Thursday, Jan 27, 2022
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हमारे पास पंख थे, बस उड़ना सीखा

  • Updated on 7/4/2021

यह बहुत पुरानी बात लगती है लेकिन याद रखा जाना चाहिए कि मात्र 30 वर्ष पूर्व केवल एक घरेलू एयर लाइन (इंडियन एयरलाइन्स), 2 टैलीकॉम सेवा प्रदाता (बी.एस.एन.एल. तथा एम.टी.एन.एल.), 3 कारें (ए बैसेडर, फिएट तथा मारुति) तथा टैलीफोन, गैस कनैक्शन, स्कूटर आदि के लिए बहुत ल बी प्रतीक्षा सूची बनती थी।  

विदेशी मुद्रा की बहुत कमी थी। मैंने वर्ष में केवल 10 महीनों के लिए प्रतिदिन 7 अमरीकी डालर की कीमत पर मास्टर्स डिग्री के लिए पढ़ाई हेतु अमरीका का दौरा किया। ऐसी थी 1991 में भारत की अर्थव्यवस्था। सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था, एकाधिकार या सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभुत्व, निर्यात नियंत्रण, निर्धारित विनिमय दर, लाइसैंसिंग तथा बाजारों पर नियंत्रण को लेकर राजनीतिक सर्वस मति थी। कोई भी राजनीतिक दल अपवाद नहीं था। 

प्रेरित चयन
किसी भी राजनीतिक दल के 1991 के लोकसभा चुनावों में बहुमत जीतने की आशा नहीं थी। कांग्रेस 232 सीटों के साथ काफी करीब पहुंच गई थी। किसी ने भी सरकार को गंभीर आर्थिक संकट से सफलतापूर्वक बाहर निकालने का आधा भी मौका नहीं दिया। 

प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव, जिनका एक कैबिनेट मंत्री के तौर पर एक सक्रिय करियर था, एक राजनीतिक विद्वान साबित हुए। डा. मनमोहन सिंह का वित्त मंत्री के तौर पर उनके द्वारा चयन प्रेरणादायक था। मेरा मानना है कि वाणिज्य मंत्री के तौर पर मेरी नियुक्ति एम.बी.ए. डिग्री के कारण थी। मंत्रिपरिषद की पहली बैठक में नरसिम्हा की कैबिनेट सचिव नरेश चंद्र को यादगारी टिप्पणी थी, ‘‘नरेश, क्या तुम्हें मंत्रियों के लिए घोड़ा-गाड़ी मिल गई है?’’ पहले 10 दिन बहुत नीरस थे। जिस पर यह डर था कि क्या (अल्पमत) सरकार विश्वास मत प्राप्त कर सकेगी? समय तथा लहर किसी व्यक्ति का इंतजार नहीं करती, यहां तक कि भारत के प्रधानमंत्री का भी। 

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहे थे, ऋण चूक का खतरा सिर पर मंडरा रहा था, अमरीकी डालर के लिए अनाधिकारिक विनिमय दर आसमान छू रही थी, निर्यातक तथा आयातक डरे हुए थे तथा अंधेरी गुफा अंतहीन नजर आ रही थी। वामपंथियों की ओर से करकश आवाजें उठ रही थीं जो समाजवाद का जोरदार पक्ष ले रहे हैं। शायद ही कोई ऐसा राजनीतिज्ञ होगा जो आॢथक उदारवाद का पक्ष ले रहा हो। 

6 व्यक्ति (क्योंकि यह एक लिंग-असमानता उम्र थी) एक चट्टान की तरह ऐसे खड़े थे जैसे भगवान राम के चरणों की छुअन का इंतजार हो-नरेश चंद्र, ए.एन. वर्मा, मोंटेक सिंह आहलूवालिया, डा. राकेश मोहन, एस. वैंकटारमणन तथा डा. सी. रंगराजन। जब लोग 10वीं लोकसभा चुन रहे थे, उन्होंने योजनाएं बनाईं। पहला चरण संभावित रूप से विस्फोटक था-अवमूल्यन। डा. मनमोहन सिंह ने 1 जुलाई को 9 प्रतिशत अवमूल्यन करके स्थिति को भांपा। 3 जुलाई को उन्होंने प्रधानमंत्री की इसे रोकने की याचिका को दर-किनार करते हुए 10 प्रतिशत अवमूल्यन के साथ दूसरा कदम उठाया।

बंधनों को तोडऩा 
डा. सिंह ने मुझ पर तथा आहलूवालिया पर दबाव डाला। हमने व्यापार नीति में बदलावों के लिए 13 सूत्रीय पैकेज बनाया जिसका अनावरण 4 जुलाई को मैंने एक प्रैस कांफ्रैंस में किया।
व्यापार नीति की घोषणाएं वाणिज्य मंत्रालय की छूटों से आगे निकल गईं। मैंने वित्तीय तथा औद्योगिक नीति, विदेशी निवेश, निर्यातों के डी-कैनेलाइजेशन, अधिकतर आयात लाइसैंसों को हटाने तथा व्यापार खाते पर रुपए की परिवर्तनीयता में अनुकूल कदमों बारे बात की। मैंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री इन उपायों को लेकर पूरी तरह से सहयोग करेंगे। वित्त मंत्रालय में एक नई बयार चलने लगी। उद्योग मंत्रालय ने नए उद्योग नीति प्रस्तावों को आगे बढ़ाया। 24 जुलाई को युद्ध निर्माणकारी बजट पेश किया गया। 

संसद में अढ़ाई व्यक्तियों की मजबूत उदारवादी राजनीतिक ब्रिगेड को भीषण विरोध का सामना करना पड़ा। आलोचना करने में चंद्रशेखर सबसे आगे थे। हमले को कुंद करने के लिए मैंने वह फाइल सामने रखी जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री के तौर पर व्यापार नीति को उदार बनाने के लिए वाणिज्य मंत्रालय के प्रस्ताव को स्वीकृति दी थी लेकिन वह लागू नहीं हो पाई थी। उन्होंने उस पर जरा-सी नजर डाली तथा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे महज ‘प्रस्ताव’ थे जो कभी भी लागू करने योग्य नहीं थे। मैंने क्रांतिकारी बदलाव लाने का काम शुरू किया। हमने आयातों तथा निर्यातों के मुख्य नियंत्रक के पद को समाप्त कर दिया। हमने भारतीय व्यापार सेवा को खत्म किया। हमने ‘रैड बुक’ की होली जला दी जिसने लगभग 40 वर्षों तक देश के व्यापार पर लालफीताशाही के प्रतिबंध लगा रखे थे। 

वर्ष के अंत तक डा. सिंह ने आहलूवालिया को मुझसे ‘चुरा’ लिया। मुझे उन्हें देखकर दुख होता तथा डा. वाई.वी. रैड्डी ने वित्त मंत्रालय में शामिल होने के लिए मुझे छोड़ दिया। हालांकि मैं ए.वी. गणेशन को प्राप्त करके खुश था लेकिन उनके सचिव को ‘चुराने’ के लिए नागर विमानन मंत्री माधव राव सिंधिया मुझ पर गुस्सा थे। 

नई विदेश व्यापार नीति
मैंने अपना मन एक नई विदेश व्यापार नीति लिखने के लिए बना लिया। मेरे निर्देश स्पष्ट थे : (1) 100 पृष्ठ, एक भी पृष्ठ अधिक नहीं तथा (2) आसान अंग्रेजी, कोई जटिल भाषा नहीं। मगर कौन नीति तथा प्रक्रियाओं की हैंडबुक लिखेगा? पूरे मंत्रालय में कोई भी इच्छुक अथवा सक्षम नहीं था। मैंने अपनी योजना स्थगित करने से इंकार कर दिया। एक रविवार को मैंने व्यापार नीति के पहले चैप्टर को डिक्टेट करवाना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे प्रत्येक चैप्टर लिखा जाता गया, गणेशन प्रक्रियाओं की हैंडबुक के उसके बाद के चैप्टर लिखते गए। हमने काम को समय पर पूरा कर लिया तथा 31 मार्च 1992 को नई व्यापार नीति जारी कर दी। वे 9 महीने धीरज रखने वाले दिन थे। हमने बहुत पसीना बहाया। हमने पाया कि हमारे पास हमेशा से पंख थे। लेकिन हम उडऩा भूल गए थे। 30 वर्ष पहले इस सप्ताह हम आसमान में पहुंच गए।

-पी.चिदंबरम

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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