Tuesday, Jan 23, 2018

7वें वेतन आयोग से ये होगा रियल एस्टेट बाजार का वर्तमान हाल

  • Updated on 7/9/2016

Navodayatimesनई दिल्‍ली, टीम डिजिटल।  हाल के दिनों में रियल एस्टेट बाजार के लिए कई सकारात्मक खबरें आई हैं। सरकार ने रियल एस्टेट में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को स्वीकृति दी है, रीट्स के संबंध में भी कई सख्त नियमों में ढील लाई गई है और हाल ही में केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग की रिफारिशों को लागू किया गया है जिससे लाखों लोगों की जेब में ज्यादा पैसा जाएगा जिससे रियल एस्टेट को भी लाभ होने की सम्भावना देखी जा रही है। 

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इतना ही नहीं गत कुछ वक्त से बाजार में हल्का-सा सुधार होने की बात भी हो रही है। तो सवाल उठता है कि क्या घर खरीदने के लिए यह सही वक्त है?

दो तरह के खरीदार

रियल एस्टेट के उपभोक्ता मुख्यत: दो हिस्सों में बंटे हैं। एक वे जो अपने रहने के लिए घर खरीदना चाहते हैं तो दूसरे वे जिन्हें सम्पत्ति में निवेश करना है। अपने लिए घर चाहने वालों को उम्मीद है कि दाम अभी और कम होंगे और वे सही सौदे के इंतजार में हैं जबकि निवेश करने वालों की ङ्क्षचता है कि दाम बढ़ नहीं रहे या उतने नहीं बढ़ रहे जितनी उनकी उम्मीद है।

Navodayatimesखुद के लिए घर खरीदने वाले

प्रॉपर्टी कंसल्टैंसी फर्म कुश्मैन एंड वैकफील्ड की हालिया रिपोर्ट कहती है कि इस वर्ष जनवरी से मार्च के बीच देश के 8 बड़े शहरों में गत वर्ष की तुलना में 25 प्रतिशत ज्यादा नई आवासीय परियोजनाएं लांच हुई हैं।

इन शहरों में दिल्ली एन.सी.आर., मुंबई, पुणे, बेंगलूर और हैदराबाद जैसे शहर शामिल हैं। ये वे शहर हैं जिनकी रियल एस्टेट हलचल का असर देश के दूसरे शहरों में दिखता है। 

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रिपोर्ट के अनुसार ये नए लांच गत 2 वर्ष में हुए लांच की तुलना में 35 प्रतिशत तक सस्ते हैं। एक बार सुनने में यह बात अच्छी लगती है लेकिन अगर शहर दर शहर इन नए लांच को देखा जाए तो इनमें से ज्यादातर शहर के दूरदराज इलाकों में हैं जहां अभी न तो पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर है और न आवागमन की सही सुविधा। 

Navodayatimesदूसरा ये सभी नए लांच है जिसका मतलब यह कि इनकी डिलीवरी आने वाले 4 से 5 वर्ष में होगी जो असली ङ्क्षचता की वजह है। गत महीनों में देश की अलग-अलग अदालतों में बिल्डरों के खिलाफ कड़े फैसले सुनाए गए हैं। इनमें से ज्यादातर देश के नामी बिल्डर हैं और सबके खिलाफ निर्माण में लेटलतीफी, योजना में बदलाव और सेवाओं में कमी की शिकायतें थीं। 
यह किसी से छुपा नहीं है कि इस समय देश में रियल एस्टेट सैक्टर की हालत खस्ता है और बिल्डरों के पास पैसों की बहुत तंगी है, ऐसे में कुछ एक को छोड़ दें तो बाकियों पर यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि वे समय पर कब्जे दे पाएंगे। वहीं अगर नए लांच सस्ते भाव पर हो रहे हैं तो उसमें भी दूसरी तरह का गणित है। बिल्डरों ने घरों के आकार पहले के मुकाबले छोटे कर दिए हैं और दाम कम रखने की कोशिश की है। 

रिपोर्ट के अनुसार आकार में यह कमी 11 से 15 प्रतिशत तक है। हो सकता है बहुत से ग्राहकों को यह बात उतनी न अखरे लेकिन सस्ते के नाम पर घर की गुणवत्ता में भी कमी आ सकती है। 

ऐसे में खरीदारों के एक वर्ग यानी ‘एंड यूजर्स’ के लिए बाजार में कम कीमत का ऑफर तो है लेकिन दूर-दराज की लोकेशन और वक्त पर कब्जा मिलने तथा गुणवत्ता का सवाल बना रहेगा।

ऐसे में घर खरीदने का फैसला करना भी है तो इन बातों का ध्यान रखना ही होगा। विशेष रूप से यदि आप किसी नई लांच हो रही आवासीय परियोजना में घर खरीद रहे हों और यह नियम देश की हर रियल एस्टेट परियोजना पर लागू होता है।

निवेश के लिए खरीदारी करने वाले

रियल एस्टेट सैक्टर हमेशा से निवेश के लिए भारतीयों का पसंदीदा विकल्प रहा है। गत 50 वर्षों में प्रॉपर्टी निवेश पर मुनाफे को देखें तो इसने शेयर बाजार और स्वर्ण जैसे अन्य निवेश विकल्पों की तुलना बेहतर प्रदर्शन किया है परंतु मौजूदा वक्त में रियल एस्टेट बाजार तथा इसमें निवेश का तरीका बदल गए हैं। 

अब लोग पहले की तरह दशकों तक सम्पत्ति को अपने पास नहीं रखते और उसे जल्दी से जल्दी बेचकर मुनाफा कमाना चाहते हैं लेकिन वे भूल जाते हैं कि रियल एस्टेट एक ऐसा निवेश है जिसे मुनाफा देने के लिए भी वक्त चाहिए वह भी कम से कम 10 वर्ष का। 

निवेशकों में उतावली के पीछे एक बड़ा कारण है वर्ष 1996 से 2005 के बीच रियल एस्टेट बाजार का अंधाधुंध बढऩा। वह एक ऐसा दौर था जब देश में प्रॉपर्टी की मांग जोरों पर थी और भाव लोगों के बजट में लेकिन इसके बाद प्रॉपर्टी बाजार में भाव तेजी से बढ़े और इस हद तक बढ़े कि कई लोगों की पहुंच से ही बाहर हो गए।

चंद वर्षो में सम्पत्ति के मूल्यों के कई गुणा बढऩे से लोगों का इसके प्रति आर्कषण भी तेजी से बढ़ा लेकिन फिर आई वैश्विक मंदी जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई और इसका असर भारत पर भी पड़ा जहां इंफ्रास्ट्रक्चर और आवासीय सैक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। 

उस झटके से सम्पत्ति बाजार अभी तक नहीं उबर सका है। वहीं आज भी बड़े शहरों में सम्पत्ति की कीमतें लोगों के बजट में नहीं हैं जिससे निवेश करने वालों की दुविधा पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। 

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