Tuesday, Jan 23, 2018

ब्लॉग: क्या इतिहास खुद को दोहराएगा

  • Updated on 1/12/2018

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की 14 जनवरी से 4 दिवसीय यात्रा भारत शुरू हो रही है। निश्चित रूप से इस यात्रा से दोनों देशों के संबंध और प्रगाढ़ होंगे। प्रस्तावित द्विपक्षीय वार्ता और सामरिक-व्यापारिक समझौतों के बीच मुंबई में नेतन्याहू का ‘फिल्मी दौरा’ यात्रा का सबसे रोचक पक्ष होगा, जो भारत और इसराईल के रिश्तों को नया आयाम प्रदान करेगा। 

वैश्विक मनोरंजन व्यवसाय में इसराईल मजहबी कारणों से ‘सांस्कृतिक बहिष्कार’ का दंश झेल रहा है। इस पृष्ठभूमि में एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,  मुंबई में व्यापारिक सम्मेलन के अतिरिक्त ‘शालोम बॉलीवुड’ नामक रंगारंग कार्यक्रम का भी आयोजन होना है। यहां नेतन्याहू बॉलीवुड के सफल भारतीय फिल्म निर्माता-निर्देशकों को इसराईल में शूटिंग करने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिसमें वह करों में छूट और अन्य सुविधाएं देने की घोषणा भी कर सकते हैं। खबरों की मानें तो गत वर्ष अक्तूबर में एक बॉलीवुड फिल्म की शूटिंग इसराईल के जफा और तेल-अवीव में हो भी चुकी है। 

इसराईली प्रधानमंत्री द्वारा मुंबई में फिल्मकारों से प्रस्तावित मुलाकात का मूल उद्देश्य केवल भारतीय फिल्म उद्योग को इसराईल में आमंत्रित करना ही नहीं है अपितु वैश्विक स्तर पर इस एकमात्र यहूदी देश के खिलाफ चल रहे प्रायोजित ‘बहिष्कार, विनिवेश और प्रतिबंध’  अर्थात् ‘बी.डी.एस.’ अभियान को मुंहतोड़ जवाब भी देना है। 

बॉलीवुड से पहले इसराईल हॉलीवुड को लुभाने का प्रयास कर चुका है। गत वर्ष ऑस्कर पुरस्कार के  लिए नामित 26 हस्तियों को इसराईल ने नि:शुल्क यात्रा सहित अन्य कई प्रस्ताव दिए थे। लगभग उसी दौरान ही ‘बी.डी.एस.’ संगठन की ओर से ऐसे प्रस्तावों का उपयोग न करने का आह्वान किया गया, जिसके बाद इसराईल की यह कोशिश विफल हो गई। इस आंदोलन का समर्थन अंतर्राष्ट्रीय जगत की कई नामी हस्तियां कर रही हैं, जिसमें वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंस भी शामिल हैं।

भारत और इसराईल में कई समानताएं हैं, जिसमें इन दोनों पर विदेशी आक्रांताओं के हमले का इतिहास  प्रमुख है। जहां भारत पर प्राचीनकाल में शक, यवन, हूण आदि के आक्रमण हुए और मध्यकाल में इस्लामी आततायियों और गिरजाघरों व ईसाई मिशनरियों के ‘मजहबी हमले’ का शिकार हुआ किन्तु कोई भी इस कालजयी संस्कृति को नष्ट नहीं कर सका। वहीं इसराईल पर पहले ईसाइयत और बाद में इस्लामी हमलों का अविरल दमनचक्र चला। भयावह उत्पीड़न और नरसंहार के कारण उन्हें अपने ही वतन से पलायन कर अन्य देशों में शरण लेनी पड़ी।

रूस, यूक्रेन, पूर्वी यूरोप में भी उन्हें घोर नृशंस यातनाएं सहनी पड़ीं। इसराईल यह सहर्ष स्वीकार करता है कि अपने दो हजार वर्ष के लंबे प्रवासकाल में यहूदी समुदाय को भारत में कभी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। इसराईल ने भी पच्चीस हजार भारतीय यहूदियों, जो अधिकतर महाराष्ट्र और केरल से थे और 1950-60 के दशक में इसराईल गए थे, उनको अपनी मुख्यधारा में अंगीकार किया। 

भारत-इसराईल के बीच कूटनीतिक संबंध 26 वर्ष पुराने हैं, किन्तु इतिहास साक्षी है कि दोनों देशों के लगभग 11 शताब्दी के अत्यंत लंबे समय से घनिष्ठ व्यापारिक रिश्ते हैं। गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनके ऐतिहासिक इसराईल दौरे में बेंजामिन नेतन्याहू को भेंट स्वरूप में दिए दो विशिष्ट उपहार उसका प्रत्यक्ष उदारहण है। वे दोनों तोहफे केरल से संबंधित थे, जिसमें प्राचीन ताम्र पट्टिकाओं की वह प्रतिलिपि है, जिन्हें तत्कालीन हिन्दू सम्राट चेरमन पेरुमल, जो भास्कर रवि वर्मा के नाम से भी विख्यात हैं, ने यहूदी नेता जोसेफ रब्बान को दी थी। जहां एक ताम्र पट्टिका में यहूदी समुदाय को दी गई सुविधाओं का उल्लेख था, तो दूसरी में यहूदियों से व्यापार का विस्तृत विवरण। 

भारत और इसराईल में विपत्ति के समय साथ देने की परंपरा, प्रथम विश्व युद्ध से जारी है। जहां इसराईल ने नि:स्वार्थ भाव से चीन के 1962 और 1965, 1971 व 1999 में पाकिस्तान के कायराना हमलों में भारत की सहायता की, वहीं इसराईल के हाइफा को वर्ष 1918 में स्वतंत्र बनाने में भारतीय शूरवीरों का बहुत बड़ा योगदान है। जहां हाइफा (इसराईल) में प्रत्येक वर्ष 23 सितम्बर को इन योद्धाओं के शौर्य को स्मरण किया जाता है, वहीं भारत में संकीर्ण राजनीति के कारण इस ऐतिहासिक युद्ध का कहीं उल्लेख तक नहीं है। 

इसी संकुचित मानसिकता का एक प्रमाण हमें वर्ष 1978 में भी मिलता है, जब इसराईली राष्ट्रपति अपने भारत दौरे के क्रम में दिल्ली हवाई अड्डे पहुंचे थे, तो तत्कालीन सरकार ने औपचारिक शिष्टतावश उनका स्वागत किया। सन् 1992 में गैर नेहरू-गांधी परिवार से रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत नरसिम्हा राव ने सर्वप्रथम इसराईल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। बाद में अटल जी के कार्यकाल में इसराईल के साथ राजनीतिक, वाणिज्यिक, सांस्कृतिक, विज्ञान व प्रौद्योगिकी, रक्षा आदि क्षेत्रों में व्यापक संबंध कायम हुए। जब सितम्बर 2003 में तत्कालीन इसराईली प्रधानमंत्री एरियल शेरोन भारत आए थे तब भी वामपंथियों और कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया किन्तु अटल जी ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। अब देखना होगा कि नेतन्याहू के आगामी भारत दौरे में पुरानी घोषित अवधारणाएं टूटेंगी या इतिहास स्वयं को दोहराएगा।

बलबीर पुंज
 

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