न लाल बत्ती, न गनमैन; नियुक्तियों-बदलियों में कांग्रेसी राजनेताओं से सलाह-मशविरा भी नहीं

Navodayatimesनई दिल्ली/टीम डिजिटल। वास्तव में पिछली बादल सरकार के कार्यकाल के दौरान सिविल तथा पुलिस प्रशासन का इतना अधिक राजनीतिकरण हो गया था कि हर काम सियासी आकाओं की इच्छानुसार होता था। चाहे वह शराब के ठेके हों या रेत-बजरी के माइनिंग कांट्रैक्ट, बसों के परमिट हों या फिर टी.वी. चैनलों का प्रसारण। सब कुछ अकालियों को फायदा पहुंचाने के नजरिए से होता था।

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राजनीतिक प्रभाव से आजाद: इसी बात को ध्यान में रखकर अमरेंद्र सरकार अकालियों की कार्यशैली को खत्म करना चाहती है जिसके लिए वह प्रशासन को हर प्रकार के राजनीतिक प्रभाव से आजाद रखने में जुटी हुई है। अपनी कैबिनेट की पहली मीटिंग में हलका इंचार्ज सिस्टम को खत्म करने का ऐलान कर दिया गया था। अब इस सिलसिले में बाकायदा नोटीफिकेशन भी जारी कर दिया गया है।

सलाह: मंत्रियों को जनता से हलीमी से पेश आने की सलाह
मंत्री साधु सिंह धर्मसोत तब मुश्किल में आ गए जब उन्होंने प्रिंसीपल को इसलिए डांटा क्योंकि आधारशिला में उनका नाम सबसे नीचे था। अमरेंद्र ने न केवल खिंचाई की बल्कि आर्डर निकाला कि भविष्य में मंत्री का आधारशिला पर नाम नहीं होगा। उन्होंने मंत्रियों को जनता से हलीमी से पेश आने की भी सलाह दी। 

विरोध: ‘हिस्टोरिकल मैमरी लॉ’ पर अब मनप्रीत भी चुप
वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने कई बार सार्वजनिक तौर पर कहा कि वह अंग्रेजों के जमाने के दौरान बनाई गई इमारतों तथा स्थानों का नाम बदलने के लिए ‘हिस्टोरिकल मैमरी लॉ’ पास कराना चाहते हैं लेकिन कैप्टन अमरेंद्र सिंह के विरोध के बाद उन्होंने चुप्पी साध ली है।

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खिंचाई: शिक्षा मंत्री अरुणा के ऑफिस में पहुंचे थे उनके पति 

शिक्षा राज्यमंत्री अरुणा चौधरी उस समय मुश्किल में आ गईं जब सैक्रेटरिएट में उनके कार्यालय में उनके पति भी पहुंच गए और सरकारी फाइलों का मुआयना शुरू कर दिया। अमरेंद्र की खिंचाई के बाद यह सिलसिला बंद हो गया है।

वी.आई.पी. कल्चर को बढ़ावा 
वी.आई.पी. कल्चर को धड़ल्ले से बढ़ावा दिया गया। वाहनों पर लाल बत्ती लगाने की सुविधा तथा सुरक्षा के लिए गनमैनों की अलॉटमैंट भी अंधाधुंध होती रही। प्रशासन पर अपना पूरा कब्जा बनाने के लिए अकालियों ने पूरे राज्यभर में हलका इंचार्ज सिस्टम भी लागू कर दिया था जिससे गांवों, शहरों और कस्बों में हर छोटा-मोटा काम पार्टी के कार्यकत्र्ताओं के जरिए ही होता था। अकालियों ने अपने राज में इन सब बातों का फायदा तो बहुत उठाया लेकिन चुनाव के दौरान जनता की अदालत में उन्हें बुरी तरह नकार दिया गया।

कांग्रेसी चिंतित ‘कांफ्लिक्ट ऑफ इंट्रस्ट बिल’ को लेकर  भी कांग्रेसी चिंतित हैं। अकालियों के राज के दौरान कई नेता शराब के ठेकों, बसों, रेता-बजरी, केबल टी.वी. के व्यापार में संलिप्त थे। राजनीतिक संरक्षण होने के कारण उन्होंने अपने व्यापार को खूब बढ़ाया। अमरेंद्र इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए विधानसभा में ‘कांफ्लिक्ट ऑफ इंट्रस्ट बिल’ पास कराना चाहते हैं।

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छिन सकती है सदस्यता: यदि किसी मंत्री या विधायक का किसी व्यापार में कोई हिस्सा पाया जाता है तो वह विधानसभा की सदस्यता से हाथ धो बैठेगा। लेकिन कई कांग्रेसी दबी जुबान में इसका विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि वह वर्षों से ट्रांसपोर्ट, शराब इत्यादि के व्यापार में जुटे हुए हैं। यही उनकी आय का मुख्य साधन है। अब यदि विधायक बन गए हैं तो वह अपना व्यापार क्यों बंद करें?

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