Sunday, Oct 17, 2021
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कर्नाटक में येद्दियुरप्पा को नजरअंदाज नहीं कर सकती भाजपा

  • Updated on 7/27/2021

जुलाई कर्नाटक के मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा के राज्य में शासन की दूसरी वर्षगांठ थी लेकिन किसी समारोह का आयोजन करने की बजाय यह उनके द्वारा इस्तीफा देने की घोषणा के बाद एक भावुक विदाई भाषण के लिए अवसर में बदल गई। राज्य में बी.एस.वाई. के तौर पर जाने जाते, उन्होंने हर तरह के दबाव का सामना किया लेकिन उच्च कमान ने निर्णय किया कि यही समय है कि कोई युवा नेता सत्ता संभाले।

येद्दियुरप्पा अब 78 वर्ष के हो चुके हैं और कोई सार्वजनिक पद संभालने के लिए पार्टी द्वारा निर्धारित 75 वर्ष की आयु सीमा को पार कर चुके हैं। वह 2023 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी का नेतृत्व नहीं करेंगे क्योंकि तब तक वह 80 वर्ष से अधिक के हो चुके होंगे। कर्नाटक भाजपा के लिए एक दक्षिणी प्रवेश द्वार है क्योंकि पार्टी 
ने यहां धीरे-धीरे विकास किया है। भाजपा अब कांग्रेस तथा जद (एस) के साथ तीसरा स्तम्भ बन चुकी है तथा पार्टी को बनाने में येद्दियुरप्पा की एक बड़ी भूमिका रही।

दुर्भाग्य से, हालांकि वह 4 बार सत्ता में आए मगर एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। येद्दियुरप्पा ने न चाहते हुए भी अपना पद छोड़ दिया क्योंकि उच्च कमान ने पार्टी को 
न्यूनतम नुक्सान के साथ उनके जाने की योजना पर काम किया था। 

संयोग से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी चाहता था कि कोई युवा नेता कमान संभाले। कर्नाटक ने बहुत से महत्वपूर्ण संघ नेता पैदा किए हैं-स्वर्गीय संघ प्रमुख के.सुदर्शन तथा शेषाद्रि से लेकर दत्तात्रेय होसबोले, बी.एल. संतोष तथा सी.आर. मुकुंद जैसे वर्तमान समय के नेता। 

येद्दियुरप्पा पार्टी के लिए एक सम्पत्ति के साथ-साथ दायित्व भी रहे हैं। बी.एस.वाई. एक चतुर मैनीपुलेटर हैं जो जानते हैं कि कैसे विरोधियों से सत्ता छीननी है, चाहे वह जनता दल गठबंधन हो अथवा कांग्रेस। वह दल बदल तथा धन से लुभाने के दशकों पुराने ट्रिक्स से अच्छी तरह वाकिफ हैं। यहां तक कि 2017 के चुनावों में भाजपा सामान्य बहुमत भी हासिल नहीं कर सकी। भाजपा को बाहर रखने के लिए कांग्रेस तथा जद (एस) ने जद (एस) नेता एस.डी. कुमारास्वामी के मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता का गठन किया। येद्दियुरप्पा ने 2019 में इस सरकार को नीचे खींच गिराया और चौथी बार मुख्यमंत्री बने। 
येद्दियुरप्पा भाजपा के लिए महत्वपूर्ण क्यों हैं? सबसे पहले, राज्य में उनकी बराबरी पर कोई लिंगायत नेता नहीं है, न तो कांग्रेस में और न ही जद (एस) में। भाजपा ने भी दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित नहीं किया।

दूसरे, यह महत्वपूर्ण जाति राजनीतिक है जो मुख्यमंत्री के पक्ष में जाती है। लिंगायत राज्य का इकलौता सर्वाधिक महत्वपूर्ण समुदाय है (17 प्रतिशत)। राज्य में 500 मठों में से अधिकतर लिंगायत मठ हैं जिसके बाद दूसरे नम्बर पर वोकालिंगा मठ है। यह समुदाय राज्य के 224 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के कम से कम 90-100 में संतुलन को प्रभावित कर सकता है। संत, जिन्हें वित्तीय रूप से मजबूत समर्थन प्राप्त है और अन्यथा मुख्यमंत्री से, खुल कर बी.एस.वाई.  का समर्थन करते हैं।

पारंपरिक रूप से लिंगायत कांग्रेस का समर्थन करते थे लेकिन 70 के दशक में उससे दूर हो गए। इसके बाद वे कुछ समय के लिए फिर लौटे।  प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा अचानक लोकप्रिय लिंगायत मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को पद से हटाने के बाद उन्होंने अपना समर्थन वापस ले लिया। 1994 के विधानसभा चुनावों में समुदाय ने कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया। यही वह समय था जब येद्दियुरप्पा लिंगायतों के चेहरे के तौर पर उभरे। 2013 को छोड़ दें तो भाजपा के 30 से अधिक लिंगायत विधायक थे-2004 (32), 2008 (39) तथा 2018 (38)।

येद्दियुरप्पा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं में से उठे हैं और 1983 तथा 2013 के बीच कर्नाटक विधानसभा के 7 बार सदस्य थे। वह संघ में उस समय शामिल हुए  जब उनकी आयु मात्र 15 वर्ष थी और उन्होंने जनसंघ में अपने पांव जमाए। 
एक जनाधार वाले नेता, जिन्होंने 2008 में दक्षिण भारत में पहली भाजपा सरकार बनवाई, भ्रष्टाचार के आरोपों, भाई-भतीजावाद तथा असंतोष की आवाजों के बावजूद बी.एस.वाई. ने राज्य में अपना स्थान बनाए रखा। 
उनका कर्नाटक में तेज उठान भूमि घोटाले के मद्देनजर रुका जिसकी कीमत उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी के रूप में चुकानी पड़ी। वह 2012 में भाजपा से निकल आए और अपनी खुद की पार्टी कर्नाटक जनता प्रकाश (के.जे.पी.) बना ली जिसने 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को एक जोरदार झटका पहुंचाया।  

येद्दियुरप्पा की वापसी ने 2014 के आम चुनावों में लिंगायत वोट आधार को फिर मजबूत किया। उनसे निपटने के दौरान भाजपा नेतृत्व को यह अपने दिमाग में रखना होगा। चौथी बार उन्होंने कांग्रेस तथा जनता दल (एस) से 18 विधायकों का दल बदल करवा कर जुलाई 2019 में मुख्यमंत्री का पद संभाला। पहले ही 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। मगर पहले ही की तरह वह अपने पार्टी विरोधियों की ओर से भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद के आरोपों का सामना कर रहे हैं।

चूंकि मुख्यमंत्री को शक्तिशाली लिंगायतों से समर्थन प्राप्त है, भाजपा बी.एस.वाई. को नजरअंदाज नहीं कर सकती क्योंकि 2023 के विधानसभा चुनावों अथवा 2024 के आम चुनावों से पहले कर्नाटक पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है।
बी.एस.वाई. की पारी बेशक समाप्त हो गई हो लेकिन भाजपा हाईकमान ने उनको अच्छी तरह से संभाला, एक जन नेता होने के तौर पर वह अभी भी लिंगायत वोटों को लामबंद कर सकते हैं। उनके उत्तराधिकारी के लिए आगे कार्य कठिन हैं, एक ऐसे राज्य में सब को साथ लेकर चलना, जहां धड़ेबंदी हमेशा मौजूद रहती है।

कल्याणी शंकर

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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