सीपीईसी से दक्षिण एशिया का बदलेगा सैन्य संतुलन 

Navodayatimesनई दिल्ली/राजीव मिश्र । चीन और पाकिस्तान के बीच 46 अरब डॉलर की लागत से बनने वाली चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) से भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है क्योंकि चीन को इससे न केवल दक्षिण एशिया में सैन्य गतिविधियां बढ़ाने का मौका मिलेगा बल्कि सामरिक महत्व की ग्वादर बंदरगाह भी हाथ लगेगी और पश्चिमी चीन को अरब सागर के व्यापार मार्ग के दोहन का सुनहरा अवसर भी मिलेगा।

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चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा के लिए 5 जुलाई, 2013 को किए गए करार में एक बात बिल्कुल स्पष्ट थी कि इस पूरे प्रकरण का पूरा-पूरा लाभ सीधे तौर पर चीन को मिलेगा। चीन द्वारा आर्थिक गलियारे के लिए किए जाने वाले पूंजी निवेश का अनुबंध भी चीन के हित में था। चीन का पाकिस्तान में पूंजी निवेश ऋण के तौर पर इस शर्त के साथ था कि इस कार्य को चीन की कंपनी पूरा करेगी व इसका प्रबंधन और क्रियान्वयन भी चीन की कंपनी ही देखेगी।

इस मामले में भारत का चिंतित होना जायज भी है। ग्वादर बंदरगाह का चीन के हाथ चला जाना, व्यापारिक तौर पर भारत के लिए अहितकर है। ग्वादर बंदरगाह के पास ही भारत समर्थित व ईरान नियंत्रित चाबहार बंदरगाह है और निश्चित तौर पर अब चाबहार व ग्वादर बंदरगाह के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

चाबहार बंदरगाह पर भारत के निवेश के पीछे मंशा न सिर्फ भारत-ईरान व्यापार को बढ़ाने की है बल्कि अफगानिस्तान के साथ-साथ मध्य एशिया में भी भारत के व्यापार व कूटनीतिक पकड़ को बढ़ावा देने की है। भारत ने पहले ही ईरान की सीमा और अफगानिस्तान को जोडऩे वाली सड़क पर 600 करोड़ रुपए की पूंजी निवेश कर रखा है। पाकिस्तान और चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर भी नजर रखने में चाबहार बंदरगाह भारत के लिए मददगार होगा। 

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क्या भारत को कूटनीतिक आक्रामकता बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है? विवादित क्षेत्र के नाम पर अगर चीन, दक्षिण चीन सागर में भारत द्वारा तेल उत्खनन किए जाने का विरोध करता है तो क्या भारत को पीओके से गुजरने वाले सीपीईसी का पुरजोर विरोध नहीं करना चाहिए था? 2013 में हुए गलिायारे  के इस करार का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने उसी समय पुरजोर विरोध क्यों नहीं किया, यह बात भी समझ में नहीं आती।

वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, बु्रनेई और ताईवान के विरोध के बावजूद चीन पूरे दक्षिण चीन सागर पर सम्प्रभुता का दावा करता है और इसमें उसे कोई अनर्गल बात नजर नहीं आती, वहीं अनधिकृत तौर पर पाकिस्तान द्वारा हड़पे गए जमीन (पीओके) पर सीपीईसी गलियारे के लिए सड़क बनाए जाने के भारत के अब के विरोध को यह कहकर खारिज कर देता है कि यह दरअसल उस क्षेत्र को विकसित करेगा। यह किस तरह का तर्क है?

हद तो तब हो जाती है जब चीन यह कहता है कि वह पाकिस्तान को आतंकवाद का समर्थक नहीं मानता और पाकिस्तान के दक्षिणी कमान के कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल रियाज की ओर से भारत को सीपीईसी से जुडऩे के मखौलिया आमंत्रण को स्वीकार कर लेने की सलाह देता है। क्या यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं है?

चाबहार हो सकता है कूटनीतिक जवाब 
चाबहार बंदरगाह में भारत की गतिविधि और उसकी सुरक्षा में भारत की सक्रियता को एक सही रणनीति के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि, चीन इस आर्थिक गलियारे से सिर्फ  व्यवसायिक लाभ की ओर नहीं देख रहा बल्कि उद्देश्य दक्षिण एशिया में सैन्य गतिविधि को बढ़ाने का भी है इसलिए इस गलियारे के कई प्रोजेक्ट की व्यवसायिक सफलता संदेहास्पद होने के बावजूद चीन के बैंकों का पूंजी निवेश इस क्षेत्र में जारी है। भारत के लिए यह जरूरी है कि इस पूरे भौगोलिक क्षेत्र पर नजर गड़ाए रखे और सभी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय  मंचों पर चीन की इस नापाक मंशा का आक्रामक विरोध करता रहे। 

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आर्थिक गलियारे से बढ़ेगी भारत की परेशानी 
दरअसल यह चिंता दक्षिण एशिया की सैन्य संतुलन से जुड़ी है। आर्थिक गलियारे व ग्वादर बंदरगाह की सुरक्षा की जिम्मेदारी पाक फौज के पास थी लेकिन जैसी उम्मीद थी, चीन ने इसे पाक के भरोसे नहीं छोड़ा। अभी हाल ही में चीन ने अपने 2 नौसैनिक जहाज ग्वादर बंदरगाह की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान को सौंपे हैं और संयुक्त रूप से दोनों देशों की फौजें सुरक्षा की जिम्मेदारी सम्भाल रही है। चीन और दो नौसैनिक जहाज पाकिस्तान को जल्द ही सौंपेगा, अभी दोनों नौसैनिक जहाज निर्माणाधीन है। नि:संदेह इसे दक्षिण एशिया में चीन की सैन्य गतिविधियों के बढऩे की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है और यही भारत की सबसे बड़ी ङ्क्षचता का विषय भी है।
‘मार्शल योजना’ जैसी है चीन की रणनीति 
चीन की रणनीति ठीक वैसी ही है जैसी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के पुनॢनमाण के लिए योजना बनी थी, जिसे ‘मार्शल योजना’ के नाम से भी जाना जाता है, जहां अमरीका की तरफ  से यूरोपिय देशों में पूंजी निवेश तो किया गया लेकिन बड़े शातिर तरीके से वसूली भी की गई। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में निवेश भी ‘मार्शल योजना’ की तर्ज पर ही है और पाकिस्तान को इस पूरे खेल में निराशा ही हाथ लगेगी।

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