Blog: मेरी स्कर्ट छोटी है या समाज की नजरें

Edited by: Aishwarya Awasthi

Navodayatimesनई दिल्ली/ऐश्वर्य अवस्थी : यूं तो देश में लड़कियों को बराबरी का हक देने की बात कही जाती है लेकिन जब बात कपड़ों की आती है तो न जाने वो बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले लोगों की सोच छोटे कपड़ों में उलझ जाती है।आज भी हमारे देश में आज भी उनके पहनावे पर रोक लगाई जा रही है। अगर लड़की की स्कर्ट छोटी तो मतलब उसरी चरित्र खराब। कपड़ों से चरित्र तक का आकलंन कर लिया जाता है।

एक लड़का अगर कुछ भी पहने कर सड़क पर जाता है तो वह आम बात होती है लेकिन एक लड़की छोटे कपड़े पहनी है तो उसे संस्कृति , संस्कार का वास्ता दिया जाता है। देश के कई शहरों में में लड़कियों के शॉर्ट स्कर्ट पहनने पर रोक की कवायद की जा रही है। ऐसे में अब सवाल ये भी उठता है कपड़े छोटे होते हैं या सोच।

शहरों में छोटी स्कर्ट को किया गया लंबा 
डिस्कोथिक में महिलाओं की ड्रेस को लेकर चंडीगढ़ एडमिनिस्ट्रेशन में सख्त कदम उठाए जाने की पहल की।लड़कियों का डिस्कोथिक में शॉर्ट स्कर्ट पहनकर जाना बैन की बात उठी। वहीं, अपने बिंदास रूप के लिए जाने जाना वाला शहर गोवा भी इसमें लिप्त है।गोवा में भी लड़कियों के छोटे कपड़े पहनने पर रोक की बात कही जा चुकी है। गोवा सरकार के वरिष्ठ मंत्री ने कहा था कि छोटे कपड़ों में लड़कियों का पब जाना स्थानीय संस्कृति के खिलाफ है।  इस पर रोक लगनी चाहिए।जवान लड़कियों का कम कपड़ों में पब जाना हमारी संस्कृति में फिट नहीं बैठता।अगर हम इसकी अनुमति देते हैं तो हमारी गोवा कल्चर का क्या होगा? लड़की का कम कपड़ों में पब जाना गलत संस्कृति को दर्शाता है। वहीं, केरल में भी लड़कियों की स्कर्ट पहनने पर रोक लगाई जा चुकी है।केरल के एक मुस्लिम महिला कॉलेज ने चुस्त जींस, छोटे टॉप और लेगिंग पहनने पर रोक लगाते हुए छात्राओं को इसे पहनकर कॉलेज परिसर में ना आने की सलाह दी थी। Navodayatimes

लोगों की घूरती नजरें
पश्चिमी समाज में तो इसका काफी प्रचलन है लेकिन भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों में किसी लड़की का मिनी स्कर्ट पहने दिखना इतना आम नहीं। अब भी ऐसी स्कर्ट पहने किसी लड़की को लोग घूरने से बाज नहीं आते। भले ही आज भी मिनी स्कर्ट पहनने को आधुनिकता का प्रतीक माना जाता हो लेकिन सच तो यह है कि इसका चलन 50 साल पहले ही शुरू हो गया था। स्कर्ट विभिन्न संस्कृतियों और इलाकों में पहनी जाती रही है। प्राचीन समय में उसकी लंबाई पांव को पूरी तरह ढंकने वाली होती थी।1960 के दशक में मिनी स्कर्ट का फैशन आया,यहां न्यूयॉर्क में एक मॉडल डॉन स्टेफेन का डिजाइन दिखा रही है। आज इतने साल पुराने पहनावे को भी लोगों की नजरे नहीं छोड़ती।

स्कर्ट छोटी या सोच
स्कर्ट पहनने का रिवाज तो हर संस्कृति में रहा है, लेकिन समय काल और समाजों के हिसाब से उनकी लंबाई अलग अलग रही है। पांव को पूरी तरह ढकने वाली स्कर्ट से लेकर घुटने के ऊपर वाली स्कर्ट तक। भारत में साड़ी हो या लहंगा और घाघरा, वे एक ही परिवार के हैं।

अपराध हैं कपड़ों के जिम्मेदार
भारत में रेप की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। भारत में 57 फीसदी अपराध में कपड़ों को भी जिम्मेदार माना जाता है। कपड़ों को लेकर कहा जाता है , जब छोटे कपड़ें होंगे तो लड़कियों के साथ ऐसी घटनाएं भी होंगी। एक मापदंड तय कर लिया गया है कि जो लड़कियां छोटे कपड़े पहनती हैं, उनके साथ ही रेप या छेड़छाड़ जैसी घटनाएं होती हैं। जबकि हकीकत इससे कोसो दूर है।

सोशल मीडिया पर आलोचनाNavodayatimes
चंडीगढ में लड़कियों की शॉर्ट स्कर्ट पहनने पर रोक लगने के बाद से जमकर आलोचना की जाती है। यहां लड़कियों से ज्यादा लड़के शॉर्ट स्कर्ट  पर  रोक का विरोध करते रहे हैं। सभी इस तरह के होने वाले एलान के खिलाफ हैं और सेम जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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