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अखंड भारत के लिए ‘बलिदान’ देने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

  • Updated on 6/23/2020

पुण्यतिथियां तो अनेकों महापुरुषों की मनाई जाती हैं और आगे भी मनाई जाती रहेंगी। वे पुण्यात्मा बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिनके समर्थक या उनकी विचारधारा पर चलने वाले उनके ‘बलिदान’ को अपने प्रयासों से सार्थक कर दुनिया के सामने इतिहास रचते हैं। 23 जून को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि है। इस पुण्यतिथि को असामान्य और असाधारण कहा जाएगा। अखंड भारत के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि भारत में यानी एक देश में ‘दो निशान, दो विधान एवं दो प्रधान’ नहीं चलेंगे। 

उन्होंने भारतीय संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को कहा था कि ‘या तो मैं संविधान की रक्षा करूंगा नहीं तो अपने प्राण दे दूंगा’। हुआ भी यही। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी परमिट के बिना जम्मू-कश्मीर गए। उन्हें शेख अब्दुल्ला की सरकार ने गिरफ्तार किया। उन्होंने कहा— मैं इस देश का सांसद हूं। मुझे अपने देश में ही कहीं जाने से आप कैसे रोक सकते हैं। उन्हें गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद उन्हें मृत घोषित किया गया। वे अखंड भारत के लिए बलिदान देने वाले पहले भारतीय थे, जो जनसंघ के अध्यक्ष के रूप  में वहां गए थे।

23 जून के उसी बलिदान दिवस को भारतीय जनसंघ और अब भाजपा पुण्यतिथि के रूप में मनाती है। भारतीय जनसंघ से लेकर भाजपा के प्रत्येक घोषणा पत्र में अपने बलिदानी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस घोष वाक्य को कि ‘हम संविधान की अस्थायी धारा 370 को समाप्त करेंगे’, सदैव लिखा जाता रहा। 

समय आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने स्वयं डा. मुरली मनोहर जोशी के साथ भारत की यात्रा करते हुए श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया था और गृहमंत्री अमित शाह ने 5 अगस्त, 2019 को धारा 370 को राष्ट्रहित में समाप्त करने के निर्णय को दोनों सदनों से पारित कर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा मां भारती के लिए जीवन देने को सच्ची श्रद्धांजलि दी।

राष्ट्रभक्ति के आंचल में राष्ट्र पुरुष का निर्माण
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसे धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और राष्ट्रभक्त माता-पिता की संतान थे जिनकी प्रसिद्धि न केवल बंगाल बल्कि सम्पूर्ण भारत में थी। धर्म एवं संस्कृति के प्रति आदर तथा राष्ट्रीयता की प्रेरणा उन्हें अपने माता-पिता से मिली थी। 1929 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य बने, 1934 से 1938 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के उप-कुलपति रहे, अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए, बंगाल प्रांत के वित्त मंत्री रहे, महाबोधि सोसायटी एवं रॉयल एशियाटिक सोसायटी के अध्यक्ष रहे, संविधान सभा के सदस्य बने, स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री बने, 1952 के पहले आम चुनाव में दक्षिण कलकत्ता संसदीय क्षेत्र  से लोकसभा सांसद भी बने। 

मां भारती के सच्चे सपूत ने विभाजन का विरोध किया
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  भारत का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। इसके लिए वे महात्मा गांधी के पास भी गए थे। परंतु गांधी जी का कहना था कि कांग्रेस के लोग उनकी बात सुनते ही नहीं। जवाहर लाल नेहरू भी विभाजन के पक्ष में थे। जब देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा न हो। उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया, जिससे मुस्लिम लीग का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका। 

उन्होंने अंतत: 8 अप्रैल, 1950 को नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया, जिसमें वे 1947 में गांधी जी के निमंत्रण पर शामिल हुए थे। डॉ. मुखर्जी ने अनुभव किया कि नेहरू पाकिस्तान सरकार के प्रति बहुत ज्यादा नरम रवैया रखे हुए हैं और उनमें पश्चिमी (वर्तमान पाकिस्तान) और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगलादेश) में छूट गए हिन्दुओं के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने का कोई साहस नहीं है। 21 अक्तूबर,1951 को भारतीय जनसंघ का गठन हुआ जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष बने। डॉ. मुखर्जी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा था, आज भारतीय जनसंघ के रूप में एक नए अखिल भारतीय राजनीतिक दल का उदय हो रहा है जो देश का प्रमुख प्रतिपक्षी दल होगा। यद्यपि भारत अद्वितीय विविधताओं का देश है, तो भी इस बात की परम आवश्यकता है कि मातृभूमि के प्रति गहरी भक्ति भावना और निष्ठा की चेतना में से विकसित होने वाला बंधुत्व भाव और विवेक समस्त देशवासियों को एक सूत्र में बांधे।’

आई विल क्रश दिस क्रशिंग मेन्टैलटि
देश में पहला आम चुनाव 25 अक्तूबर, 1951 से 21 फरवरी 1952 तक हुआ। भारतीय जनसंघ को तीन सीटें मिलीं। डॉ. मुखर्जी भी दक्षिण कलकत्ता संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीत कर लोकसभा में आए। यद्यपि उन्हें विपक्ष के नेता का दर्जा नहीं था लेकिन वे संसद में डैमोक्रेटिक एलायन्स के नेता थे।  सदन में नेहरू की नीतियों पर तीखा प्रहार करते थे। सदन में बहस के दौरान नेहरू ने एक बार डॉ. मुखर्जी की तरफ इशारा करते हुए कहा था ‘जनसंघ एक कम्यूनल पार्टी है, आई विल क्रश जनसंघ।’ इस पर डॉ. मुखर्जी ने जवाब देते हुए कहा, ‘माय फ्रैंड पंडित जवाहर लाल नेहरू सेज दैट ही विल क्रश जनसंघ, आई से आई विल क्रश दिस क्रशिंग मेन्टैलटि।’ 

संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर अपना जीवन बलिदान कर दूंगा
जिस समय संविधान सभा में धारा 370 पर विचार-विमर्श हो रहा था, शेख अब्दुल्ला की बात मानकर जवाहर लाल नेहरू स्वयं विदेश चले गए। यह एक सोची-समझी रणनीति  के तहत किया गया। नेहरू मंत्रिमंडल में बिना विभाग के मंत्री रहे गोपालस्वामी अयंगर, जो जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के दीवान रहे थे, को नेहरू खासतौर पर जम्मू-कश्मीर के लिए ही कैबिनेट में लाए थे। विदेश जाने से पहले नेहरू यह जिम्मेदारी अयंगर को देकर गए थे। धारा 370 का प्रावधान कांग्रेस संसदीय दल के समक्ष आया और वहां भी विरोध हुआ। घबराए अयंगर सरदार पटेल के पास पहुंचे। उन्होंने भी इसे अस्वीकार कर दिया लेकिन अस्थाई व्यवस्था की गई। सरदार पटेल का कहना था नेहरू होते तो इसे ठीक कर देता लेकिन अभी तो मानना होगा। सरदार पटेल का असामयिक दुनिया से चला जाना दुर्भाग्यपूर्ण रहा। 

जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की पृथकतावादी राजनीतिक गतिविधियों से उभरी अलगाववादी प्रवृत्तियां 1952 तक बल पकडऩे लगी थीं। इससे राष्ट्रीय मानस  विक्षुब्ध हो उठा था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रजा परिषद के सत्याग्रह को पूर्ण समर्थन दिया जिसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना था। इसके समर्थन में उन्होंने जोरदार नारा बुलंद किया था -‘एक देश में दो निशान, एक देश में दो विधान, एक देश में दो प्रधान, नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे’। अगस्त, 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त करते हुए कहा-‘‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’’ 

अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने नई दिल्ली में नेहरू सरकार और श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला की सरकार को चुनौती देने का निश्चय किया। मई 1953 में जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। उनका उद्देश्य वहां जाकर स्थिति का अध्ययन करना था। उन दिनों जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट लेना पड़ता था। लेकिन उन्होंने बिना परमिट जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवेश करने का निर्णय लिया। उन्होंने सम्प्रभु गणतंत्र भारत के अंदर दूसरे सम्प्रभु गणतंत्र के अस्तित्व को अस्वीकार कर दिया। 

बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करने से पहले उन्होंने कहा था- ‘विधान लूंगा या अपने प्राण दूंगा।’ जब उनसे परमिट मांगा गया तो उन्होंने कहा, ‘‘मैं भारत की संसद का सदस्य हूं, मैं अपने ही देश में कश्मीर में परमिट लेकर नहीं जाऊंगा।’’ उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया। 40 दिन तक न उन्हें चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई और न अन्य बुनियादी सुविधाएं दी गईं। 23 जून, 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। अपने संकल्प को साकार करने के लिए डॉ. मुखर्जी ने भारत माता के चरणों पर अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया।

- प्रभात झा (भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व राज्य सभा सांसद)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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