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संसदीय परपंराओं को खण्डित करता ‘आपातकाल’

  • Updated on 6/25/2020

लम्बे संघर्ष के परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत में स्वतंत्रता का सूर्य उदय हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही हमने लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में भारत को स्थापित किया। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर शासन की संसदीय प्रणाली को अपनाया। एक लम्बी और व्यापक परिचर्चा के बाद भारत के विशाल संविधान का निर्माण हुआ, जिसमें व्यक्ति के मौलिक अधिकार व कर्तव्यों का समावेशन किया गया। भारत की पहचान विश्व के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र के रूप में स्थापित हुई परन्तु इस गौरवमयी लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे भी क्षण हैं जो कलंक के रूप में अंकित हैं। 25 जून 1975 का दिन ऐसा ही एक दिन है जब भारत के लोकतंत्र, संसदीय व्यवस्था और सुदृढ़ संस्थाओं की हत्या करने का कुत्सित प्रयास तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा किया गया। अपनी सत्ता को बचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 352 का प्रयोग करते हुए देश में आपातकाल की घोषणा की गई। 

वस्तुत: देश का जनमानस इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी के निरकुंश और भ्रष्ट शासन से मुक्ति के लिए जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलनरत था। इसी बीच 12 जून 1975 को दो बड़ी घटनाएं घटित हुईं जिन्होंने इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी की जड़ों को हिलाकर रख दिया। प्रथम गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी पराजय हुई और जनता ने जनता मोर्चा को भारी बहुमत से विजयी बनाया। द्वितीय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली से राजनारायण जी की याचिका पर निर्णय देते हुए इंदिरा गांधी को चुनाव कदाचार एवं भ्रष्ट आचरण का दोषी मानते हुए उनके चुनाव को निरस्त कर दिया और 6 वर्ष के लिए उनके चुनाव लडऩे पर भी प्रतिबंध लगा दिया। 

इन घटनाओं से विचलित होते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। इस आपातकाल की घोषणा के लिए आधार दिया गया कि विपक्ष के बहुत बडे़ षड्यंत्र से देश को बचाने के लिए एेसा किया गया है। जयप्रकाश नारायण,  मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी,  लालकृष्ण अडवानी जैसे विपक्ष के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। लोगों के मूल अधिकारों को निरस्त कर दिया गया। प्रैस पर सैंसरशिप लगाए गए। देश में मीसा (मैंटीनैंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) तथा डी.आई.आर. (डिफैंस ऑफ इंडिया रूल्स) जैसे कानूनों का दुरुपयोग करते हुए लोगों को यातनाए दी गईं। आंकड़ों के अनुसार डी.आई.आर. के तहत 75,818  लोगों को एवं मीसा के तहत 34,988 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 15 मार्च 1975 को भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री के$ सुब्बाराव ने निरंकुश सत्ता के विषय में चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘‘निरंकुश सत्ता हर जगह स्वयं को स्थापित कर लेती है और सार्वजनिक हित के नाम पर स्वयं को सत्ता में बनाए रखती है।’’ एेसा ही प्रयास कांग्रेस और इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल की घोषणा के द्वारा किया गया था। श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा इस समय न केवल लोकतांत्रिक पद्धति पर प्रहार किया गया अपितु संसदीय परंपराआें में भी परिवर्तन का प्रयास किया गया। इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र की बहुदलीय संसदीय प्रणाली के स्थान पर एक दल के वर्चस्व वाली प्रणाली को स्थापित करने का भी सक्रिय प्रयास किया। कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक पत्र नैशनल हेराल्ड के सम्पादकीय में लिखा गया था कि बहुदलीय प्रणाली के परिणामस्वरूप केन्द्र व देश कमजोर हुए हैं। 

आजकल कुछ ऐसे तत्व उभर के आए हैं जो यह दुष्प्रचार करते हैं कि वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार संविधान को तोडऩे- मरोडऩे का काम कर रही है। ये एेसे तत्व हैं जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और जिन्हें मोदी सरकार में किए गए विकास कार्य एवं सबका साथ-सबका विकास दिखाई नहीं पड़ते हैं। ये तत्व उस समय कहां चले गए थे जब इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र और संसदीय परम्पराआें को खंडित करने का प्रयास करते हुए देश पर आपातकाल लगाया।

हमारे संविधान निर्माताआें ने देश में लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली के तहत प्रत्येक पांच वर्ष में लोकसभा का चुनाव करके जनता का जनादेश प्राप्त करने की जो बात कही थी, श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उसे ही तोडऩे का कार्य किया गया और लोकसभा की अवधि को 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया। इससे स्पष्ट होता है कि संविधान को तोड़ने-मरोड़ने का और अपने व्यक्तिगत हित के लिए परिवर्तित करने का कार्य कांग्रेस और  इंदिरा गांधी द्वारा किया गया था। उस समय तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग चुप रहा। इसी संशोधन की आड़ लेते हुए उस समय की जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने अपना कार्यकाल भी 5 वर्ष की जगह 6 वर्ष कर दिया।

1977 के चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद केन्द्र में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो इंदिरा जी द्वारा लिए गए इस निर्णय को पलट दिया गया और पुन: संवैधानिक  प्रावधान के अनुरूप लोकसभा का कार्य 5 वर्ष करते हुए प्रत्येक 5 वर्ष पर चुनाव कराने की व्यवस्था को लागू किया गया। परन्तु जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कार्यकाल 6 वर्ष ही रखा गया, उस समय भी तथाकथित बुद्धिजीवी चुप रहे। अब जबकि केन्द्र में मोदी सरकार ने अपने साहसिक एवं ऐतिहासिक निर्णय द्वारा कांग्रेस पार्टी की भूल को सुधारते हुए जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त किया तब जाकर जम्मू-कश्मीर में भी इस प्रथा को समाप्त किया गया। 

25 जून 1975 वह तिथि है जो स्वतंत्र भारत के सबसे काले दिवस के रूप में याद की जाती है। भारत के पूर्व उप-प्रधानमंत्री  लालकृष्ण अडवानी अपनी पुस्तक ‘मेरा देश मेरा जीवन’ में लिखते हैं ‘‘दल बदल के विरुद्ध प्रस्तावित कानून से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने अपनी बैठक 26 और 27 जून 1975 को बैंगलोर में प्रस्तावित की थी जिसमें मेरे साथ अटल बिहारी वाजपेयी और कांग्रेस (ओ) से  श्यामनन्दन मिश्र भी सदस्य थे। अटल जी एक दिन पहले ही बैंंगलोर पहुंच चुके थे।  मैं और श्यामनन्दन मिश्र पालम हवाई अड्डे से विमान द्वारा बैंगलोर पहुंचे। बैंगलोर पहुंचने पर हमारी अगवानी हुई तथा राजभवन के पास विधायक निवास में हमें ठहराया गया। इस संयुक्त समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के श्री दरबारा सिंह थे जो बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री बने। 26 जून को प्रात: 7:30 बजे जनसंघ के कार्यालय से फोन आता है कि  जयप्रकाश नारायण और  मोरारजी देसाई जैसे नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है और आपकी भी गिरफ्तारी हो सकती है। मैंने तुरन्त सूचना श्यामनन्दन मिश्र को दी और दोनों अटल जी के कमरे में गए। वहां 8 बजे का आकाशवाणी से समाचार सुना। उससे पता चला कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद-352 के तहत आपातकाल घोषित कर दिया और यह आधार लिया गया कि विपक्ष के बहुत बडे़ षड्यंत्र से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है। प्रात: 10 बजे पुलिस हमें गिरफ्तार करने आ गई और समाजवादी नेता मधु दंडवते जो अन्य समिति में भाग लेने आए थे उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। सबको गिरफ्तार कर सैंट्रल जेल में डाल दिया।’’

आज के दिन हमें इतिहास की बारीकियों को और अधिक नजदीक से जानने तथा उनसे सीख लेते हुए भारतीय लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना को आगे बढ़ाने का प्रण लेना चाहिए। मेरा पूर्ण विश्वास है कि भारत का लोकतंत्र माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में और अधिक मजबूत होगा।

- अर्जुन राम मेघवाल (भारी उद्योग और लोक उद्यम एवं संसदीय कार्य मंत्री)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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