BLOG: अभी तो उड़ना सीखा भी नहीं था कि पंख ही काट दिए

Edited by: Aishwarya Awasthi

Navodayatimesनई दिल्ली/ऐश्वर्य अवस्थी:  स्कूल... वो जगह है जहाँ एक बच्चा पहली बार आने पर जितना रोता है उससे कहीं ज्यादा वहाँ से आखिरी बार निकलने पर रोता है। स्कूल केवल एक बच्चे को शब्दों का ज्ञान ही नहीं सिखाता है वह, जिंदगी से असल में रूबरू भी करवाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सा रूप इस विद्या के मंदिर का दिख रहा है।

जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। केवल दो दिन के अंतर पर देश की राजधानी क्षेत्र के दो नामी प्राइवेट स्कूलों में ऐसी वारदातें घटित हुईं,जिन्होंने मन मस्तिषक को झकझोर दिया है कि एक बच्चा आखिर कहां सुरक्षित है। पहला गुरुग्राम स्थित रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात वर्षीय बालक की हत्या स्कूल के ही अंदर कर दी जाती है। उसके बाद दिल्ली के गांधी नगर  में स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल में एक पांच साल की बच्ची से दुष्कर्म किया जाता है।

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दो ऐसे में मासूम जो अभी खुद से रूबरू भी नहीं हो पाए हैं और उनसे उनका सब कुछ दरिंदे छीन ले रहे हैं। गलती किसकी है आखिर स्कूल सोच या फिर....सवाल और गुस्सा हमेशा की तरह सबका वैसा ही है लेकिन ये सब खत्म होगा कि नहीं ये सवाल जरूर वैसा ही है।

Navodayatimesयौन शोषण हुए कारण
गुरुग्राम  में रेयान स्कूल  के बस के कंडक्टर ने बच्चे के साथ यौन-दुर्व्यवहार की कोशिश की। नाकाम रहने पर उसने हत्या कर डाली। वहीं गांधी नगर के बच्ची से हुए दुष्कर्म में भी एक स्कूल का चपरासी आरोपी है। इन दोनों घटनाओं में आरोपियों का प्रमुख मकसद यौन शोषण था। गुरुग्राम मामले में अपराध को भयावह ढंग से अंजाम दिया गया। एक नन्हें बच्चे के साथ जो घटना इतने महंगे और अच्छे स्कूल में हुई वह कभी भी कहीं भी हो सकती है।

मौजूद है एक्ट
इन दोनों घटनाओं ने पूरे देश की संवेदना को इसलिए झकझोरा, क्योंकि स्कूलों में यौन उत्पीड़न की खबरें लगभग सभी जगहों पर अक्सर आती रहती हैं। करीब पांच साल पहले हुए निर्भया कांड के बाद बलात्कार तथा यौन दुर्व्यवहार को लेकर कानून सख्त किया गया था। बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट- 2012 (पॉस्को) मौजूद है। परंतु फिर भी महज सख्त कानून ऐसे अपराधों को रोकने में पर्याप्त साबित नहीं होते।

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असल  मुद्दा है क्या
 स्कूल प्रबंधनों की जवाबदेही कौन तय करेगा। हजारों पैसे देकर भी बदले में मां बाप को ये मिल रहा है तो इससे भयाभय और भला क्या हो सकता है। प्राइवेट स्कूल मोटी फीस वसूलते हैं। वहां दी जाने वाली कथित सुविधाओं और सुरक्षा इंतजामों के आधार पर इसका औचित्य सिद्ध करने की कोशिश होती है। लेकिन इस मोर्चे पर नाकाम रहे स्कूलों के प्रबंधकों के लिए क्या दंड हो, अब यह भी सुपरिभाषित होना चाहिए। अपेक्षित यही है कि सरकारें इस दिशा में जल्द कदम उठाएं।

Navodayatimesपरेंट्स भी हैं जिम्मेदार
आम तौर पर बच्चों के पैरेट्स बड़े चमक-धमक और नामचीन स्कूल में बच्चों का एडमिशन करा कर अपने फर्ज को पूरा हुआ मान लेते हैं। बेहतर है कि समय-समय पर स्कूल की व्यवस्था, आने-जाने के साधनों की समीक्षा ऑर  स्कूल स्टाफ और यहां तक कि क्लास टीचर और अन्य टीचर्स के व्यवहार की बच्चों से चर्चा किया करें।  

अब क्यों नहीं उठ रही आवाज
जिस तरह से छोटे-छोटे मुद्दों पर समाज के हितौषियों की आवाज सोशल मीडिया पर उठती है वह अब नदारत सी नजर आ रही है।  सिर्फ चंद मां-बाप जिनको अपने बच्चों का डर या इल समय न्याय के लिए आवाज उठा रहे हैं बाकी जो की आवाजें तो कहीं गुम सी हो गई है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

 

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