नरेंद्र मोदी का ग्लोबल ड्रीम, जानें क्यों 'दुश्मन' बने ये देश

Navodayatimesनई दिल्ली/टीम डिजिटल। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में एच1बी वीजा नियमों को सख्त कर दिया है। उन्होंने ये भारतीय आईटी कंपनियों पर इल्जाम लगाया है कि वह अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीनने का काम कर रही हैं।

अमेरिका की तरह ऑस्ट्रेलिया सरकार ने भी अपने 457 वीजा कार्यक्रम को बंद कर दिया था। इसी वीजा के तहत विदेश में काम करने वाले वहां पहुंचते थे। ये भी साफ है कि दोनों ही देशों के इन फैसलों का सीधा असर भारत की आईटी कंपनियों पर पड़ेगा।

वीजा बंद किए जाने से पहले ऑस्ट्रेलिया में ये वीजा प्रतिवर्ष लगभग 60 फीसदी और अमेरिका में 70 फीसदी भारतीयों को दिया जाता है। लेकिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को भारतीय आईटी कंपनियां जैसे इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो से दबाव महसूस हो रहा है।

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भारतीय कंपनियों का रोल
दोनों अमेरिका का एच1बी वीजा कार्यक्रम और ऑस्ट्रेलिया का 457 वीजा कार्यक्रम नॉन-इमीग्रेंट वीजा है। इसी वीजा के तहत अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की कंपनियां विदेशों से इंजीनियर, साइंटिस्ट और कंप्यूटर प्रोग्रामर को अपने देश में नौकरी करने के लिए बुलाती हैं।

इसके लिए ज्यादातर भारतीय कंपनियों को काम आउटसोर्सिंग करने के लिए वीजा दिए जाते हैं। भारतीय कंपनियां अपने हिसाब से विदेशी कंपनियों के लिए भारत से लोगों को नौकरी के लिए अमेरिका भेजती हैं। 

डोनाल्ड ट्रंप का आरोप
ट्रंप ने आरोप लगाया है कि भारतीय कंपनियां एच-1बी वीजा नियमों का उल्लंघन किया है और अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों पर भारतियों को नौकरी दी है।

ट्रंप का कहना है कि भारतीय आईटी कंपनियां ऐसे लोगों को भी अमेरिका बुलाकर नौकरी दे रही हैं जिनकी जगह कम लागत में अमेरिकियों से काम कराया जा सकता है। यही आरोप ऑस्ट्रेलिया में भारतीय कंपनियों पर लगाए गए हैं।

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अमेरिका का प्रस्ताव
ट्रंप सरकार ने एच1बी वीजा के दुरुपयोग को रोकने के लिए ये कदम उठाया है। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि एच1बी वीजा के तहत न्यूनतम सैलरी के मौजूदा दर 60 हजार डॉलर से बढ़ाकर 1 लाख 30 हजार डॉलर कर दिया जाए। यदि इस प्रस्ताव के कांग्रेस से मंजूरी मिलते ही भारतीय कंपनियों के लिए कड़ी चुनौती खड़ी हो गई है क्योंकि उन्हें अपनी ज्यादातर जरूरतों के लिए अमेरिकी नागरिक को नौकरी देनी पड़ेगी।

भारतीय कंपनियों का नुकसान
एच1बी वीजा में बदलाव होते ही वहां काम कर रही भारतीय आईटी कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन कम हो जाएगा। वहां किसी काम को करने के लिए कम लागत वाले प्रोफेश्नल्स को भारत से बुलाया जाता था। अब इन कंपनियों को भारतीय कर्मचारियों को अधिक तनखा देनी पड़ेगी नहीं तो काम कराने के लिए किसी अमेरिकी नागरिक को नौकरी पर रखना पड़ेगा।

यदि अमेरिका में एच1बी वीजा के तहत न्यूनतम वार्षिक सैलरी को बढ़ाकर 1 लाख 10 हजार डॉलर किया जाता है तो टीसीएस के प्रॉफिट मार्जिन में 2.30 फीसदी का नुकसान होने की संभावना है। मौजूदा समय में टीसीएस इस वीजा पर भारत से ले जा रहे प्रोफेश्नल्स को लगभग 70 हजार डॉलर औसतन वार्षिक सैलरी देती है।

वहीं दूसरी बड़ी कंपनी इंफोसिस को नए नियम के बाद प्रॉफिट मार्जिन में लगभग 1.70 फीसदी का नुकसान होगा। इंफोसिस मौजूदा समय में लगभग 80 हजार डॉलर औसतन वार्षिक सैलरी देती है।

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ग्लोबल ड्रीम
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'ग्लोबल ड्रीम' को सभी के सामने रखा था। उनके इस सपने का मतलब उन्होंने मैडिसन स्क्वायर स्पीच में समझाया था। उन्होंने कहा था कि जैसे पूरी दुनिया से लोग अमेरिका आते हैं वैसे ही भारत से लोग पूरी दुनिया में भी जाते हैं।

यहां स्किल डेवलपमेंट पर जोर देते हुए मोदी ने कहा था कि उनकी यही कोशिश रहेगी कि पूरी दुनिया में भारतीय स्किल की जरूरत पड़े। इस कारण से भारत पूरी दुनिया में काम करने वालों को भेज सके। लेकिन ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के उठाए गए कदम के बाद प्रधानमंत्री के इस ग्लोबल ड्रीम के सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो चुकी है।

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