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after independence the politics of punjab revolved around lala ji aljwnt

आजादी के बाद ‘पंजाब की राजनीति’ लाला जी के इर्द-गिर्द ही घूमती रही

  • Updated on 9/10/2020

यह एक वास्तविकता है और ऐतिहासिक सत्य भी कि 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद जब पंजाब केसरी पत्र समूह (Punjab Kesari Group) के संस्थापक पूज्नीय लाला जगत नारायण जी (Lala Jagat Narayan) अपने परिवार समेत लाहौर से जालंधर पधारे और लाहौर की भांति ही यहां आकर भी उन्होंने सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर भाग लेना शुरू कर दिया तो धीरे-धीरे समय बीतने के साथ-साथ राजनीति पर इनकी पकड़ और छाप मजबूत होती गई और फिर स्थिति यह आई कि लाला जी पंजाब की राजनीतिक गतिविधियों की डोरी और केंद्र बिन्दू बन गए। 

यह उनके व्यक्तित्व का चमत्कार था कि देश के बहुत से चोटी के नेता और राजनीतिज्ञ इनका सम्मान करते और देश के सामने पेश समस्याओं पर इनसे सलाह-मशविरा करना भी जरूरी समझते थे। लाला जी और हिन्द समाचार से मेरा संबंध आधी सदी से भी अधिक का है और इस समय में लाला जी ने न केवल पंजाब बल्कि काफी हद तक देश की राजनीति को भी प्रभावित किया। लाला जी पंजाब कांग्रेस के चोटी के नेता थे। वह पंजाब मंत्रिमंडल में कैबिनेट दर्जा के मंत्री भी बने और उनके पास शिक्षा एवं ट्रांसपोर्ट विभाग थे। 

शिक्षा में ‘क्रांति’ का तरीका

उन्होंने बंटवारे के बाद पंजाब की ज्वलंत समस्याओं, पाकिस्तान से उखड़ कर इधर आए लाखों लोगों को बसाने में सहायता करने में दिन-रात एक कर दिया। उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए पर वो हर मुश्किल दौर से  सुर्खरू होकर निकले। चाहे उनके प्रिंटिंग प्रेस की बिजली काट कर हिन्द समाचार ग्रुप समाचार पत्रों को बंद करवाने का षड्यंत्र रचा गया अथवा आपातकाल के दौरान इनके समाचार पत्र का काफिला रोकने का सिलसिला शुरू हुआ परन्तु लाला जी ने अपने सम्मान और प्रतिष्ठा को हमेशा बुलंद रखा। 

लाला जी ने उस वक्त (1975) के हाकमों और स्थानीय अधिकारियों को गर्जदार आवाज में बताया कि उन्होंने अंग्रेजों के समय की जेलें काटी हुई हैं अत: उनको न तो गिरफ्तार होने का डर है और न ही जेल जाने का। जब सरकार ने उनको गिरफ्तार किया तो इस अवसर पर सैंकड़ों लोग उमड़ पड़े थे और उन्होंने आपातकाल के विरुद्ध और लाला जी जिंदाबाद के नारे लगाए थे। आपातकाल का समय सचमुच बहुत ही भयानक था। अधिकतर विरोधी दलों के राष्ट्रीय, प्रादेशिक और जिला स्तर तक के नेताओं और पदाधिकारियों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। 

‘सन् 1885, कांग्रेस का जन्म, कारण और जन्मदाता’

तब श्री जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवानी आदि को विभिन्न जेलों में ठूंस दिया गया। यहां तक कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के उस वक्त के सदस्य चंद्रशेखर को भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर कैदखाने में डाल दिया गया था। हालांकि चंद्रशेखर तो कांग्रेस में ही थे परन्तु वो पार्टी के अंदर इंदिरा गांधी के सबसे बड़े आलोचक भी थे। इस तरह 19 महीनों तक समूचे विरोधी पक्ष को लोगों की नजरों से ओझल कर दिया गया, समाचार पत्रों पर सैंसर बिठाकर उनकी आवाज को दबा दिया गया। 

जनसाधारण के मौलिक अधिकारों को आपातकाल की आड़ में छीन लिया गया। विडम्बना तो यह हुई कि शासन ने नेताओं को तो जेलों में डाला ही था तो दूसरी ओर सारी की सारी आबादी के मौलिक अधिकार भी छीन लिए। सचमुच यह कालखंड बहुत भयानक था। लाला जी को पुलिस ने जब जालंधर से गिरफ्तार किया तो उनको ज्यादा समय तक पटियाला जेल में रखा गया था। कांग्रेस के बागी नेता श्री चंद्रशेखर को भी कुछ समय के बाद इसी जेल में लाया गया। पटियाला जेल में लाला जी के रहने के इस समय के दौरान उनके सुपुत्र श्री विजय चोपड़ा रोजाना जालंधर से कार द्वारा पटियाला जाते थे और घर का बना ताजा भोजन, जो लाला जी की पसंद का ही होता था, बिना नागा पहुंचाते रहे। जाते हुए वह प्रतिदिन हिन्द समाचार, पंजाब केसरी एवं अन्य समाचार पत्र की प्रतियां साथ ले जाते थे। 

लगता है सरकार ने कोरोना से अपने ‘हाथ धो लिए’

श्री चंद्रशेखर को भी जब जेल में यह समाचार पत्र देखने को मिले तब उनको पता लगा कि लाला जी यहीं जेल में हैं और उनके कारण ही यह समाचार पत्र उनको आज देखने को मिले हैं वर्ना तो हालत यह थी कि  जेल में किसी को भी उस समय प्रकाशित होने वाले किसी अखबार को दिखाए जाने की इजाजत नहीं थी। 

आखिरकार 19 महीनों के पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने मजबूर होकर एमरजैंसी की पाबंदियां नरम कीं और आम चुनाव करवाने की घोषणा कर दी, क्योंकि तब तक उन पर देश-विदेश से काफी विरोध और दबाव पड़ रहा था। इस हालत में विरोधी नेताओं को रिहा कर दिया गया और लाला जी भी रिहा हो गए। वैसे तो इंदिरा गांधी ने विरोधी पक्ष की एकता (जो जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बन रही थी) को खत्म करने के लिए इन सभी नेताओं को पकड़ कर जेल में डाला था परन्तु जेलों में इतना समय रहने के दौरान यह स्वाभाविक था कि इन नेताओं को आपसी सोच-विचार करने का एक सुनहरी मौका मिल गया। 

नेहरू-गांधी परिवार की मुट्ठी में बंधी पार्टी में कोई कुर्सी खाली नहीं

तब इन सभी नेताओं में यह सहमति बनी कि देश में लोकतंत्र एवं जनता के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए समस्त लोकतांत्रिक पाॢटयों में एकता होनी ही चाहिए।  इस समूची एकता का नाम जनता पार्टी रखा गया और सारे देश में जनता पार्टी के नेतृत्व में आम चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी गई। सीटों का बंटवारा राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक नेतृत्व में समुचित रूप से सुलझा लिया गया। 

पंजाब में लोकसभा के चुनाव जब होने लगे तो मैंने देखा कि लाला जी ने पंजाब से लोकसभा की 13 की 13 सीटें यकीनी रूप से जनता पार्टी द्वारा जीते जाने के लिए फार्मूला बनाया। लाला जी ने अकाली नेताओं प्रकाश सिंह बादल और गुरचरण सिंह टोहरा एवं जनसंघ के प्रादेशिक नेताओं को सलाह दी कि इन सभी सीटों पर प्रादेशिक स्तर के बड़े नेता खड़े किए जाएं, तभी कांग्रेस को हराया जा सकेगा। यही हुआ और पंजाब की 13 लोकसभा सीटें जनता पार्टी की लहर में समूची विरोधी एकता ने जीत लीं और कांग्रेस के पैर बुरी तरह उखड़ गए। तब सारे देश में जनता पार्टी को बेमिसाल जीत हासिल हुई और कांग्रेस सारे देश में लोकसभा की अधिकांश सीटें हार गई और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा। 

तब लाला जी ने पंजाब में विरोधी पक्ष के उम्मीदवारों को सफल बनाने में दिन-रात एक कर दिया था। उन्होंने चुनाव मुहिम के लिए रणनीति बनाई और स्वयं भी कई स्थानों पर जाकर जनता पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में भाषण दिए और जनमत को जागृत किया। तब 13 में से 9 सीटों पर अकाली और 4 पर जनता पार्टी के उम्मीदवार जीते थे। इससे पहले अकाली दल की तरफ से 2 से ज्यादा लोकसभा के मैंबर कभी भी जीत कर नहीं जा सके थे। अकाली दल के इन 9 सदस्यों की लोकसभा के लिए जीत लाला जी की दूर-अंदेशी के कारण ही हुई। 

सिख, सिख पंथ तथा संस्थाएं हुईं ‘बदनाम’

यही नहीं लाला जी ने जम्मू-कश्मीर में भी जाकर जनता पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार किया जबकि नेताओं में से कोई भी वहां पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार करने के लिए पहुंच नहीं पाया था परन्तु लाला जी ने यहां भी मोर्चा संभाला और इस क्षेत्र में भी सीटें जितवाकर जनता पार्टी की झोली में डाल दीं। जरा सोचिए क्या यह लाला जी के पंजाबी एकता और भाईचारे को मजबूत करने का अविस्मरणीय जज्बा नहीं था, जिसके चलते जिनकी रणनीति के आधार पर अकाली दल और जनता पार्टी को इतनी जीत हासिल हो सकी। लाला जी की जीवन यात्रा को एक लेख में तो क्या एक पुस्तक में भी नहीं समेटा जा सकता। अपितु सच पूछिए तो उनके जीवन से संबंधित सभी घटनाओं, तथ्यों को यदि संग्रहित किया जाए तो कितनी किताबें बन जाएंगी। यह बात इतिहास, पत्रकारिता और राजनीति को समझने और जानने के इच्छुक लोगों एवं जागरूक शहरियों के ज्ञान के लिए लिखनी जरूरी हैं। 

लाला जी के जीवनकाल में बहुत से राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं के सम्पर्क में आया जैसे कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मास्टर तारा सिंह, शहीद भगत सिंह के चाचा स. अजीत सिंह, प्रताप सिंह कैरों, गुरमुख सिंह मुसाफिर,ज्ञानी जैल सिंह, गुलजारी लाल नंदा, वी.वी. गिरि, अटल बिहारी वाजपेयी, मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर, लाल कृष्ण अडवानी और इंद्र कुमार गुजराल आदि। वे 1971 में इंदिरा गांधी और जनरल मानेक शॉ से तब मिले थे जब हिन्द समाचार की तरफ से स्थापित बंगलादेश रिलीफ फंड का ड्राफ्ट उनको सौंपा गया। फिर लाला जी ने अपने जीवन के एक मोड़ पर जब राजनीति से संन्यास लिया तो उन्होंने अपने मन की वेदना को इन शब्दों में प्रकट किया : 

‘‘अब मैं समझने लगा हूं कि राजनीति एक छल है, कपट है, धोखा है और फरेब है। अब राजनीति से ऊब गया हूं। राजनीति के कपटपूर्ण और आडम्बर भरे वातावरण से निकल कर शांति एवं सुख की अनुभूति कर रहा हूं।’’

-ओम प्रकाश खेमकरणी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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