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Good chance to turn coronavirus hopeless situation into optimism aljwnt

निराशाजनक स्थिति को 'आशावाद' में बदलने का अच्छा मौका

  • Updated on 5/16/2020

21वीं शताब्दी के दूसरे दशक के शुरूआती महीनों में कोरोना वायरस की महामारी करीब-करीब विश्व के सभी देशों में फैल चुकी थी। इस वायरस का कारआमद इलाज उपलब्ध न होने के कारण चारों तरफ कोहराम मच गया। बड़े-बड़े विकसित और शक्तिशाली देश इस भयानक बीमारी के आगे असहाय नजर आ रहे हैं। विश्व का शक्तिशाली देश अमेरिका का सबसे अधिक जानी नुक्सान हुआ है और मसलसल जारी है। यद्यपि यह वायरस चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ, परंतु 200 के करीब देश इस की गिरफ्त में आ गए।

अभी तक अढ़ाई लाख लोगों को अपनी कीमती जानें गंवानी पड़ी हैं और लाखों लोग संक्रमित हैं जिनको स्वस्थ करने के लिए डॉक्टर दिन-रात कोशिश कर रहे हैं। इस वायरस से जहां जानी नुक्सान हुआ है, वहां दूसरी तरफ समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था भी पूरी तरह डगमगा गई है।

यद्यपि यह महामारी भयावह, भयानक है और सभी लोगों को अति मुश्किल के दौर में गुजरना पड़ रहा है। परंतु विवेकशील और समझदार लोगों को इस निराशाजनक स्थिति को आशावाद में बदलने का एक अच्छा मौका भी है। क्योंकि देश की प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाओं में जो-जो कमियां सरकार के सामने दरपेश हैं, उन्हें भविष्य में सुधारने का भी मौका मिलेगा और लंबे लॉकडाऊन के कारण लोगों को जिन-जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें भविष्य में ऐसा न हो, उसके समाधान के लिए सरकारें अवश्य  कोशिश करेंगी। सरकारें अपने पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन में कमियों और कमजोरियों को भी दूर करेंगी। ताकि भविष्य में किसी भी समय ऐसे मौके आने पर लोगों को इस दौर से न गुजरना पड़े।

विश्व के बहुत सारे देशों के कार्पोरेट सैक्टर ने चीन में अपने उद्योग और व्यापार के केंद्र बना रखे हैं। इन निवेशकों के कारण चीन की अर्थव्यवस्था अति मजबूत हुई और वो करीब-करीब विश्व के देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए निर्माण करने लगे। धन विदेशियों ने खुलकर लगाया और चीन सरकार ने उनको जमीन, बिजली, मजदूर और बाकी सुविधाएं मुहैया कीं।
इस तरह चीन कुछ वर्षों में ही एक अति खुशहाल और समृद्धशाली देश बन गया। जो कभी अफीमचियों का देश कहलाता था, अब विकसित देशों की श्रेणी में आकर खड़ा हो गया। भारत को ही नहीं यूरोप, अमेरिका, कनाडा, अफ्रीकन देश और मिडल ईस्ट में भी वो अपने देश का निर्मित सामान भेजता है।

ताज्जुब यह है कि उसने चीन से लेकर यूरोप तक रेलवे लाइन भी बिछा ली, जिससे उसे माल भेजना अति आसान  हो गया है। वुहान में कोरोना वायरस के फैलने से बहुत सारे लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं। शहर बंद कर दिया गया और विदेशी निवेशक इस महामारी से घबरा गए और वे अन्य देशों में अपने उद्योगों को स्थापित करना चाहते हैं। जिनमें वियतनाम, ताइवान, मैक्सिको, बंगलादेश और कई अन्य देश हंै। जो इन निवेशकों को अपने-अपने देशों में लाने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत के लिए इस समय बहुत सुनहरी मौका है कि इन विदेशी निवेशकों को देश में उद्योग स्थापित करने के लिए आकर्षित किया जाए क्योंकि हमारे पास काफी जमीन है, बिजली का उत्पादन भी बहुत अच्छा है, लेबर की उपलब्धता है और अन्य आवश्यक सुविधाएं भी आसानी से मुहैया की जा सकती हैं। भारत सरकार यदि विदेशी निवेशकों की इच्छाओं के मुताबिक हर तरह के संसाधन उपलब्ध करवाए तो बहुत सारे क्षेत्रों मेंं  विदेशी निवेशक यहां काम करने को राजी हो सकते हैं।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार इन कम्पनियों को जमीन मुहैया करने के लिए एक अति सकारात्मक योजना तैयार कर रही हैं। ताकि इन कारखानों को स्थापित करने के लिए 4.61 लाख हैक्टेयर जमीन मुहैया करवाई जा सके। इसमें 1,15,131 हैक्टेयर की मौजूदा इंडस्ट्रीयल जमीन भी शामिल है।

केंद्र सरकार के साथ-साथ प्रादेशिक सरकारों को भी इन निवेशकों को भारत में लाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोडऩी चाहिए। इससे पहले कि निवेशक किसी अन्य देश की तरफ रूख कर लें, भारत सरकार को एक उच्चस्तरीय कमेटी का निर्माण कर देना चाहिए। ताकि कमेटी के सदस्य इन निवेशकों से मुलाकात करके भारत में निवेश करने के लिए आग्रह करें और उन्हें यकीन दिलवाएं कि भारत उनके उद्योग को स्थापित करने के लिए हर तरह की सुविधा मुहैया करेगा।

यदि चीन से यह कम्पनियां आकर भारत में काम शुरू कर देती हैं तो भारत विश्व का एक बहुत बड़े निर्माण का केंद्र बन जाएगा। निवेशकों को भारत में उद्योग स्थापित करने के लिए स्वयं जमीन खरीदनी पड़ती है। जो अपने आप में वर्तमान प्रशासनिक पेचीदगियों के कारण बड़ी मुश्किल पैदा कर देती है और जमीन खरीदने में ही बहुत लंबा समय लग जाता है। कागजी कार्रवाई और लालफीताशाही से भारत अभी तक छुटकारा नहीं पा सका। जो उद्योगों के प्रोत्साहन में एक बहुत बड़ी अड़चन है। केंद्र सरकार को बिना किसी देरी इन बुनियादी परेशानियों को दूर कर देना चाहिए ताकि निवेशकों को किसी भी तरह की कोई मुश्किल दरपेश न हो।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने विदेशों में अपने दूतों को आदेशों दिया है कि जो कम्पनियां चीन छोड़कर दूसरे देशों में जाना चाहती हैं, उन्हें शीघ्र अति शीघ्र तलाशा जाए। ताकि उन्हें भारत में लाया जा सके। चीन के साथ-साथ जापान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और अन्य कई देशों की कम्पनियां भी भारत में आना चाहती हैं। अब यह भारत सरकार पर निर्भर करता है कि वह किस तरह इनको आकर्षित करके यहां ला सकता है।

केंद्र  सरकार के लिए यह एक लिटमस टैस्ट है और यदि सरकार इनमें से कुछ कम्पनियों को ही भारत में लाने में कामयाब हो जाती है तो जहां हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी,  वहां लाखों मजदूरों को भी काम मिलेगा।

पंजाब कृषि प्रधान प्रदेश है। यहां गेहूं,  चावल,  गन्ना, कपास और सब्जियों का अधिक मात्रा में उत्पादन होता है। यहां पर कृषि आधारित उद्योग स्थापित करने का सबसे बड़ा फायदा होगा। क्योंकि यहां पर न तो कोयला है, न लोहा और न ही अन्य किसी किस्म की खान है। यहां पर इन्हीं उत्पादनों से चीजें तैयार की जा सकती हैं, जो भारत और अन्य देशों में भेजी जा सकती है। जिससे किसानों की आमदन बढ़ेगी, मजदूरों को काम मिलेगा और पंजाब की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। क्योंकि इस समय पंजाब से ही शिक्षा हासिल  करने के लिए लाखों विद्यार्थी बाहर जा रहे हैं और हर वर्ष पंजाब से साढ़े 29 हजार करोड़ रुपया विदेशों में जा रहा है। विद्यार्थियों को भारत में ही अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए उच्चकोटि के विश्वविद्यालय बनाए जाएं, ताकि विद्यार्थी बाहर जाने की बजाय भारत में ही शिक्षा हासिल कर सकें।

मजदूरों को इन स्थानों पर रखना सभी सरकारों की जिम्मेदारी है और लंबा लॉकडाऊन सारी समस्या का हल नहीं है। आर्थिक गतिविधियों को चलाने से ही राष्ट्र पुन: अपने पांव पर खड़ा हो सकेगा और हम सबको कोरोना वायरस के साथ रहने का तरीका सीखना होगा।

- प्रो. दरबारी लाल- पूर्व डिप्टी स्पीकर, पंजाब विधानसभा

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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