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तीस हजारी अदालत परिसर में वकीलों और पुलिस में मारामारी सरासर अवांछित

  • Updated on 11/5/2019

वकीलों और पुलिस का आपस में चोली-दामन का साथ माना जाता है। जहां वकील अदालत में अपने तर्कों द्वारा अपराधियों को सजा दिलवाने का काम करते हैं वहीं पुलिस विभाग के सदस्य अपराधियों को पकड़ कर अदालत तक पहुंचाते हैं लेकिन जब ये दोनों ही आपस में लड़ पड़ें तो स्थिति कितनी विकट हो सकती है इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं। कुछ ऐसी ही स्थिति 2 नवम्बर दोपहर को दिल्ली की तीस हजारी अदालत के परिसर में पैदा हो गई जब एक वकील की कार पुलिस की जेल वैन से छू जाने पर उस वकील और एक सिपाही के बीच हुई बहस ने वकीलों और पुलिस कर्मियों के बीच गंभीर झगड़े का रूप ले लिया।

‘तीस हजारी बार एसोसिएशन’ के सचिव जयवीर सिंह चौहान के अनुसार वकीलों को हवालात में ले जाकर बुरी तरह पीटा गया जबकि पुलिस का आरोप है कि वकीलों ने पुलिस कर्मियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा और गाडिय़ों को आग लगा दी। इस दौरान 20 पुलिस कर्मी और 8 वकील घायल हो गए जबकि 17 वाहन क्षतिग्रस्त हुए। आग पर काबू पाने के लिए अग्निशमन विभाग को 10 अग्निशामक वाहन वहां भेजने पड़े। 


वकीलों का आरोप है कि उनका एक साथी पुलिस की गोली से घायल हुआ है जबकि पुलिस का कहना है कि उन्होंने गोली नहीं चलाई। इस घटना के विरुद्ध 4 नवम्बर को वकीलों के कुछ संगठनों ने एक दिवसीय हड़ताल का आह्वïान किया तथा दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे के विरुद्ध कार्रवाई करने की मांग की है। किसी काम से दिल्ली आई असम बार कौंसिल की सदस्य खुशबू वर्मा ने कहा कि जब वह इस घटना के विरुद्ध प्रदर्शन कर रही थीं तो पुलिस वालों ने उन पर भी हमला किया। घटनास्थल पर महिला पुलिस भी मौजूद नहीं थी।

 
दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 नवम्बर को स्वत: संज्ञान लेते हुए रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में न्यायिक जांच और इस दौरान किसी भी वकील के विरुद्ध कार्रवाई न करने के अलावा स्पैशल कमिश्नर संजय सिंह और ए. डी.सी.पी. हरिंद्र सिंह का जांच दौरान तबादला करने का आदेश दे दिया है। घटना के वास्तविक कारणों का पता तो इसकी विस्तृत जांच के बाद ही चलेगा फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि वकीलों और पुलिस में ऐसी स्थिति का मौका ही नहीं आना चाहिए था।


यही नहीं, जहां उक्त घटना के विरोध में वकीलों ने 4 नवम्बर को कड़कडड़ूमा कोर्ट के बाहर 2 पुलिस कर्मियों को पीट डाला वहीं कानपुर में एस.एस.पी. के कार्यालय पर पथराव किया और पुलिस की गाड़ी के शीशे तोड़ दिए।  कानून के रखवाले समझे जाने वाले वकीलों और पुलिस के इस तरह के आचरण से आम जनता में इन दोनों की ही प्रतिष्ठा को धक्का लगा है। ऐसा आचरण करने की बजाय दोनों ही पक्षों से संयमित प्रतिक्रिया देने की उम्मीद की जाती थी न कि हिंसा पर उतारू होने की।

-विजय कुमार 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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