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every person from every city town and village is rich anjsnt

हर शहर, कस्बे और गांव का प्रत्येक व्यक्ति हो ‘सम्पन्न’

  • Updated on 6/13/2020

कोरोना वायरस महामारी के कारण समस्त विश्व एक अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसे कठिन समय में भी ‘नया भारत-आत्मनिर्भर भारत’ का मंत्र  देकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के प्रत्येक नागरिक के मन में मनोबल, आत्मविश्वास और स्वाभिमान की भावना भर दी है। आर्थिक रूप से सशक्त भारत की कल्पना निश्चित रूप से संभव है, बशर्ते देश के सभी राज्य आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों।
 राज्य की सम्पन्नता इसकी सबसे छोटी इकाई अर्थात गांवों की समृद्धि पर निर्भर करती है और यह तभी संभव है जब  शहर, कस्बे और गांव का प्रत्येक व्यक्ति  सम्पन्न हो, आत्मनिर्भर हो। इन उद्देश्यों की पूॢत  के लिए बहुत बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता नहीं है बल्कि  छोटे-छोटे परंतु महत्वपूर्ण कदमों के उठाए जाने की आवश्यकता थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इन्हीं लक्ष्यों को ध्यान में रखकर  इस बार के आर्थिक पैकेज में प्रावधान किए हैं, जो निश्चित रूप से आत्मनिर्भर भारत की नींव के पत्थर साबित होंगे।
वायरस जनित प्रकोप के कारण लॉकडाऊन  के दौरान सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों से लोगों का कृषि संबंधी कार्यों के प्रति जुड़ाव को देखकर एक सुखद आश्चर्य हुआ  और लगभग वह सभी कार्य, स्मृति पटल पर उभर आए जो सत्ता के माध्यम से जनसेवा के दौरान इस क्षेत्र के उत्थान के लिए किए थे। 1998-2003 के पहले कार्यकाल का विश्लेषण किया जाए तो बिग पुश अर्थात बड़े धक्के की थ्योरी के तहत जिसमें उद्योग, सड़क, ऊर्जा जैसे आधारभूत ढांचे में निवेश करके प्रदेश को आगे बढने की योजना बनाई और उस अवधि में ही उन योजनाओं को अमलीजामा भी पहनाया गया। 
औद्योगिक पैकेज के तहत  प्रदेश में बी.बी.एन., काला अंब टाहलीवाल  व अन्य क्षेत्रों में हजारों  उद्योग स्थापित किए गए  जिसके चलते आज हिमाचल प्रदेश एशिया में दवाई उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र बन गया है। प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत हर गांव को सड़क से जोड़ा गया।

कोलडैम, पार्वती परियोजना, रामपुर परियोजना जैसे कई पनबिजली परियोजनाओं की शुरूआत की गई। यह पहली बार था कि भाजपा ने पूरे पांच वर्ष तक सरकार चलाई थी। वर्ष  2003 तक जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण आना भी शुरू हो गया था और यह आश्चर्यजनक था कि हिमाचल ग्रामीण जनसंख्या  के मामले में देश भर में प्रथम स्थान पर था। इन आंकड़ों को देख कर मन  में संकल्प मजबूत हो  गया कि किसान को स्वावलंबी और  ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मजबूती लाए बिना हम आत्मनिर्भर हिमाचल का निर्माण नहीं कर सकते हैं।

कृषि आॢथकी में पशुपालन अभिन्न अंग है। सदियों से यह क्षेत्र ग्रामीण आॢथकी की रीढ़ रहा है। इसलिए इस क्षेत्र को मजबूत करने के लिए तत्कालीन सरकार ने उत्तम किस्म के पशु, पर्याप्त चारा, पशु चिकित्सा व उचित विपणन व्यवस्था हेतु समन्वित प्रयास आरंभ किए। सबसे पहले दूध गंगा योजना का शुभारंभ किया जिसके तहत उत्तम किस्म की गाय ,भैंस व बछड़ी खरीदने के लिए पांच लाख रुपए तक का ऋण जिसमें 33.33 प्रतिशत तक सबसिडी का प्रावधान किया गया था। 
इस योजना के तहत  ग्रामीण स्तर पर कोल्ड स्टोर से लेकर चिकित्सा इकाइयां स्थापित करने के लिए भी ऋण का प्रावधान किया गया।

इसी के साथ भेड़ पालकों के लिए ‘भेड़ पालक समृद्धि योजना’ के तहत उत्तम किस्म का मेंढा व भेड़ खरीदने के लिए एक लाख रुपए का ऋण जिसमें 33 प्रतिशत उत्पादन की व्यवस्था की गई। साथ में नि:शुल्क टैंट, तिरपाल, सौर ऊर्जा लाइट और फ्री मैडीकल किट देकर भेड़पालकों को सुविधा उपलब्ध करवाई गई। इस कड़ी में आवारा पशुओं की समस्या से निजात पाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पहली बार मंदिर न्यासों की गौसदनों के संचालन में सहभागिता सुनिश्चित की जिसकी सराहना राष्ट्रीय स्तर पर भी हुई थी।पशुओं को अच्छा चारा उपलब्ध हो इसके लिए भोरंज में पशु आहार संयंत्र खोला गया व निजी क्षेत्र में चारा इकाइयां स्थापित करने के लिए सबसिडी का प्रावधान किया गया।

रामपुर व आनी में दूध उत्पादन बहुत होता है परन्तु बाजार उपलब्ध नहीं था  जिससे उत्पादकों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। इस समस्या के निदान हेतु रामपुर के दत्तनगर में तीन करोड़ रुपए से शुष्क दुग्ध संयंत्र की स्थापना की गई। चौंतड़ा और सेराज में  शीतलन इकाइयां तथा नालागढ़ और जंगलबेरी में दुग्ध विधायन संयंत्रों की स्थापना की गई। 
दुग्ध उत्पादकों के साथ अन्याय न हो इसके लिए दूध खरीद मूल्य जो वर्ष 2007 में 10.80 रुपए था उसे चार वर्षों के भीतर बढ़ाकर 17.80 रुपए  कर दिया गया।

इस क्षेत्र में सहकारी सभाओं के निर्माण में प्रोत्साहन देने के साथ-साथ प्रदेश में दूध उत्पादों पर वैट को 13.75 प्रतिशत रुपए से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया था। आज भी प्रदेश में कार्य कर रहे पशु औषधालयों में आधे से ज्यादा उस दौरान ही शुरू किए गए थे और इन्हें सुचारू रूप से चलाने के लिए 1400 बेरोजगार युवाओं को वैटर्नरी फार्मासिस्ट का प्रशिक्षण दिया गया, जो आज भी पशुपालन विभाग में सराहनीय कार्य  कर रहे हैं। 10 करोड़ की लागत से पालमपुर में उन्नत बहुविधिय पशु चिकित्सा सेवाएं एवं कृषक क्षमता निर्माण केंद्र स्थापित किया गया जिसके प्रशिक्षु चिकित्सकों को बेहतरीन सुविधाएं मिल सकें और अच्छे चिकित्सक तैयार हों।

सरकार के इन प्रयासों का परिणाम यह निकला कि  प्रदेश में जो दूध उत्पादन वर्ष 2007-08 में  139 लाख लीटर था वह चार वर्षों में 76 प्रतिशत बढ़कर वर्ष  2011-12 में 245 लाख लीटर हो गया था। सत्ता परिवर्तन के पश्चात भी सरकार के प्रयासों में निरंतरता बनी रहती तो आज हिमाचल प्रदेश इस क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर सकता था। निराशावादी होने से अच्छा है आशावादी होना। इसलिए मेरा यह मानना है कि ग्रामीण आर्थिकी की रीढ़ यह क्षेत्र निश्चित रूप से  आने वाले समय में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा। 


प्रेम कुमार धूमल
(पूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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