फिर गुजरात चुनाव में मोदी का ‘तारणहार’ बना संघ

फिर गुजरात चुनाव में मोदी का ‘तारणहार’ बना संघ

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। गुजरात में केसरिया ताने-बाने के समक्ष महत्ती चुनौती उछालने वाले तीन युवा लड़ाकों हाॢदक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी को साधने की बाजीगरी में अब भाजपा को संघ का भी साथ मिलने लगा है। भले ही भाजपा का शीर्ष नेतृत्व गुजरात में केसरिया आंधी का दिवास्वप्न दिखा रहा हो, पर सच तो यह है कि पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस बेहद मजबूती से उभरकर चुनावी लड़ाई में शामिल हुई है और जो सर्वेक्षण एजैंसियां आज से 2 माह पूर्व भाजपा और कांग्रेस के वोट शेेयर में 12 फीसदी से ज्यादा अंतर रहने की बात बता रही थीं, इनके ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 

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गुजरात चुनाव में भाजपा की बढ़त अब घटकर 5 से 6 फीसदी रह गई है। सनद रहे कि भाजपा के समक्ष महत्ती चुनौती उछाल रहे इन 3 युवाओं में से हाॢदक पटेल पाटीदार समाज से, अल्पेश ठाकोर (जो अब कांग्रेस में शामिल हो गए हैं) ओ.बी.सी. वर्ग से और जिग्नेश मेवानी दलित समाज से ताल्लुकात रखते हैं। 

इतिहास साक्षी है कि गुजरात में अब तक 2 मुद्दों पर ही चुनाव हारे या जीते जाते रहे हैं। वे हैं धर्म और जाति। जाति को तोडऩे, जोडऩे व साधने में अमित शाह की उस्ताद राजनीति से सब वाकिफ हैं। चुनांचे अब संघ को लग रहा है कि गुजरात चुनाव में ’हिन्दुत्व कार्ड’ ही निर्णायक साबित होगा। सूत्रों के मुताबिक, इस तथ्य को मद्देनजर रखते हुए संघ ने अपने 12 विभागों को राज्य के हिन्दुओं को एकजुट करने का जिम्मा सौंपा है।

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सूत्र बताते हैं कि संघ के इन 12 आनुषांगिक संगठनों में समन्वय बनाए रखने के लिए एक ’कोऑॢडनेशन कमेटी’ का भी गठन हुआ है। इन संगठनों ने गुजरात के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बाकायदा काम करने शुरू कर दिए हैं कि कैसे अपने-अपने समुदाय व वर्गों की सरपरस्ती कर रहे इन युवाओं के प्रभाव को कम किया जा सके। अब तक के चुनाव गवाह हैं कि जब-जब मोदी पर कोई संकट आया है या उनकी चुनावी लड़ाई दुर्गम या भीषण हुई है, संघ ने अपनी पूरी ताकत मोदी के पीछे झोंक दी है। गुजरात के मौजूदा विधानसभा चुनाव में भी इस बात की झलक मिलने लगी है।

अल्पेश का केस बिगाडऩे की तैयारी
सैक्स सी.डी. कांड से हाॢदक पटेल की धार कुंद करने का दावा करने वाली भाजपा अब ओ.बी.सी. नेता अल्पेश ठाकोर की काट ढूंढने में जुटी है, क्योंकि ठाकोर फिलवक्त पूरे जोर- शोर से कांग्रेस के पक्ष में अलख जगा रहे हैं। सनद रहे कि गुजरात चुनाव में हमेशा से ओ.बी.सी. वोटर निर्णायक रहे हैं। गुजरात में इनकी कुल आबादी 40 फीसदी के आस-पास है। इसमें से अकेले 20 प्रतिशत ठाकोर जाति के लोग हैं, अल्पेश जिनकी रहनुमाई करते हैं। ठाकोर जाति के लोग उत्तर और मध्य गुजरात के गांवों में फैले हुए हैं। जब गुजरात में रजवाड़ों का जमाना था, तो ये ठाकोर लोग उनके लड़ाके थे, उनकी सेनाओं में शामिल थे। समय बदला और रजवाड़े जब अतीत बनते गए, तो ये खेतीबाड़ी के काम में जुट गए। इनमें से ज्यादातर के पास जमीनों की मिल्कियत नहीं थी, तो वे खेतिहर मजदूर बनकर रह गए। 

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इस वर्ग के ज्यादातर युवाओं के पास रोजगार नहीं था, लिहाजा इनमें से एक बड़ी आबादी शराब तस्करों का साथ देने लगी। जब 2011 के आस-पास अल्पेश परिदृश्य में आए तो उन्होंने देखा कि ठाकोर युवाओं के पास न तो अपनी पढ़ाई-लिखाई है और न ही जीवन में उनका कोई लक्ष्य है, सो अल्पेश ने अपनी क्षत्रिय ठाकोर सेना का गठन किया, जिनसे जुड़े स्वयंसेवक बड़े पैमाने पर ठाकोर युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए कोङ्क्षचग क्लासिस चलाने लगे। 
2016 में अल्पेश ने राज्य की ओ.बी.सी., एस.सी. और एस.टी. जातियों को प्रतिनिधित्व देने और उन्हें एक स्वर मुहैया कराने की गरज से एकता मंच का गठन किया और दावा किया गया कि यह गुजरात की 70 फीसदी आबादी का एक मंच है। कहीं-न-कहीं यह मंच हाॢदक 

पटेल के पाटीदार आंदोलन को भी चुनौती देने का काम कर रहा था। बदले राजनीतिक परिदृश्य में अब चूंकि अल्पेश, हाॢदक व जिग्नेश भगवा लहरों के प्रतिकूल एक नाव पर सवार हो गए हैं, शायद इसीलिए अब केसरिया ताने-बानों के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं।

एक किरीट, तीन सीट
अहमदाबाद और गांधीनगर लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों पर प्रचार के लिए स्टार प्रचारकों का भाजपा को टोटा पड़ गया है। 2008 के नए परिसीमन के बाद अहमदाबाद लोकसभा सीट को 2 अलग-अलग सीटों में बांट दिया गया था। अहमदाबाद वैस्ट, जो कि एक आरक्षित सीट बना दी गई, फिलवक्त जिसका प्रतिनिधित्व भाजपा के किरीट सोलंकी करते हैं। इस सीट के अंतर्गत 7 विधानसभा सीटें आती हैं, जिनमें से असरवा और  दलिमदा आरक्षित सीटें हैं और शेष 5 सामान्य सीटें। 

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दूसरी लोकसभा सीट अहमदाबाद वैस्ट है, जिसकी नुमाइंदगी भाजपा के परेश रावल करते हैं, इसके अतंर्गत भी विधानसभा की 7 सीटें आती हैं जो सभी सामान्य श्रेणी की हैं। इसके अलावा इससे लगी गांधीनगर लोकसभा सीट है, संसद में जिसका प्रतिनिधित्व लाल कृष्ण अडवानी करते हैं, इसके अंतर्गत भी विधानसभा की 7 सामान्य सीटें आती हैं। 
अब भाजपा की दिक्कत यह है कि न तो लाल कृष्ण अडवानी और न ही परेश रावल अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों की कोई सुध लेते हैं। इससे यहां के स्थानीय वोटरों में खासी नाराजगी है।

भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने फिलवक्त किरीट सोलंकी को यह जिम्मा सौंपा है कि वह अपनी संसदीय सीट अहमदाबाद वैस्ट के अलावा अहमदाबाद ईस्ट और गांधीनगर का भी जिम्मा संभाल लें और इन दोनों संसदीय सीटों के लोगों के दुख- तकलीफों का अंदाजा लें और इसके समाधान का उपाय ढूंढें। चुनांचे इन दिनों डा. किरीट सोलंकी को ढूंढने वाले ढूंढ नहीं पा रहे हैं।
 

कट सकता है यू.पी. के 50 सांसदों का टिकट
भले ही 2019 के चुनाव में अभी वक्त हो, पर भाजपा अभी से इलैक्शन मोड में आ गई है। अमित शाह के दफ्तर में धड़ाधड़ यू.पी. के मौजूदा सांसदों के रिपोर्ट कार्ड पहुंचने लगे हैं। सूत्र बताते हैं कि सांसदों के परफॉर्मैंस को एक सर्वेक्षण एजैंसी की मदद से अलग-अलग पैमानों पर रेटिंग दी जा रही है। पार्टी अध्यक्ष से जुड़े सूत्र बताते हैं कि अगले आम चुनाव में यू.पी. के आधे से ज्यादा निवर्तमान सांसदों का टिकट कट सकता है। राजनाथ सिंह समेत कई दिग्गजों को अपनी संसदीय सीटों को बदलने पर भी मजबूर होना पड़ सकता है। 

सूत्र बताते हैं कि 65 पार के सांसदों को पार्टी कार्यों में लगाया जा सकता है और 50 से ज्यादा सिटिंग सांसदों के टिकट काटे जा सकते हैं और उनकी जगह नए चेहरों को मैदान में उतारा जा सकता है। अमित शाह की यह पुरानी रणनीति है, इस विधि से वे नाराज वोटरों को उदासीन कर लेते हैं। गुजरात के लिए जारी 70 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में भी 15 चेहरे बिल्कुल नए हैं।
 

डाक्टर दवाई नहीं लिख पा रहे
दिल्ली के स्वनामधन्य मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी मुफ्त प्रचार पाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते। अब दिल्ली सरकार ने अपने मुख्यमंत्री की आकांक्षाओं को शिरोधार्य करते हुए अपने अधीन आने वाले तमाम अस्पतालों को यह निर्देश जारी किया है कि इन अस्पतालों के मरीजों को मुफ्त दवाइयां मिलेंगी और यहां के अस्पतालों में कार्यरत डाक्टर कोई ऐसी दवा नहीं लिखेंगे जो इन अस्पतालों के दवाई घरों में उपलब्ध नहीं है। सूत्रों का कहना है कि अस्पतालों में महज गिनती की दवाइयां उपलब्ध हैं। यहां के डाक्टर मरीजों का मर्ज भांप तो रहे हैं, पर वे दवाइयां नहीं लिख पा रहे हैं जो उनकी बीमारियों के लिए मुफीद हैं। सो, डाक्टर व मरीज दोनों की जान सांसत में है।
 

आप की दिक्कत
पी.एम.ओ. में कार्यरत एक दक्षिण भारतीय आई.ए.एस. अधिकारी की पुत्री के विवाह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर बेहद वायरल हुआ था, जिसमें यह दावा हुआ था कि इस मौके पर भारत के माननीय राष्ट्रपति की अवहेलना हुई है और  प्रधानमंत्री की मौजूदगी में उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया। जैसे ही यह वीडियो ‘आप’ नेता आशुतोष को प्राप्त हुआ, उन्होंने एक चुभते हुए कमैंट के साथ इस वीडियो को ट्वीट कर दिया। ऐसा ही कुछ ‘आप’ नेता सोमनाथ भारती ने भी कर दिया। 

बाद में इस बारे में राष्ट्रपति भवन से भी स्पष्टीकरण जारी हुआ कि इस तस्वीर में जिन्हें राष्ट्रपति बताया जा रहा है, वे माननीय कोविन्द जी नहीं हैं। इस मामले की पड़ताल आगे बढ़ी तो पता चला कि यह कारस्तानी कांग्रेस के डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमैंट की है। दरअसल उस विवाह समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारी प्रधानमंत्री मोदी के साथ शामिल हुए थे, जिन्हें 
कोविन्द बता दिया गया। मामले के तूल पकड़ते ही आशुतोष और सोमनाथ दोनों ने फौरन अपने ट्वीट 
डिलीट कर दिए पर लोगों के जेहन में डर्टी ट्रिक्स की छाप जिन्दा रह गई।           

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