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faiz-ahmad-faiz-when-reached-muzaffarabad-from-kashmir-front-aljwnt

फैज अहमद फैज जब कश्मीर मोर्चे से निकल कर मुजफ्फराबाद पहुंचे

  • Updated on 11/21/2020

ऐसा लग रहा था कि हमारे हरावल दस्ते पीछे हट रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे और एक अच्छे प्रबंध के साथ, हर बार मोर्चा लगाते हुए ऐसा कर रहे थे। यह बात स्पष्ट थी। जहां तक टीथवाल के उत्तरी इलाके का संबंध है वहां पर हमारे पास न तो फौज थी और न ही समय कि  हम उस वक्त की स्थिति पर काबू पाने के लिए तुरंत कुछ कर सकें। इसलिए उसे उस वक्त तक के लिए तकदीर के हवाले छोड़ दिया गया।’’

‘‘जरनैली सड़क पर मौजूद मोर्चा एक महत्वपूर्ण था और वहां मौजूद बटालियन को पीछे की ओर धकेल दिया जाए तो चकौती पर ठहरा जा सकता था जो एक अच्छा-खासा मोर्चा थी। लेकिन मैंने सोचा कि इसे इतनी दूर तक पीछे धकेलने के लिए कुछ दिन लगेंगे। फिर भी नदी के दूसरे किनारे पर हमारे पास केवल कुछ कमजोर पार्टियां थीं जिनके पीछे कोई बचाव की पोजीशन नहीं थी। हम इन्हें इतनी दूर तक पीछे धकेलने की हालत में नहीं थे क्योंकि इससे जरनैली सड़क पर स्थित बटालियन की पोजीशन खतरे में पड़ने का डर था। इसलिए मैंने मरी से इस इलाके में अपनी एक अतिरिक्त कंपनी भेज दी। यहां पर उसे दुश्मन का सामना करना होगा और उसे आगे बढ़ने से रोकना होगा ताकि उनकी पेशकदमी में विलम्ब हो।’’

‘‘20 मई को सुबह के 5 बजे आने वाली खबर कुछ अच्छी नहीं थी। हम स्पष्ट रूप से हर तरफ से पीछे हट रहे थे और वह भी काफी तेजी से दोपहर तक मिलने वाली खबरें और भी चिंताजनक हो गईं। बटालियन कमांडर से मिलने वाली एक खबर में बताया गया कि भारतीय फौज उड़ी और चकौती के मध्य इलाके में कहीं पर पहुंच गई है। आजाद फौजों ने पहले झटके में ही पीछे हटना शुरू कर दिया और बिखर गए। इस प्रकार जंग के मैदान में केवल बाकायदा फौज रह गई थी जो कि एक बहुत बड़े इलाके में फैली हुई थी।’’

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‘‘यह बहुत ही गंभीर स्थिति थी। इसलिए मैंने स्वयं ही मोर्चे पर आगे बढऩे के लिए इजाकात हासिल की। निकलने से पहले मैंने एक और बटालियन मांगी जिसे ब्रिगेड से वापस लिया गया था। मेरी इस विनती पर सहमति प्रकट की गई और अगले दिन ही एक और बटालियन को पहुंचाने का वायदा किया गया।’’

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‘‘इसी शाम मैं मरी से निकल गया। उस वक्त मेरे साथ दो स्टाफ अधिकारी और पाकिस्तान टाइम्स के एडिटर फैज अहमद फैज (faiz ahmad faiz) भी थे। हम शाम के समय 7 बजे मुजफ्फराबाद पहुंच गए। वहां का दृश्य कुछ जाना-पहचाना सा लग रहा था, दहशत एक बार फिर इस इलाके में छाई हुई थी। शहरी मुजफ्फराबाद जैसे इलाकों को भी छोड़ कर जा रहे थे। वह चकौती के रास्ते की ओर जा रहे थे जहां पर पनाह लेने वालों की बड़ी भारी भीड़ जमा थी जो अपनी बकरियों, भेड़ों और अन्य सामान के साथ फरार हो रहे थे।’’ 

- ओम प्रकाश खेमकरणी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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