अमरेन्द्र योगी की ‘धार’ से हरियाणा की मंडियों पर चली ‘कैंची’

Navodayatimesनई दिल्ली/दीपक बंसल। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह की ओर से गेहूं खरीद के लिए उठाए गए कदमों और किसान को समय पर पेमैंट के चलते अब वे पड़ोसी राज्यों में अपनी गेहूं बेचने के लिए नहीं जा रहे हैं। यही कारण है कि पंजाब से हरियाणा में जाने वाला लगभग 5 लाख मीट्रिक टन गेहूं अब नहीं जाएगा।

एसवाईएल को लेकर हथीन के लोगों ने दिल्ली में किया प्रदर्शन

वहीं, दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों के बाद वहां के किसान भी हरियाणा की ओर रुख नहीं कर रहे हैं। गौरतलब है कि यू.पी. से हरियाणा की मंडियों में 10 से 15 लाख मीट्रिक टन गेहूं बिक्री के लिए जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। यही कारण है कि अब हरियाणा की मंडियों में जहां पंजाब और यू.पी. का गेहूं बिकने के लिए नहीं आया है वहीं, हरियाणा की खरीद एजैंसियों के लिए निर्धारित लक्ष्य पूरा करना चिंता का विषय बना हुआ है।
पहले जैसा माहौल नहीं

प्रदेश की मंडियों में बाहरी राज्यों से गेहूं आने से भीड़ बढ़ जाती थी, लेकिन इस बार पहले जैसा माहौल नहीं है। हालांकि विपक्षी दल खरीद व्यवस्था के उचित प्रबंध नहीं होने का शोर मचा रहे हैं लेकिन इस बार बाहरी राज्यों का गेहूं न आने से भीड़ में कमी देखी गई है। अधिकारी दावा कर रहे हैं कि प्रबंधों के चलते जाम जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन बड़ा कारण बाहरी राज्यों के किसानों का न आना है।

हरियाणा की खरीद एजैंसियों के बीच चिॆता का कारण बना हुआ है लक्ष्य
यू.पी. तथा पंजाब का गेहूं मंडियों में न आने से प्रदेश की खरीद एजैंसियां निर्धारित लक्ष्य को कैसे पूरा कर पाएंगी, यह सवाल एजैंसियों में चिंता का कारण बना हुआ है। बंपर फसल को देखते हुए इस बार खरीद का लक्ष्य 75 लाख मीट्रिक टन निर्धारित किया गया था लेकिन गेहूं आवक की जो स्थिति है उसे देखते हुए यह पिछले वर्ष की आवक का मुकाबला भी शायद ही कर पाए। पिछले वर्ष करीब 67 लाख मीट्रिक टन गेहूं की आवक हुई थी।

पंजाब: गुरदासपुर में भरे बाजार में गैंगवार, गोली लगने से दो लोगों की मौत

यू.पी. : एम.एस.पी. के अलावा परिवहन खर्च भी
हरियाणा में हर वर्ष यू.पी. से 10 से 15 लाख मीट्रिक टन गेहूं बिकने के लिए आता था। हरियाणा के जिलों सोनीपत, पानीपत, करनाल, फरीदाबाद तथा पलवल में इस बार यू.पी. का गेहूं बिकने नहीं आया, क्योंकि यू.पी. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वहां के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए थे कि यहां का गेहूं अन्य प्रदेशों में नहीं बिकना चाहिए। यू.पी. सरकार ने यह फैसला भी लिया कि किसानों को एम.एस.पी. के अतिरिक्त परिवहन खर्च भी दिया जाएगा।

10 रुपए प्रति किंवटल के हिसाब से किसानों को मंडियों में गेहूं लाने का किराया दिया जाएगा। इसका असर यह रहा कि जो किसान नाकों को पार करके हरियाणा में गेहूं बेचने आता था, इस बार वह अपने प्रदेश में गेहूं बेच रहा है। पलवल तथा करनाल में सबसे ज्यादा यू्.पी. का गेहूं बिकने आता था लेकिन इस बार हरियाणा की मंडियां यू्.पी. के गेहूं की बाट जोह रही हैं।

पंजाब : सी.सी. लिमिट बनने से समय पर पेमैंट
पंजाब में पहले किसानों को गेहूं खरीद का भुगतान समय पर नहीं होता था और इसका असर यह होता था कि वहां के किसान हरियाणा के साथ लगते जिलों की मंडियों में अपना गेहूं बेचने आते थे। पंजाब से हरियाणा में करीब 5 लाख मीट्रिक टन गेहूं बिकने आता था और सिरसा, फतेहाबाद, कैथल तथा अंबाला जिलों की मंडियों में पंजाब के किसानों का गेहूं बिकता था लेकिन इस बार पंजाब का किसान अपने ही प्रदेश की मंडियों में गेहूं बेच रहा है। इसके पीछे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरेन्द्र के प्रयासों के चलते पंजाब की सी.सी. लिमिट बन गई और किसानों को समय पर गेहूं खरीद की पेमैंट मिल रही है, जिसके चलते वह हरियाणा की तरफ रुख ही नहीं कर रहे। 

सभी राज्य केन्द्रीय पूल के लिए अनाज की खरीद करते हैं। किसान को सही भाव मिलना चाहिए। हरियाणा में खरीद व्यवस्था के पुख्ता प्रबंध हैं, इसलिए पड़ोसी राज्यों के किसान यहां आते थे। हां, इस बार पड़ोसी राज्यों से गेहूं की आवक नहीं हुई है। वहां सरकारों ने खरीद के पुख्ता प्रबंध किए होंगे जिससे किसान अपने राज्यों में फसल बेच रहे हैं।

खड्डों की ऑनलाइन नीलामी से 300 करोड़ अधिक राजस्व जुटाएगी सरकार

-एस.एस. प्रसाद, अतिरिक्त मुख्य सचिव, खाद्य आपूर्ति विभाग, हरियाणा

हरियाणा को नहीं लगाने पड़े सीमाओं पर नाके
यू.पी. व पंजाब की गेहूं को हरियाणा में आने से रोकने के लिए पहले दोनों सीमाओं पर पुलिस नाके लगते थे। इस बार हरियाणा को एक भी नाका नहीं लगाना पड़ा। नाकों के बावजूद मंडियों में लाखों मीट्रिक टन गेहूं आता था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि नाकों पर क्या खेल चलता होगा? ऐसे मामले भी आते थे कि हरियाणा, यू.पी. और पंजाब के व्यापारियों में मिलीभगत का खेल होता था जिससे पड़ोसी राज्यों के व्यापारी फसल बेच जाते थे। इस बार ऐसे मामलों से भी राहत मिल गई है।

वहीं, पड़ोसी राज्यों के किसान की गेहूं यहां आती जरूर थी, लेकिन पूरा भाव नहीं मिलता था क्योंकि व्यापारी की मार्फत अगर गेहूं आई है तो वह किसान को पूरा भाव क्यों देगा ? दूसरा किसान यहां आता था तो मजबूरी में कम दाम पर गेहूं बेचना पड़ता था। अब जब अपने ही राज्य में फसल बेच रहे हैं तो ऐसी लूट पर भी लगाम लगी है।

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।

FacebookGoogle+TwitterPinterestredditDigglinkedinAddthisTumblr