Thursday, Jan 20, 2022
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commendable role of the army during the crisis musrnt

संकटकाल के दौरान सेना की प्रशंसनीय भूमिका मगर...

  • Updated on 5/11/2021

कोरोना महामारी की दूसरी भयंकर लहर ने देश को हिला कर रख दिया है तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान अप्रत्यक्ष रूप में यह स्वीकार किया कि इस किस्म की आपदा के लिए देश पूरी तरह से तैयार नहीं था। 
सर्वोच्च न्यायालय ने कोविड-19 के मामलों में जबरदस्त बढ़ौतरी को राष्ट्रीय संकट के तौर पर घोषित करते हुए कहा कि ऐसे हालातों में मूकदर्शक बन कर रहा नहीं जा सकता। वहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने इसको सुनामी का दर्जा दिया और मद्रास हाईकोर्ट ने कोरोना की इस अचानक वृद्धि के लिए किसी स्तर तक चुनाव आयोग को भी जिम्मेदार ठहराया।

संकटकाल में जब प्रशासन अपने दोनों हाथ खड़े कर दे तो अक्सर ही सेना को याद किया जाता है जोकि आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता की प्रतीक है। सशस्त्र सेनाओं ने देश के युद्धों को जीतने के साथ-साथ सदैव ही प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि भूकम्प, बाढ़, सुनामी, महामारी तथा कानून व्यवस्था स्थापित करने जैसी चुनौतियों के दौरान अपने जीवन की परवाह न करते हुए राहत कार्यों में अपना योगदान दिया और पीड़ित देशवासियों को मौत के मुंह से निकाल कर जान-माल की रक्षा की।

इसकी ताजा मिसाल इस बात से मिलती है कि जब इस नामुराद वायरस ने गत वर्ष देशवासियों के अंदर घुसपैठ की तो सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकंद नरवाने ने इस महामारी के विरुद्ध आप्रेशन कोड ‘नमस्ते’ के अंतर्गत युद्ध का बिगुल बजा कर इस पर जीत प्राप्त करने का जिक्र पूर्व के लेख में मेरे द्वारा कोविड-19 की पहली लहर में किया जा चुका है। 

पूर्व सैनिक योद्धे, जिन्होंने देश की एकता और अखंडता को बरकरार रखा तथा सिविल प्रशासन की मदद की, यदि उनकी विधवाओं को भी कोरोना लहर के दौरान अस्पतालों की ठोकरें तथा दर-दर के धक्के ही नसीब हों तो फिर इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है? इसलिए इस लेख में सेना की भूमिका के साथ-साथ सैनिकों के मसलों के बारे में चर्चा भी लाजिमी है। 

आप्रेशन को-जीतः सशस्त्र सेनाओं ने इस महामारी से युद्ध स्तर पर निपटने की खातिर आप्रेशन  ‘को-जीत’ प्रारंभ किया तथा अपने-अपने क्षेत्रों में रहते हुए राज्य सरकारों और प्रशासन की मांग के अनुसार तुरंत ही एक्शन मोड पर आकर दिन-रात एक कर हर किस्म की सहायता प्रदान करने में व्यस्त हो गई। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल माह में चुनौतियों के दौरान सबसे पहले वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आर.के. भदौरिया से मुलाकात की। 

भदौरिया ने उन्हें जानकारी दी कि कैसे वायुसेना ने चौबीस घंटे सातों दिन-रात एक कर प्रशासन की मदद की। फिर 29 अप्रैल को सेना प्रमुख जनरल मनोज ने प्रधानमंत्री के साथ बैठक कर आप्रेशन ‘को-जीत’  बारे जानकारी दी। फिर मोदी को जब चुनावों से कुछ फुर्सत मिली तो 3 मई को नौसेना प्रमुख एडमिरल कर्णबीर सिंह ने नौसेना की ओर से विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी दी। 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से 7 मई को क्षेत्रीय भाषाओं के अनेकों समाचार पत्रों में प्रकाशित  अपने लेख में विस्तारपूर्वक यह जानकारी दी कि कैसे आम्र्ड फोॢसस मैडीकल सॢवस (ए.एफ. एम.एस.), रक्षा खोज एवं विकास संगठन (डी.आर.डी.ओ.), कैंटोनमैंट बोर्ड तथा कुछ और रक्षा विभागों ने कोविड देखभाल के लिए मैडीकल सहूलियतों की तुरंत सप्लाई के लिए अस्पतालों और बाकी अन्य व्यवस्था की है। 

उन्होंने यह भी लिखा कि विभिन्न सैन्य अस्पतालों में करीब 750 बैड आम नागरिकों के लिए रखे गए हैं। दिल्ली के बेस अस्पताल को कोविड अस्पताल में बदल दिया गया है जिसकी क्षमता 400 से बढ़ाकर 1000 बैड की जा रही है। इसके अलावा ए.एफ.एम.एस. ने 19 अस्पताल, 4000 से ज्यादा बिस्तर और 585 आई.सी.यू. यूनिट पूरे देश में स्थापित किए हैं। 
इसी तरह डी.आर.डी.ओ. ने नई दिल्ली और लखनऊ में 500-500 बैडों वाला एक-एक कोविड-19 अस्पताल तथा

अहमदाबाद में 900 बैड वाला एक अन्य अस्पताल स्थापित किया। इसके अलावा पटना, प्रयागराज, ग्वालियर, भोपाल, जबलपुर में अन्य सहूलियतें भी  दी जा रही हैं। मैडीकल ऑक्सीजन की सप्लाई में बढ़ौतरी करने के लिए वायुसेना और नौसेना की ओर से हजारों मीट्रिक टन की समर्था वाले कंटेनर्स एयर लिफ्ट किए जा रहे हैं। 
रक्षा मंत्री ने अपने लेख में यह भी लिखा कि उन्होंने सशस्त्र बलों के कमांडरों को आपातकाल वित्तीय शक्तियां भी प्रदान की हैं ताकि वे क्वारंटाइन सहूलियतों, उपकरणों की खरीद-फरोख्त और मुरम्मत करवा सकें।

सैनिकों की भी सुनोः डायरैक्टर जनरल आर्म्ड फोर्सेस मैडीकल सर्विसिस और सैन्य कमांडरों की ओर से निर्देश जारी कर इस बात पर जोर दिया गया कि पूर्व सैनिकों तथा उनके परिवारों को कोरोना महामारी के समय हर प्रकार की मैडीकल सहूलियत प्रदान की जाएगी मगर अफसोस की बात है कि कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनको सैन्य अस्पतालों में दाखिल भी न किया गया तथा वे मौत की नींद सो गए।

बाज वाली नजरः कोविड-19 की पहली लहर के समय न तो वैक्सीन थी और न ही शायद इस महामारी के बारे में किसी ने सोचा होगा। हालांकि 18 अक्तूबर, 2019 को अमरीका में हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान आने वाले समय में महामारी के बारे में आगाह कर दिया गया था।

भारतीय सेना को गत वर्ष तीन मोर्चों पर युद्ध लडऩा पड़ा। पहला फ्रंट कोविड-19 के साथ, दूसरा पूर्वी लद्दाख में पी.एल.ए. की घुसपैठ का जवाब देने के लिए और तीसरा पाकिस्तान के साथ जारी छद्म युद्ध।
उस समय भी बजट की कमी को समझते हुए रक्षा मंत्री ने सेना को कुछ वित्तीय शक्तियां प्रदान की थीं और इस बार भी ऐसा ही हुआ।

जरूरत इस बात की है कि रक्षा मंत्रालय से संबंधित संसद की स्थायी कमेटी जिसके चेयरमैन मेजर जनरल बी.सी.खडूरिया थे उनकी रिपोर्ट जोकि संसद में 9 से 10 अगस्त 2017 को पेश की गई थी उसको लागू किया जाए।

ब्रिगे. कुलदीप सिंह काहलों (रिटा.)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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