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अच्छाइयों-बुराइयों को समझ कर भविष्य बदलें

  • Updated on 6/9/2020

उद्यमिता बालकनी में दीए जलाने से अलग है।  यह भावना नहीं, संस्कृति, कार्य-संस्कृति, राज्य और उसकी संस्थाओं के प्रति व्यक्ति का विश्वास, जिसे रोबर्ट पुटनम ने ‘सोशल कैपिटल’ की संज्ञा दी थी, से पैदा होता है। कोरोना-संकट में अभावग्रस्त करोड़ों लोगों ने दिखा दिया कि उद्यमिता के सारे तत्व उनके भीतर हैं। अगर गायब है तो राज्य की भूमिका, उस पर विश्वास और इस अविश्वास से उपजी उदासीनता। उद्यमिता के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा नहीं, अच्छी क्वालिटी का माल बनाना होगा और वह तब होगा जब बैंक व उद्योग विभाग का सिस्टम भ्रष्ट न हो, मददगार हो यानी कार्य-संस्कृति बदली जाए।           

अच्छाइयां
केस-1 :
बैरागी और पोक्ला दिलेश सहित कुल 33 प्रवासी मछुआरे तमिलनाडु में लॉकडाऊन में काम छूट जाने पर एक माह तक उम्मीद बनाए बैठे रहे। स्थिति और बिगड़ी तो सबने वापस अपने मूल राज्य ओडिशा जाने की ठानी। गरीबी में भी उद्यमशीलता देखें। अपनी बचत से एक तीन इंजन वाली बड़ी नाव 1.83 लाख रुपए में खरीदी और समुद्र के रास्ते 514 नौटिकल  माइल्स (करीब 1000 किलोमीटर) गांव को चल पड़े। दो बार तूफान ने जीवन लीला खत्म कर दी होती लेकिन समुद्र का अनुभव काम आया। गांव पहुंचे, दो हफ्ते में ही समझ में आ गया कि यहां जीवन और दुष्कर है। 

सोचा था अपनी सामूहिक नाव से मछली मारेंगे और बेहतर जीवन परिवार को देंगे,  लेकिन सरकार ने मछली को सुरक्षित रखने के लिए न तो शीतगृह बनाया न बर्फ प्लांट है और न ही समुद्र से बाजार के लिए कोई ङ्क्षलक बनाया गया है। गांव में मजदूरी में केवल 200 रुपए मिलते हैं जिससे परिवार चलाना मुश्किल था। मछली ज्यादा आए तो रखने की व्यवस्था न होने से व्यापारियों का शोषण और कम हो तो इंजन का डीजल भी मुश्किल। ये फिर वापस तमिलनाडु जाना चाहते हैं दिहाड़ी पर मालिक के लिए मछली मारने, लेकिन मालिक ने काम बंद कर दिया है।   

केस 2. मात्र 15 वर्षीय ज्योति पासवान लॉकडाऊन की त्रासदी में बेरोजी होकर अपनी मजदूरी से हुई बचत से 2000 रुपए की पैडल साइकिल खरीदती है और बीमार पिता को पीछे बैठा कर 1200 किलोमीटर हरियाणा से दरभंगा (बिहार) की अकल्पनीय यात्रा पर निकलती है। रोज 150 किलोमीटर साइकिल चलाती आठ दिन में वह गंतव्य पहुंचती है।

केस 3 : उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बनपति गांव के बचपन से दोस्त मोहम्मद सैयुब और अमृत कुमार गुजरात के सूरत में मजदूरी करते थे। लॉकडाऊन के अगले दिन बेरोजी हुए। 48 दिन तक बचत से खाते रहे, परंतु जब दोबारा काम मिलने की आशा बिल्कुल खत्म हो गई तो सड़क के रास्ते 1400 किलोमीटर दूर गांव की ओर चल पड़े। कभी पैदल, ट्रक पर बैठ कर आधा रास्ता तय कर शिवपुरी जिले के कोलरास (मध्य प्रदेश) कस्बे पहुंचे, लेकिन सूरज की तपिश में अमृत की हालत बिगड़ गई। उसका बचना मुश्किल लगने लगा। जहां बाकी सभी मजदूरों ने घर पहुंचने के लिए साथ छोड़ दिया, वहीं सैयुब उसे लेकर कोलरास सरकारी अस्पताल पहुंचा। घंटों इंतजार के बाद डॉक्टर आए,  तब तक वह अमृत के सिर को अपनी जांघ पर रख कर भूखा-प्यासा पड़ा रहा। जब डॉक्टर ने उससे कहा कि तुम अपने गांव चले जाओ क्योंकि इसकी स्थिति बचने वाली नहीं है तो सैयुब का जवाब था मैं इसके मां-बाप को क्या मुंह दिखाऊंगा। सैयुब अंत में उसकी लाश लेकर ही गांव पहुंचा।

इन तीनों घटनाओं में गरीबी में भी लोगों की अप्रतिम उद्यमिता का मुजाहिरा होता है। बचत से बड़ी नाव (जिसे घर पहुंच कर आय का साधन भी बनाया जाना उद्देश्य था) खरीद कर समुद्री मार्ग से 1000 किलोमीटर चलना हो या ‘पिज्जा खाने और ट्वीटर पर चैट करने वाली संभ्रांतीय किशोर चरित्र’ से दूर बीमार बाप को 1200 किलोमीटर साइकिल से ले जाने का अदम्य हौसला हो। क्या इनमें किसी सुन्दर पिचाई, मार्क जुकरबर्ग या बिल गेट्स या इंदिरा नूई या फिर रितेश अग्रवाल सरीखे उद्यमियों जैसा हौसला नहीं था? 

कमी कहां थी?
केस 1.
मछुआरों को गांव के पास शीतगृह मिलता या बाजार की बेहतर शोषण मुक्त व्यवस्था मिलती तो ये निर्यातक बन सकते थे। राज्य और उसके अभिकरणों ने अपनी भूमिका नहीं निभाई। 
 

केस 2 : जो बालिका पौराणिक श्रवण कुमार के पितृ-प्रेम को भी अपने अदम्य उत्साह से हल्का कर सकती है, जो कामुक हिंसक समाज के  बावजूद ‘भयमुक्त’ होकर गंतव्य पहुंचती है वह पढ़ भी सकती थी, लेकिन गरीबी ने उसे बाप के साथ काम पर जाने को मजबूर किया। 

गृह राज्य में कहने को शिक्षा मुफ्त है और पढऩे के लिए साइकिल भी राज्य अभिकरण की सौगात है (जिसकी बदौलत सत्ता दल कई बार  चुनाव जीत चुका है),  लेकिन रोजगार नहीं है। लिहाजा बाप बाहर जाकर कमाता है, लेकिन कानून व्यवस्था कमजोर होने के कारण जवान होती लड़की को भी सामने ही रखना चाहता है। बेटी मजदूरी करेगी तो कुछ कमाई बढ़ जाएगी।   

केस 3 : सैयुब बीमार अमृत को नहीं छोड़ पाता जबकि डॉक्टर उसे कोरोना का भय भी दिखाता है। सैयुब अपने दोस्त के मां-बाप के प्रति नैतिक जिम्मेदारी तक जानता है, लेकिन देश में पिछले कई वर्षों से साम्प्रदायिक तनाव अपने शबाब पर है। किसने बिगाड़ा सैयुबों की नैतिकता या बैरागियों की उद्यमिता के बोध को? 

भ्रष्ट और निकम्मा राज्य एवं  उसके तंत्र  
साइकिल के एक बड़े ब्रांड ने दो दिन पहले अपनी गाजियाबाद स्थित फैक्टरी हमेशा के लिए बंद कर दी। मालिक का कहना है वेतन देने के पैसे नहीं थे। करीब 1000 श्रमिक बेकार हो गए। 

सरकार कहती (देती नहीं ) है ‘बैंकों से ऋण ले लो, हम गारंटी लेंगे’। हकीकत है कि कोई भी बैंक अपने दरवाजे से उद्यमियों को भगा दे रहा है। बैंकों को ‘तीन सी’ सी.बी.आई., सी.वी.सी. और सी.ए.जी. का डर है यानी सरकार पर बैंकों को भी भरोसा नहीं।

देश में उद्यमिता क्यों नहीं?
राजस्थान के दो हजार आबादी वाले पाली गांव में 44 डिग्री तापमान में घंटों दो किलोमीटर लम्बी लाइन लगा कर बच्चे, युवतियां और युवा टैंकर का इंतजार करते हैं तब मिलता है उन्हें 20 हजार लीटर पानी यानी हर घर को एक दिन में दो से तीन बाल्टी पानी। अगर युवा पानी के लिए सारा दिन तपती धूप झेलेंगे तो पढ़ाई या उद्यमिता तो उस धूप में सूखेगी ही। क्या 70 साल में सरकारें केवल एक टैंकर पानी दे पाईं? एक इंजीनियरिंग का अंतिम वर्ष का मध्यम या निम्न वर्ग का छात्र सोचता है नौकरी कैसे होगी क्योंकि जब भी वह फैक्टरी लगाने की बात कहता है लगभग हर सहपाठी उसे ‘खिसका’ मान लेता है। 

‘वाइब्रैंट गुजरात’ की तस्वीर एक अखबार में दो दिन पहले छपी। वहां देश के सबसे गरीब जिले डांग के कराडीअम्बा  गांव की सरिता गायकवाड़ ने दो साल पहले एशियाई खेलों में दौड़ में देश के लिए गोल्ड जीता। 

इस ताजा तस्वीर में गांव की लड़कियों के साथ यह अंतर्राष्ट्रीय धावक सिर पर मटका लिए एक किलोमीटर दूर कुएं तक जाती दिखी। शायद वह अपना समय ट्रैक पर बिताती तो देश की ‘क्रीड़ा उद्यमिता’ कुछ और होती। संभव है कुछ दिन में सरिता भी खेल में भविष्य न देख लोगों से वंदेमातरम् कहलवाने लगे और उसे उस नई उद्यमिता के पुरस्कार स्वरूप कोई पार्टी टिकट दे और वह राजनीतिक उद्यमिता के धंधे में लग जाए।

- एन.के. सिंह

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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