Saturday, Apr 17, 2021
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2021 budget will be presented amid corona epidemic aljwnt

2021 का बजट कोरोना महामारी के बीच होगा पेश

  • Updated on 1/20/2021

सुधार कोई एक बार होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह शासन की गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य से हमेशा जारी रहती है। ‘सुधार, प्रदर्शन, परिवर्तन’ के क्रम में अंतिम शब्द- ‘परिवर्तन’ सबसे अहम है, क्योंकि इससे स्पष्ट रूप से लक्ष्य का निर्धारण होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) ने अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही अपनी सरकार के लिए यह कार्य तय कर दिया था। ‘परिवर्तन ‘का लक्ष्य तय था और है जबकि सुधार और प्रदर्शन इस दिशा में बढऩे के माध्यम हैं।

आम बजट विशेष लक्ष्यों के निर्धारण और उन्हें हासिल करने के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक है। इन विशेष लक्ष्यों में से उन्हें सबसे पहले पूरा किया जाना चाहिए जो जनता के समग्र लाभ से जुड़े हैं। सरकार का वाॢषक बजट 30 लाख करोड़ रुपए का है और व्यय के मद सावधानी से चुने जाने चाहिएं, क्योंकि चयन से ही उसकी नीति की दिशा का पता चलता है।
2014-15 के अपने बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेतली ने कहा था, ‘‘इस एन.डी.ए. सरकार के पहले बजट में, जिसे मैं गरिमापूर्ण सदन में पेश कर रहा हूं, मेरा उद्देश्य उस दिशा के लिए समग्र नीतिगत संकेतक तैयार करना है जहां हम देश को ले जाना चाहते हैं।’’ 

‘रोलेट एक्ट’ की तरह कृषि कानून किसानों पर जबरदस्ती थोप दिए

हमारे इर्द-गिर्द फैले शोर-शराबे में, हम 10 जुलाई, 2014 को जेतली द्वारा प्रस्तुत उनके पहले बजट में और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी, 2021 को पेश किए जाने वाले बजट के बीच मोदी सरकार द्वारा किए गए प्रमुख सुधारों से मिले संदेश को भूल गए होंगे।

गत साढ़े 6 सालों के दौरान कई परिवर्तनकारी और जीवन को बदलने वाले सुधार हुए हैं, लेकिन इस दिशा में प्रगति जारी है और आगे भी जारी रहनी चाहिए। कुल मिलाकर, 135 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं को निरंतर ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ के बिना हासिल नहीं किया जा सकता है।

अपने पहले बजट में जब रक्षा विनिर्माण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने के समान ही बीमा क्षेत्र में ऐलान करके, एन.डी.ए.सरकार ने सिर्फ सुधारों को ही गति दी है। रक्षा क्षेत्र में एफ.डी.आई. को स्वचालित रूट से 74 प्रतिशत तक और आधुनिक तकनीक तक पहुंच उपलब्ध कराने पर उससे भी ज्यादा सीमा तक के लिए खोल दिया गया है।

किसान आंदोलन गांधीवादी सत्याग्रह की अद्भुत मिसाल

चालू वित्त वर्ष के दौरान सरकार विनिवेश की दिशा में आगे बढ़ नहीं पा रही है और कोविड-19 महामारी के चलते भी इसमें देरी हुई है, ऐसे में बी.पी.सी.एल., कॉनकोर और एस.सी.आई. जैसे ब्लूचिप पी.एस.यू. की एकमुश्त रणनीतिक बिक्री का फैसला लिया गया है। ऐसी रणनीतिक बिक्री सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान मारुति उद्योग और बाल्को जैसी कम्पनियों की हुई थी। मोदी सरकार द्वारा गैर-प्रमुख संपदाओं के मौद्रीकरण के लिए दूरगामी सुधारों को स्वीकृति देने का फैसला किया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि पी.एस.यू. बैंक, जिनका 12 में विलय कर दिया गया है, भी गैर प्रमुख क्षेत्रों में आते हैं।

वास्तव में, ऐसे दौर में जब वित्तीय स्थिति दबाव में है, कोविड वैक्सीन टीकाकरण को लागू करने और 29.87 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर भारत पैकेज सहित स्वास्थ्य के लिए जरूरी प्रतिबद्धताओं को देखते हुए बड़े मैट्रो शहरों में रियल एस्टेट परियोजनाओं के साथ ही गैर-मुख्य सरकारी संपदाओं की त्वरित बिक्री जरूरी हो गई है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के पांच साल

यदि आप उन लोगों में से हैं जो पूंजी बाजार को सट्टा मानते हैं तो आपके लिए एक और आंकड़ा है, जो बताता है कि कैसे वैश्विक निवेशक भारत के साथ आगे चलना चाहते हैं। वित्त वर्ष 2020-21 के शुरूआती 6 महीनों में ग्रीनफील्ड और ब्राऊनफील्ड परियोजनाओं में लगभग 30 अरब डॉलर का एफ.डी.आई. आया। यदि अनुमान को सीमित रखें तो भी वित्त वर्ष’ 21 में एफ.डी.आई. प्रवाह आसानी से 50 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा। भू-राजनीतिक वजहों और अमरीका में राष्ट्रपति जो बाइडेन के चीन पर नरम नहीं पडऩे की वास्तविकता को देखते हुए, भारत को दुनिया की दिग्गज विनिर्माण कम्पनियों के लिए एक गंभीर विकल्प माना जा रहा है। प्रधानमंत्री ने हाल में भारतीय उद्योग जगत को सलाह दी थी कि हमें सतर्क रहना चाहिए और तेजी से बदले वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य का सामना करने के लिए मुस्तैद रहना चाहिए। पड़ोस में चीन जैसा एक बड़ा विनिर्माण हब होने के कारण यह काम बेहद जरूरी हो जाता है।

आगामी बजट पहले के बजट से काफी अलग होने जा रहा है। नि:संदेह वित्त मंत्री पर संसाधन जुटाने का खासा दबाव है, लेकिन एफ.आर.बी.एम. की लक्ष्मण रेखा यानी राजकोषीय घाटे को पार करने को लेकर उन पर इस बार नजर नहीं रहेगी। यह नया दौर हो सकता है; ज्यादातर विश्लेषक मानते हैं कि व्यय को कम नहीं रखा जा सकता है। इसके अलावा यह बजट कोरोना महामारी संकट के बीच में आ रहा है, इसलिए सरकार को पिछले छह साल के सुधारों पर आगे बढऩा होगा। बदलाव की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।

- प्रकाश चावला

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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