यूपी में दिखाने होंगे दिखने वाले कदम

Navodayatimesनई दिल्ली/अकु श्रीवास्तव। अब जब एक-दो दिन में औपचारिक रूप से उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी विधायक दल का नेता चुन लिया जाएगा और उसके बाद देश के सबसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री बन जाएगा, अटकलें इस बात पर हैं कि किसे कांटों का ताज नसीब होगा।

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कांटों का इसलिए कि बहुआयामी प्रदेश की जितनी बुरी हालत है, उसे आप सतही तौर पर नहीं देख सकते। न ही इसे आप मायावती के बनाए पार्कों से आंक सकते हैं और न ही अखिलेश सरकार के दरार वाले एक्सप्रेस-वे से। न ही लखनऊ में मात्र बीस फीसद बन चुकी मेट्रो से। गरीबी, बदहाली, तार-तार होती कानून-व्यवस्था, गंदगी, बीमार अस्पताल, आत्महत्या करते किसानों वाले इस प्रदेश में जो भी नेतृत्व का भार संभालेगा, उसकी सांसें कितनी जल्दी फूल जाएंगी, यह उसकी क्षमता पर निर्भर तो होगा ही, साथ ही केंद्रीय नेतृत्व की दूरदर्शिता पर भी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा प्रमुख अमित शाह इस प्रदेश में सिर्फ अपनी पसंद का मुख्यमंत्री देकर ही नहीं बैठ सकते बल्कि काम होने, अपने लक्ष्य और भविष्य के स्वप्न को पूरा होते देखने के लिए अतिरिक्त सचेतता और निगरानी रखनी होगी।

सूत्रों के मुताबिक इसकी तैयारी भी हो गई है। पार्टी के स्तर के अलावा पीएमओ के स्तर पर यूपी के लिए अलग-अलग  निगरानी कक्ष भी बनाने की तैयारी हो गई है। किसी भी भाजपा शासित राज्य के लिए इतनी सतर्कता और निगरानी का काम नहीं किया जा रहा है। मतलब कुर्सी पर चेहरा कोई भी हो, उस पर पूरी नजर केंद्रीय नेतृत्व की होगी। यानी नीतियों और योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए सही रफ्तार और प्रबंधन के लिए पार्टी का वार रूम तो काम करेगा ही खुद पीएम भी मॉनिटरिंग करेंगे।

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दरअसल इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण 2019 का लोकसभा चुनाव और दूसरा बड़ा कारण हाल के चुनाव में भाजपा का विस्तृत हुआ और बदला वोट बैंक। इस बार के चुनाव में एक नई सोशल इंजीनियरिंग के तहत भारतीय जनता पार्टी ने यादव विहीन पिछड़े वर्ग और मायावती के वोट बैंक समझे जाने वाले अति दलित (जाटव विहीन दलित) को टिकट बांटने से लेकर उसपर लगातार काम करने के फार्मूले को सफलतापूर्वक जिस तरह से अंजाम दिया, वो उसको बनाए ही नहीं बढ़ाना भी चाहती है।

ताकि जो इस बार बसपा, सपा और अन्य के हिस्से से निकलकर कमल की तरफ 2012 की तुलना म ज्यादा आए 17 प्रतिशत वोट हमेशा के लिए साथ में जुड़कर रह जाएं। (यह बात दूसरी है कि पार्टी 2014 वाला कमाल नहीं दिखा पाई)।  पार्टी नेतृत्व को एक दिक्कत नहीं है। इस बार वो किसी भी ग्रुप या बड़े नेता के दबाव में नहीं है। वजह है भारी-भरकम बहुमत। फिलहाल की स्थिति में कोई महंत आदित्यनाथ, कोई कलराज मिश्र या कोई मुरली मनोहर जोशी किसी तरह का मोलभाव नहीं कर सकेंगे। हां, यह जरूर है कि इनको कोई न कोई जिम्मेदारी दी जाएगी।

इस तरह केंद्रीय नेतृत्व अपनी योजना के अनुसार किसी विधायक-सांसद को विधायक दल का नेता बना सकेगी। सरकार संभालने के साथ ही भाजपा को कई तरह से समस्याओं से ग्रस्त प्रदेश को दुरुस्त करने के लिए कई बड़े कदम उठाने होंगे, जिसमें सबसे पहले प्रदेश के किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा करनी होगी। इसके बाद कानून-व्यवस्था को सुधारने के लिए चाबुक चलाना होगा। इसके लिए धर्म संप्रदाय से ऊपर भी उठना होगा। भले ही इसके लिए उठापटक बड़े स्तर पर ही क्यों न करनी पड़े।

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दरअसल केंद्र की मोदी सरकार के वह काम जो दिखने वाले थे, उन सबने उप्र की जनता के बीच गजब का काम किया। उज्ज्वला योजना के तहत वितरित की गई गैस, किसानों का सस्ता बीमा,  जनधन खाते खुलवाना, नोटबंदी ने यूपी में करिश्मा कर दिया। इससे कहीं ज्यादा और दिखने वाले काम भाजपा को उप्र सरकार बनाने के बाद करने होंगे। दो साल बाद लोकसभा के चुनाव होंगे, इस बात को ध्यान में रखकर यूपी में तेज और प्रभावी कदम भाजपा को उठाने होंगे। इसके लिए काम के साथ राजनीति की गोटियों को भी सटीक ढंग से सेट करना होगा।

इसके लिए प्रदेश की चारों दिशाओं से खासकर पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिम से चुनकर आए नेताओं को सरकार में उप मुख्यमंत्री या बड़े विभाग वाला मंत्री बनाना होगा। साथ ही साथ उनको वहां विकास या सामाजिक समीकरणों को पक्का करने की जिम्मेदारी भी पूरी करनी होगी। यह भी तय माना जा रहा है कि राम मंदिर को पार्टी अब बड़ा मुद्दा नहीं मान रही है। अगर इस मोर्चे पर विफलता पर जनता ध्यान देती तो शायद भाजपा को इतना बड़ा बहुमत नहीं मिलता। 

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