Friday, Aug 07, 2020

Live Updates: Unlock 3- Day 6

Last Updated: Thu Aug 06 2020 09:55 PM

corona virus

Total Cases

2,021,407

Recovered

1,374,420

Deaths

41,627

  • INDIA7,843,243
  • MAHARASTRA479,779
  • TAMIL NADU279,144
  • ANDHRA PRADESH196,789
  • KARNATAKA158,254
  • NEW DELHI141,531
  • UTTAR PRADESH108,974
  • WEST BENGAL86,754
  • TELANGANA73,050
  • BIHAR68,148
  • GUJARAT67,811
  • ASSAM50,446
  • RAJASTHAN48,384
  • ODISHA40,717
  • HARYANA37,796
  • MADHYA PRADESH35,082
  • KERALA27,956
  • JAMMU & KASHMIR22,396
  • PUNJAB18,527
  • JHARKHAND14,070
  • CHHATTISGARH10,202
  • UTTARAKHAND7,800
  • GOA7,075
  • TRIPURA5,643
  • PUDUCHERRY3,982
  • MANIPUR3,018
  • HIMACHAL PRADESH2,879
  • NAGALAND2,405
  • ARUNACHAL PRADESH1,790
  • LADAKH1,534
  • DADRA AND NAGAR HAVELI1,327
  • CHANDIGARH1,206
  • MEGHALAYA937
  • ANDAMAN AND NICOBAR ISLANDS928
  • DAMAN AND DIU694
  • SIKKIM688
  • MIZORAM505
Central Helpline Number for CoronaVirus:+91-11-23978046 | Helpline Email Id: ncov2019 @gov.in, ncov219 @gmail.com
delhi-election-result-development-driven-or-communal

दिल्ली चुनाव परिणाम विकास प्रेरित या साम्प्रदायिक

  • Updated on 2/14/2020

विधानसभा चुनाव क्या विकास के मुद्दों पर ही लड़ा गया या साम्प्रदायिक आधार पर? इस प्रश्न का उत्तर-हां और न दोनों में है। इस चुनाव की सच्चाई यह है कि दिल्ली के मुसलमानों ने साम्प्रदायिक आधार पर एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने के लिए वोट दिया। इसके विपरीत, ङ्क्षहदू मतदाताओं के एक वर्ग ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उनके ‘नए व्यक्तित्व’ और उनकी सरकार की लोकलुभावन नीतियों (बिजली, पानी सहित) के कारण फिर से चुना।

दिल्ली में कुल 1.48 करोड़ मतदाताओं में से 12 प्रतिशत-लगभग 18 लाख से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। माना जाता है कि इस चुनाव में 90 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम मतदाताओं ने ‘आप’ को वोट दिया। शाहीन बाग- जोकि चुनाव से पहले ही इस्लामी पहचान व अस्मिता का प्रतीक बन चुका था, जहां असम को भारत से काटने जैसी राष्ट्रविरोधी योजनाओं की रूप-रेखा खींची गई- वहां से (ओखला सीट) ‘आप’ प्रत्याशी मोहम्मद अमानातुल्ला को एकतरफा 66 प्रतिशत मत प्राप्त हुए और वोट-अंतर के संदर्भ में दूसरी सबसे बड़ी जीत दर्ज की।

सीलमपुर, मटियामहल, चांदनी चौक, बल्लीमरान, बाबरपुर और मुस्तफाबाद जैसी मुस्लिम प्रभुत्व वाली सीट-जहां मुस्लिम आबादी 30-70 प्रतिशत के बीच है-वहां भी ‘आप’ प्रत्याशियों ने 53 से 75 प्रतिशत मतों के साथ एकतरफा विजय प्राप्त की। दिल्ली की इन मुस्लिम बहुल सीटों के अतिरिक्त, अन्य सीटों की क्या स्थिति रही? सैकुलरिस्टों द्वारा दिल्ली के विकासपुरुष की संज्ञा से अलंकृत उपमुख्यमंत्री और ‘आप’ प्रत्याशी मनीष सिसोदिया हांफते-हांफते विजयी हुए और उनका वोट अंतर 3,207 रहा। कई सीटों पर ‘आप’ के मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशियों को 40 से 47 प्रतिशत मत प्राप्त हुए।

दिल्ली में मुस्लिम वोटरों का भाजपा को किसी भी तरह पराजित करने और ‘आप’  के पीछे लामबंद होने का कारण क्या रहा? इसका उत्तर मई 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में फिर से आई राजग सरकार और उसके कार्यकाल में निहित है। गत वर्ष जुलाई में देशभर में तीन तलाक विरोधी कानून लागू हुआ, अगस्त माह में अनुच्छेद 370 के संवैधानिक क्षरण और नवम्बर में शीर्ष अदालत के निर्णय से राम मंदिर निर्माण को गति मिली। इन सबसे भारतीय मुस्लिम समाज के बड़े वर्ग के ‘विशेषाधिकार’ को चुनौती मिली।

उन्हें अपनी बौखलाहट को स्वर देने का अवसर दिसम्बर 2019 में तब मिला, जब संसद द्वारा नागरिकता संशोधन कानून (सी.ए.ए.) पारित हुआ। यह जानते हुए भी कि इस कानून से किसी भी भारतीय, चाहे वे मुस्लिम ही क्यों न हों-की नागरिकता प्रभावित नहीं होगी, तब भी सी.ए.ए. के विरुद्ध देश-विदेश में कुप्रचार किया गया। उसी कुंठा के गर्भ से दिल्ली सहित देशभर में सी.ए.ए. विरोधी ङ्क्षहसा प्रारंभ हुई, तो सड़क-नाकाबंदी जैसे शाहीन बाग प्रदर्शन का जन्म हुआ। इसी संयुक्त आक्रोश ने मुस्लिम समाज को भाजपा के विरुद्ध, तो ‘आप’ के पक्ष में लामबंद किया।

क्या ङ्क्षहदू समाज ने भी साम्प्रदायिक होकर मतदान किया? दिल्ली में अधिकांश ङ्क्षहदुओं ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा 6 माह पूर्व  200 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने, सार्वजनिक बसों में महिलाओं की नि:शुल्क यात्रा और पानी के बिलों को माफ  करने जैसे लोकलुभावन निर्णयों पर ‘आप’ का समर्थन किया। सच तो यह है कि 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश से गरीबी हटाने की दिशा में जिस प्रकार सार्वजनिक संसाधनों को गरीबों के बीच अनुदान के रूप में बांटने की परम्परा शुरू हुई थी, कालांतर में उसका नियमित अभ्यास सभी केंद्रीय सरकारों के साथ राज्य सरकारों ने भी किया। चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा या फिर गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा सरकार- सभी ने समय के साथ इस प्रकार की लोकलुभावन नीतियों को अपनाया।

मैच्योर नेता के तौर पर उभरे केजरीवाल
दिल्ली में ‘आप’ की बड़ी विजय का एक और बड़ा कारण-मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक रूप से परिपक्व होना भी रहा है। पिछले 5 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए निरंतर अपशब्दों का उपयोग करने, केंद्र की प्रत्येक नीति की आलोचना करने, पाकिस्तान पर भारतीय सेना के सॢजकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने, जे.एन.यू. में पहुंचकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे...’ जैसे देशविरोधी नारे लगाने वालों के साथ खड़े रहने और प्रदेश के मौलानाओं का वेतनमान बढ़ाने वाले मुख्यमंत्री केजरीवाल की पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में पराजय (मतप्रतिशत में तीसरे पायदान पर) का सामना करना पड़ा। उसी जनभावना को भांपते हुए केजरीवाल ने रणनीतिक रूप से अनुच्छेद 370 के संवैधानिक क्षरण का विरोध नहीं किया, राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया और सी.ए.ए. का विरोध करने के बाद भी जेहादियों-वामपंथियों के गढ़ शाहीन बाग और जे.एन.यू. जाने से परहेज किया।

स्पष्ट शब्दों में कहूं, तो भाजपा या मोदी विरोध के नाम पर केजरीवाल पिछले कुछ  माह से राष्ट्रविरोधी शक्तियों- अर्थात जेहादियों और वामपंथियों के कुनबे के साथ खड़े होने से बचते रहे। यह संदेश जनता के बीच भी पहुंचा। बात यहीं नहीं रुकी। उन्होंने चुनाव के समय स्वयं को भगवान हनुमानजी का भक्त बताकर सार्वजनिक मंचों (न्यूज चैनलों सहित) पर पवित्र हनुमान चालीसा का पाठ किया। नतीजों की घोषणा के बाद वह हनुमान मंदिर गए और अपने विजयी भाषण में कहा, ‘‘आज मंगलवार यानी हनुमानजी का दिन है और उन्होंने दिल्ली पर अपनी कृपा बरसाई है।’’ इसके बाद वहां उपस्थित सभी लोगों से उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ का नारा भी लगवाया। अब क्या ऐसा आगे भी जारी रहेगा या फिर यह विशुद्ध चुनावी लाभ के लिए किया गया था?-इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा है।

दिल्ली चुनाव के नतीजों का संदेश क्या है? पहला-अरविंद केजरीवाल किसी विशेष विचारधारा से बंधे नहीं हैं। एक समय वह स्वयं को अराजकतावादी कह चुके हैं, तो जेहादियों-वामपंथियों के साथ खड़े तक हो चुके हैं। इस बार उन्होंने खुद को दिल्ली में आस्थावान ङ्क्षहदू के रूप में प्रस्तुत किया है और कई अवसरों पर वंदे मातरम् का उद्घोष किया। इस पृष्ठभूमि में उनके वास्तविक व्यक्तित्व को लेकर अब भी भ्रम या संशय बना हुआ है।

क्षरण की ओर बढ़ती कांग्रेस
दूसरा-कांग्रेस क्षरण की ओर अग्रसर है। राजनीतिक परिपक्वता से उसके नेता राहुल गांधी कितने दूर हैं, यह उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डंडे से मारने संबंधी हालिया वक्तव्य से स्पष्ट है। इसका नतीजा यह हुआ कि दिल्ली पर 1998-2013 तक शासन कर चुकी कांग्रेस को न केवल फिर शून्य पर रहना पड़ा, साथ ही उसका मत-प्रतिशत भी घटकर 5 प्रतिशत से नीचे पहुंच गया। 66 में से 63 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

केवल राष्ट्रवाद के नाम पर नहीं मिलेगी जीत
तीसरा-भाजपा, प्रदेशों में केवल राष्ट्रवादी नीतियों और प्रधानमंत्री मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व के बल पर ही चुनाव नहीं जीत सकती। दिल्ली में पार्टी को स्थानीय मुद्दों को उठाने के साथ स्थानीय संगठन को मजबूत करने और एक प्रमाणिक चेहरे की अविलम्ब आवश्यकता है। गुटबाजी के कारण भी दिल्ली में भाजपा जमीनी स्तर पर एकजुट होकर नहीं लड़ पाई, जिसकी ङ्क्षचता केंद्रीय नेतृत्व को होनी चाहिए। भाजपा के लिए सुखद समाचार केवल यह है कि उसके मत-प्रतिशत में पिछले चुनाव की तुलना में 6 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, जो सूचक है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर जनमत अब भी उसके साथ है। यही कारण है कि कई सीटों पर उसने अच्छी टक्कर दी है।

यक्ष प्रश्न उठता है कि दिल्ली चुनाव को साम्प्रदायिक रंग किसने दिया? स्व:घोषित सैकुलरिस्ट और वामपंथी इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हैं। यदि ऐसा ही है तो उन्हें कुछ प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए। मुसलमानों को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ  भ्रमित/गुमराह किसने किया? सी.ए.ए. से भारत में इस्लामी पहचान को खतरा है- ऐसी भावना मुस्लिमों में किसने भरी? राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का गढ़ बना ‘शाहीन बाग’ किसके द्वारा प्रायोजित है और इन सबका लाभ अंत में किसे मिला?

सच तो यह है कि मुस्लिम समाज में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति घृणा के बीज दशकों से बोए जा रहे हैं। यदि इस्लामी पहचान के नाम पर मुसलमान एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ  वोट करें तो वह लोकतंत्र का रक्षक बन जाता है- किंतु भाजपा उसी ध्रुवीकरण से निपटने की अपनी चुनावी रणनीति बनाए, तो उस पर साम्प्रदायिकता का बिल्ला चस्पा हो जाता है। यह दोहरा मापदंड क्यों? इस प्रश्न के उत्तर में ही वे मुद्दे निहित हैं, जिनके बल पर ‘आप’ की दिल्ली में दमदार वापसी हुई है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।
comments

.
.
.
.
.