Thursday, Jan 20, 2022
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'काम वापसी' से खत्म हो लॉकडाऊन

  • Updated on 5/1/2020

इरफान खान और फिर ऋषि कपूर की कैंसर से मौत की खबर के बाद भारत में कोरोना का आतंकी स्यापा और बढ़ गया है। कोरोना की वजह से भारत में लगभग 1074 लोगों की मौत हुई, जिनमें कई दूसरी बीमारियों से पीड़ित और बुजुर्ग थे। दूसरी तरफ एन.सी.आर.पी. के 2014 के आंकड़ों के अनुसार कैंसर मर्ज अकेले से भारत में लगभग 1300 लोगों की रोजाना मौत हो रही है। कोरोना वायरस की बजाय खबरों के आतंकी हमले और लॉकडाऊन की दुश्वारियों की वजह से लाखों मजदूर येन-केन प्रकारेण गांव-घर लौटना चाहते हैं। कोटा के छात्रों की घर वापसी के बाद, प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की अनुमति देना सभी सरकारों के लिए संवैधानिक और राजनीतिक तौर पर जरूरी हो गया था। अब केंद्र सरकार की 6 सूत्री गाइडलाइंस से सैलानी, मजदूर, छात्र और बीमारी आदि में फंसे अनेक लोगों की घर वापसी के लिए राजस्थान में बड़े पैमाने पर शुरूआत भी हो गई है। 3 मई के बाद यदि तीसरे दौर का लॉकडाऊन शुरू हुआ तो विरोधाभासी प्रतिबंधों और असमंजस की स्थिति से प्रवासी मजदूरों के साथ समाज और अर्थव्यवस्था का संकट गहरा जाएगा।

केंद्र सरकार की 6 सूत्री गाइडलाइन से जटिलता बढ़ेगी-केंद्र सरकार की नई गाइडलाईंस के अनुसार राज्यों की परस्पर सहमति के बाद ही सड़क मार्ग से मजदूर वगैरह अपने घर वापस जा सकेंगे। ऐसे लोगों को अपनी मेडीकल जांच के साथ आरोग्य सेतु एप्प को मोबाइल में डाऊनलोड करना होगा। गांव में वापस पहुंच पर मजदूरों को 14 दिन का क्वारंटाइन यानी घर से अलगाव करना होगा। एन.सी.आर. में हरियाणा और उत्तर प्रदेश बॉर्डर सील होने की वजह से सरकारी अधिकारी और डॉक्टरों को भी देश की राजधानी दिल्ली आने-जाने में दिक्कत हो रही है। क्षेत्रीय स्तर पर चल रही इन बंदिशों के बीच प्रवासी मजदूरों का आवागमन हो भी गया तो क्वारंटाइन में रहने से घर वापसी कैसे होगी?

घर वापसी की बजाय उद्योगों और काम-धंधे की बहाली हो-केंद्र सरकार ने टैक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वैलरी जैसे 15 उद्योग क्षेत्रों, आवासीय क्षेत्रों में दुकानों, गांवों में खेती और फल-सब्जी जैसी आवश्यक वस्तुओं के कारोबार और यातायात के लिए इजाजत दे दी है। कई चरणों में जारी इन दिशा-निर्देशों को लागू करने में दो अड़चनें हैं। राज्यों के क्षेत्राधिकार में आने वाले इन दिशा-निर्देशों को लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच ज्यादा संवाद और समन्वय की जरूरत है। दूसरा नौकरशाही की नासमझी से जारी हो रहे अव्यावहारिक और विरोधाभासी दिशा-निर्देशों से अर्थव्यवस्था को सुनिश्चित गति नहीं मिल पा रही। उद्योग-धंधे खुल गए, लेकिन मजदूर नहीं हैं, मजदूर आ गए तो कच्चा माल नहीं है, कच्चा माल है तो कारखाना चलाने के लिए पैसे नहीं हैं, और सब हो जाए तो बाजार में ग्राहक नहीं हैं। इन सभी जटिलताओं की वजह से अर्थव्यवस्था ताले में कैद है, जिस वजह से मजदूर घर वापसी के लिए ज्यादा बेचैन हैं। अधर की इस स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक है। इसलिए लॉकडाऊन खोलने के नियमों को जमीनी धरातल पर लागू करने के लिए राज्यों में स्पष्ट निर्णयन के साथ ठोस क्रियान्वयन की जरूरत है।

गांवों में कोरोना के कहर को रोकना मुश्किल होगा-कोरोना का संकट अभी भारत के महानगरों में ज्यादा है, जहां स्वास्थ्य सेवाएं अच्छी होने की वजह से संक्रमण से पीड़ित सिर्फ 3 फीसदी लोग ही मौत का शिकार हुए हैं। गरीबी और गंदगी की मार से पीड़ित 80 करोड़ आबादी के लिए भारत में पर्याप्त स्वास्थ्य ढांचा नहीं है। कोरोना की वैक्सीन जब भी बने, उसका भारत के गांवों में प्रसार करने में कई साल लगेंगे। डब्ल्यू.एच.ओ. और अन्य एक्सपर्ट्स के अनुसार गरीबी और बेरोजगारी की मार झेल रहे मजदूरों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से, गांवों में कोरोना का कहर ज्यादा बरप सकता है। मजदूरों को काम पर भेजने की बजाय यदि गांवों या क्वारंटाइन में रखने पर ज्यादा जोर देने से कोरोना का देश भर में खतरनाक प्रसार बढ़ सकता है। कोरोना से भिडऩे के लिए आम जनता के प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत करना जरूरी है। इसके लिए शहरों में आॢथक सिस्टम की तालाबंदी को खोलकर आम जनता को घर और डर से निकालना जरूरी है।

आमदनी खत्म-सी हो गई है जबकि खर्चों का बोझ कई गुणा बढ़ गया है
राज्यों की पतली आॢथक हालत और राजनीतिक बाध्यताएं-लॉकडाऊन की वजह से अधिकांश राज्यों में आमदनी खत्म-सी हो गई है, जबकि खर्चों का बोझ कई गुना बढ़ गया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, छतीसगढ़, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रवासी मजदूरों की बड़े पैमाने पर यदि वापसी हो गई तो संभालना मुश्किल होगा। झारखंड के मुख्यमंत्री ने कहा है कि उनके पास मजदूरों को वापस बुलाने के लिए आॢथक संसाधन नहीं हैं, इसलिए केंद्र सरकार मदद दे या फिर ट्रेनों को बहाल किया जाए। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और राजस्थान में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत की पुरानी घटनाओं के बाद बड़ा विवाद हुआ था। मजदूरों की बिहार जैसे राज्यों में थोक वापसी होने से राज्यों में महामारी बढ़नेऔर स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने का खतरा बढऩे से राजनीति बढ़ सकती है, जो इस आपदा में देश के लिए शुभ नहीं होगी।

मास्क, सोशल डिस्टैंसिंग और क्वारंटाइन के नियमों पर कैसे हो अमल- भगवान भरोसे सिस्टम चल रहे देश में कोरोना की आपदा के बाद मास्क और सोशल डिस्टैंसिंग के नियमों की सब लोग बात कर रहे हैं। निर्माण क्षेत्र में अनेक सुरक्षा के नियमों के बावजूद, भारत में अधिकांश मजदूरों के पास हैल्मेट आदि नहीं हैं। मास्क और पी.पी.ई. के बढ़ते इस्तेमाल के साथ यदि इनके डिस्पोजल की सही व्यवस्था नहीं बनाई गई तो झुग्गी-झोंपड़ी में संक्रमण के खतरे बढऩे से पूरा समाज प्रभावित होगा। चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संक्रमण से पीड़ित लोगों से घरों में ही रहने की अपील की है, क्योंकि सरकार के पास बड़े पैमाने पर जरूरी बंदोबस्त की सुविधा नहीं है। जिन प्रवासी मजदूरों को कोई प्राथमिक मर्ज नहीं है, उन्हें 14 दिन के अनिवार्य क्वारंटाइन में भेजने से सरकार की समस्याएं और मजदूरों का आक्रोश बढ़ेगा। मैंने अपनी पुस्तक ‘ब्रेकडाऊन ऑफ लॉ एंड जस्टिस ड्यूरिंग लॉकडाऊन’  में सिस्टम की सीमाओं का विस्तार से विवरण दिया है। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय मापदंडों के हिसाब से भारत में नौकरशाही द्वारा बनाए जा रहे जटिल नियमों के पुलिसिया तरीके से कराए जा रहे बेतुके पालन पर रोक लगे तो अर्थव्यवस्था में रफ्तार पकडऩे से मजदूरों का रिवर्स पलायन भी रुकेगा।

खाड़ी देशों से लाखों एन.आर.आई. भारत आने के लिए बेताब
विदेशों से एन.आर.आई. की वापसी से भारत में एक नए संकट की आहट पैदा हो जाएगी। खाड़ी देशों से लाखों एन.आर.आई. भारत आने के लिए बेताब हैं। ऐसे लोगों की घर वापसी के लिए नौसेना और एयर इंडिया ने कमर कसना शुरू कर दिया है। इन लोगों से भारत को बड़े पैमाने पर आमदनी मिलती है और इन सभी की तकलीफ के समय में भारत सरकार को पूरी मदद करनी चाहिए। परन्तु यह भी सोचना होगा कि विदेशों से लाखों लोग यदि भारत आ गए तो उनके क्वारंटाइन का बंदोबस्त करने में राज्यों की स्वास्थ्य सेवाओं और कर्मियों का दम कहीं टूट न जाए? लॉकडाऊन की वजह से भारत में कोरोना का विस्तार कम हुआ है, लेकिन विदेशों से एन.आर.आई. की नई खेप आने पर कोरोना के संक्रमण का खतरा फिर बढ़ जाएगा। इसलिए जब तक देश में अर्थव्यवस्था सुचारू रूप से शुरू नहीं हो जाती, तब तक एन.आर.आई. को भारत वापस लाने की बजाय, उनके लिए विदेशों में ही अधिकतम बंदोबस्त करना श्रेयस्कर होगा।

नारायणमूॢत समेत अनेक लोगों के अनुसार अब कोरोना जैसे घातक वायरस के साथ देशवासियों को रहना सीखना होगा। राणा प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, गुरु गोङ्क्षबद सिंह, बंदा बहादुर, भगत सिंह जैसे बलिदानियों के त्याग और गौरव की कहानियां देश के जन-जन में व्याप्त हैं। लॉकडाऊन के तालों में कैद करोड़ों भारतीयों के अंदर अब डर की बजाय साहस और उत्साह का संचार सभी को करना होगा। वायरस से मुकाबले के लिए अब अर्थव्यवस्था के नवनिर्माण के पहियों को पूरी गति देनी होगी।

-विराग गुप्ता (एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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