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‘कोविड-19 के दौरान बाल विवाह में हुई बढ़ोतरी’

  • Updated on 12/29/2020

कोविड महामारी के फूटने से पहले भारत एक ऐसा देश था जहां पर बाल विवाह के खिलाफ एक मुहिम चल रही थी। सरकार ने भी इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने और लोगों को शिक्षित करने के लिए प्रयास किए मगर आज इसको एक गहरा धक्का लगा है जो चिंता का विषय है। यह एक विश्वव्यापी ट्रैंड बन चुका है। 

‘ग्लोबल गर्लहुड रिपोर्ट 2020’ का कहना है कि करीब पांच लाख लड़कियां इस समय जबरन बाल विवाह की पीड़ित होने का जोखिम उठा रही हैं। ‘सेव द चिल्ड्रन’ रिपोर्ट के अनुसार अगले पांच वर्षों में महामारी के कारण 25 लाख लड़कियों की शादी नाबालिग अवस्था में हो जाएगी। बढ़ती हुई गरीबी सीधे तौर पर बाल विवाह का कारण है। लड़कियां सभी स्रोतों की पहुंच से बाहर हैं। लड़की को बोझ समझा जाता है जिसके चलते उसकी जल्द ही शादी कर दी जाती है। यही कारण है कि सामाजिक सुरक्षा इस समय बेहद जरूरी है। 

परिवार द्वारा गरीबी तथा अपहरण के डर से लड़कियों को बाल विवाह में झोंक दिया जाता है। बाल विवाह हुआ तो जल्दी गर्भवती होने की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे समय में जबकि यौन स्वास्थ्य सेवाओं तथा प्रजनन तक की पहुंच आसानी से उपलब्ध नहीं है तो लड़की का जीवन तथा उसके अजन्मे बच्चे के लिए जोखिम और भी ज्यादा बढ़ जाता है। बच्चे के जीवन का खतरा बढ़ता है और इसी बात के लिए अब समीक्षा की जानी चाहिए।

कई सर्वेक्षणों जिनमें अभिभावकों को शामिल किया गया, में यह बात सामने आई है कि शादी नाबालिग बेटी की सुरक्षा को यकीनी बनाती है। वह भी ऐसे समय में जब कई युवक नौकरी के बिना हैं और युवतियों के लिए एक खतरा बनते जा रहे हैं। एन.जी.ओ. के अनुसार ऐसी कई मिसालें हैं जिसके तहत युवा मर्द कई स्थानों पर नाबालिग लड़कियों का शोषण करते हैं और यही कारण है कि बाल विवाह को एक सुरक्षा कवच के तौर पर देखा जाता है। 

महामारी के दौरान अभिभावक शानो-शौकत वाली शादियों पर ज्यादा खर्च नहीं कर रहे और बच्चों के स्कूलों के खुलने पर भी अनिश्चिचतता बरकरार है। लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रहीं और उन्हें जल्दी ब्याहे जाने का खतरा भी है। नाबालिग बच्चियों को शादी में धकेला जा रहा है क्योंकि वे एक टीचर या फिर एक सलाहकार से निश्चित संपर्क से कटी हुई हैं जो उन्हें बेहतर सलाह दे सके। ज्यादातर लड़कियों के पास चाइल्ड हैल्प लाइंस तक की पहुंच नहीं। हालांकि सरकार ने इसे स्थापित किया है। 

एक अन्य खतरा नाबालिग बच्चियों की तस्करी का भी है। लड़कियों को परिवार की मर्जी के अनुसार धोखे से किए गए वायदों के मुताबिक अन्य स्थानों पर काम करने के लिए ले जाया जाता है। भारत में जमीनी स्तर पर ऐसे कार्यकत्र्ता हैं जो बच्चियों के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल में जुटे हुए हैं। यदि ऐसे कार्यकत्र्ताओं को एक सिस्टम के तहत प्रोत्साहित किया जाए तो वे बेटियों के जल्दी ब्याहे जाने के जोखिम को कम कर सकते हैं और इसे टालने के लिए कदम उठा सकते हैं। लोगों में बातचीत के जरिए जागरूकता फैलाई जाए और संबंधित परिवार तक हरसंभव सहूलियतों को पहुंचाया जाए।-ललिता पाणिकर

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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