Sunday, May 22, 2022
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babasaheb dr. ambedkar: social, political and economic democracy in the indian context

बाबा साहेब डॉ. अंबेडकरः भारतीय संदर्भ में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र

  • Updated on 4/14/2022

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। जब हम देश में सामाजिक और राजनीतिक सुधार के क्रम को देखते हैं तो इनमें कई ऐसे नाम सामने आते हैं, जिन्हें कई संदर्भों में रूपांतरित कर हमारे सामने प्रस्तुत किया गया। उन्हीं नामों में से एक नाम है भारतीय संविधान के जनक बाबा साहेब डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर। बाबा साहेब बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। उन्हें हम राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, समाज सुधारक, विधिवेत्ता, दलित चिंतक और लेखक के रूप में देखते हैं।

देश की तत्कालीन परिस्थितियों से लड़ने के बाद स्वयं को बहुज्ञ के रूप में विकसित करना साधारण व्यक्ति का काम नहीं है, यह केवल बाबा साहेब ही कर सकते थे। आज जब बाबा साहेब के विचारों को केवल एक ही समूह के लिए प्रासंगिक बताए जाते हैं तो यह देश को गहरे गर्त में भटकाने जैसा लगता है। क्योंकि बाबा साहेब की हर संभव कोशिश रही है कि देश के सभी वर्गों का सर्वांगीण विकास हो और सब राष्ट्र के वास्तविक विकास के लिए प्रयासरत हो आगे बढ़ें।

दलित परिवार में जन्मे होने से जाहिर है की भीमराव को शुरू से ही समाज की हर सीढ़ी पर संघर्ष के सिवा कुछ और नहीं मिलना था। छुआछूत के कारण शिक्षा प्राप्त की जिद्दोजहद से लेकर एक सामान्य परिवार में होने वाली आर्थिक परिशानियों ने शुरू से ही उनके अंदर परिवर्तन की ओर आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। शायद इसी का परिणाम है भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में उनके विभिन्न चिंतन।

वर्गीकरण की राजनीति करने वाले उनके 1940 में थॉट्स ऑन पाकिस्तान में मुस्लिम लीग द्वारा हो रही अलग पाकिस्तान देश की मांग पर हुई कड़ी आलोचना पर बात नहीं करते। इसके माध्यम से उन्होंने जातीय राष्ट्रवाद की तीखे तेवरों में आलोचना की। कहीं न कहीं बाबा साहब के विचार सर्वोदय और अंत्योदय की परिकल्पना को प्रदर्शित करते हैं।

वर्ण व्यवस्था के नाम पर राष्ट्र एकता को चुनौती देने वाले धर्म का भी उन्होंने घेराव किया। इस घेराव से तथाकथित सेक्युलर नेता उन्हें हिंदू धर्म का विरोधी बताने लगे। वास्तव में बाबा साहब रूढ़िवादिता और कुरीतियों के विरोधी थे। दक्षिण एशिया के इस्लामिक रीतियों की कड़ी निन्दा की है। बाबा साहेब के विचारों में दशकों पहले आज हो रहे महिला सुधार के संदर्भ में हो रहे परिवर्तन की जड़ें दिखाई देती है। समाज में हो रहे बहुविवाह पर उन्होंने विशेषकर मुस्लिम वर्ग को कटघरे में खड़ा किया। जिसमें अभी कुछ एक साल पहले परिवर्तन किया गया। यही बात अनुच्छेद 370 के संबंध में भी लागू होती है।

सामाजिक लोकतंत्र समानता पर निर्भर होता है और यह बात देश को बाबा साहेब से बेहतर किसी और ने नहीं समझाया है। संविधान की मूल भावना को बचाए रखने के लिए अंबेडकर ने हर संभव कोशिश की। वह संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द के प्रयोग पर भी खिलाफ थे।

जब 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान अपनाया गया। उस समय अपने काम को पूरा कर बाबा साहब ने साफ शब्दों में कहा, मैं महसूस करता हूं कि संविधान ,साध्य है,यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूं कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।

सामाजिक और राजनीतिक सुधारक के रूप में बाबा साहब को हमेशा याद किया जाता है, लेकिन उनके आर्थिक लोकतंत्र को दरकिनार करना हमारे लिए संभव नहीं है। बाबा साहेब अर्थशास्त्र में विदेश से डॉक्टरेट की डिग्री लेने वाले पहले भारतीय थे। आज भारतीय सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए जिस औद्योगिकीकरण और कृषि विकास को साथ लेकर चलने की योजना कर रही है। उस संबंध में बाबा साहेब पहले से ही पक्षधर थे। उनका कहना था कि दोनों को साथ लेकर ही विकास संभव हो सकेगा। यह ही नहीं देश का सबसे बड़ा बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया उन्हीं के विचारों आधारित है।

बाबा साहेब के पूरे जीवन को देखें तो स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, बौद्धधर्म, विज्ञानवाद, मानवता, सत्य, अहिंसा पर आधारित है। उनके लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन्हीं विषयों को आधार माना गया है। सोचने वाली बात तो यह है कि कोई व्यक्ति सदैव से जातीय राष्ट्रवाद का आलोचक रहा उसको एक वर्ग विशेष के लिए बता कर उस पर राजनीति करना कितनी ओछी मानसिकता का परिचायक है। हालांकि आज तक यह देखने को मिल रहा है लेकिन अब देश इसको समझ रहा है और इन बेफिजूल के अफवाहों पर ध्यान देना बंद करता जा रहा है।

शांभवी शुक्लः (शोधार्थी- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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