अमित शाह के आरोप हास्यास्पद तो महबूबा में विश्वास की कमी

  • Updated on 7/1/2018

नाटकीय ढंग से एक-दूसरे से अलग होने के बाद  भाजपा और पी.डी.पी. एक-दूसरे पर जिस तरह बरस रहे हैं इसका वर्णन लेखक कोंग्रीव ने उन दिनों में किया था जब एक डच राजा अंतिम बार इंगलैंड के सिंहासन पर बैठा था। अमित शाह से शुरूआत करते हैं। उन्होंने जो आरोप लगाए हैं वे न केवल मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद हैं बल्कि बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए तथा अविश्वसनीय भी हैं।

इस तरह से महबूबा मुफ्ती सरकार जम्मू तथा लद्दाख के साथ ‘भेदभाव’ की दोषी थी, जबकि उनके परिवार पर ‘निजी सम्पत्ति’ रखने का आरोप लगाया गया, जो ‘पूरे राज्य’ की सम्पत्ति के बराबर थी। पहले आरोप के सबूत जम्मू में एम्स को पूरा करने अथवा एक कार्यशील आई.आई.एम. की स्थापना करने में असफलता, जम्मू के स्मार्ट सिटी के दर्जे में विलम्ब, गुज्जरों तथा बक्करवालों को अनुसूचित जनजातियों का दर्जा न देना, शरणार्थी सहायता के लिए आबंटित धनराशि को पूरा खर्च न करना तथा कश्मीरी पंडितों  के पुनर्वास में असफलता हैं। 

जहां तक मैं कह सकता  हूं, उन्होंने  दूसरे आरोप का कोई सबूत पेश नहीं किया, हालांकि इसका बखान उन्होंने खूब बढ़ा-चढ़ाकर किया था। यदि आपने शाह का भाषण सुना हो तो उसमें वाकपटुता की बजाय गुस्सा अधिक था। यह पूरी तरह से एक हमला था।

अभी तक मुफ्ती ने कोई जोरदार जवाबी हमला नहीं किया है मगर इसमें बदलाव आ सकता है क्योंकि वह नि:संदेह एक ‘चोट खाई महिला’ हैं। इसके साथ ही उनकी प्रतिक्रिया ट्वीट के रूप में आई न कि भाषण के तौर पर। जब वह बोलेंगी तो संभवत: उनके गुस्से को झुठलाया नहीं जा सकता।

आरोपों को ‘झूठा’ बतलाते हुए मुफ्ती ने कहा कि गठबंधन का एजैंडा राम माधव के सहयोग से तैयार किया गया (था) और राजनाथ जी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने इसकी पुष्टि की थी। दूसरे शब्दों में भाजपा उन नीतियों की लेखक है, जिनको अब वह गालियां दे रही हैं। ‘‘उन्हें अपने ही शुरू किए गए कार्यों को स्वीकार करते न देखना और उन पर ‘नरम रवैये’ का ठप्पा लगाते देखना दुखद है।’’

जम्मू बारे आरोपों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुफ्ती ने कहा कि यदि कोई ऐसी बात है तो उन्हें अपने खुद के मंत्रियों की कारगुजारी की समीक्षा करनी चाहिए, जो मुख्यत: जम्मू क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुफ्ती ने कहा कि यदि कोई ऐसी ङ्क्षचता है तो गत 3 वर्षों के दौरान न तो राज्य और न ही केन्द्रीय स्तर पर उनमें से किसी  ने  भी  उनसे बात की।
अब वापस चल कर एक अलग प्रश्र पूछते हैं। क्या शाह तथा मुफ्ती ने खुद को उस स्थिति से ज्यादा प्रदॢशत किया जिसका वे उल्लेख कर रहे थे।

अपनी पार्टी के व्यवहार को न्यायोचित ठहराने के लिए  शाह की हताशा स्वाभाविक थी क्योंकि वह एक ऐसा मामला था जो अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका। भाजपा कश्मीर के मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति में एक हथियार के तौर पर  इस्तेमाल  करना चाहती है।

मुफ्ती संयम बरतते हुए दिखाई दे रही थीं क्योंकि वह रक्षात्मक थीं। सम्भवत: वह शाह द्वारा लगाए गए आरोपों में दोषी नहीं थीं मगर वह एक अयोग्य तथा अलोकप्रिय सरकार चलाने की दोषी थीं। वह अपना निर्वाचन क्षेत्र खो चुकी थीं और नहीं जानती थीं कि पीछे छोड़ दिए गए लोगों से कैसे बात करें। उनके व्यवहार से उनमें विश्वास की कमी का खुलासा होता है।
मुझे हैरानी होगी यदि शाह तथा मुफ्ती को यह एहसास हो जाए कि उनकी चालें इतिहास में लिखी जा चुकी हैं।
-----करण थापर

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