगे। दोस्तों को अपनी आतिशबाजियों के किस्से कहां से सुनाएंगे। हम बड़ों से ज्यादा इन मासूमों को दर्द जिनको सुनने वाला कोई नहीं है।

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Navodayatimesसुरक्षा के ढूंढे उपाए
पटाखों पर रोक के साथ अगर सुप्रीम कोर्ट प्रदूषण को रोकने के कुछ उपाए सुझाता तो शायद जरूर हजारों की जान बचती । हर रोज मर रहे प्रदूषण से लोगों को एक की मौत से को रोक लिया लेकिन जो वो रोज मर रहे उसका क्या करेंगे। डीजल की गाड़ियों से सबसे ज्यादा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है लेकिन उस पर तो वो सख्ती ना  दिखी जो पटाखों पर दिख रही है। 

व्यापारियों की आह
उन व्यापारियों के बारे में क्या कहा जाए जो एक झटके में बेराजगार कर दिया। इन व्यापारियों को हजारों का माल जो एक झटके में बेकार हो गया उसकी भरपाई कौन भला करेगा। ऐसे कई व्यापारी हैं जिनकी रोजी रोजी इन पटाखों को बेचने से चलती है उनकी थाली से सुप्रीम कोर्ट ने रोटी छीन ली है। और केवल बेचने वाले व्यापारियों का ये दर्द नहीं है ये फैसला पटाखा बनाने वालों को भी दर्द है। जो साल भर केवल इनको बनाकर ही अपना पेट भरते हैं उन गरीबों का क्या होगा। क्योंकि पटाखे बेचे नहीं जाएंगे तो भला इनसे खरीदे कौन?

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

 

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