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चंडीगढ़ पर हिमाचल का भी बनता है हक

  • Updated on 5/18/2018

शिवालिक पहाड़ियों की नयनाभिराम तलहटी में बसा चंडीगढ़ भारत का योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया पहला शहर है। 44 वर्ग मील में फैले इस खूबसूरत शहर को अपनी वास्तुकला और डिजाइन के लिए तो जाना ही जाता है, साथ ही इसे पंजाब व हरियाणा की राजधानी व केंद्र शासित प्रदेश होने का गौरव भी हासिल है। इस शहर की परिकल्पना व इमारतों की वास्तु रचना फ्रांस में जन्मे स्विस वास्तुकार व नगर नियोजक ली कार्बूजिए ने 1950 के दशक में की थी और 1952 में इस शहर की नींव रखी गई। 

इस शहर का नामकरण दुर्गा के एक रूप ‘चंडिका’ के कारण हुआ है और चंडी का मंदिर आज भी इस शहर की धार्मिक पहचान है। इस शहर के निर्माण में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भी निजी रुचि रही है, जिन्होंने नए राष्ट्र के आधुनिक प्रगतिशील दृष्टिकोण के रूप में चंडीगढ़ को देखते हुए इसे राष्ट्र के भविष्य में विश्वास का प्रतीक बताया था।

आजादी से पहले पंजाब की राजधानी लाहौर थी लेकिन 1947 में आजादी के बाद पंजाब को एक अलग राजधानी की जरूरत पड़ी तो नई राजधानी की तलाश शुरू हुई। 1952 से 1966 तक चंडीगढ़ शहर मात्र पंजाब की राजधानी रहा। 1 नवम्बर  1966 को पंजाब के हिंदी भाषी पूर्वी भाग को काटकर हरियाणा राज्य का गठन किया गया जबकि पंजाबी भाषी पश्चिमी भाग को वर्तमान पंजाब में रहने दिया गया। चंडीगढ़ शहर चूंकि दोनों के बीच सीमा पर स्थित था, इसलिए इसे दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी के रूप में घोषित किया गया।

चंडीगढ़ पर पंजाब ने समय-समय पर अपना दावा जताया है  और पंजाब के राजनीतिक दल भी चंडीगढ़ पंजाब को देने के लिए केंद्र पर अपना दबाव बनाते रहे हैं। अगस्त, 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी व अकाली दल के संत हरचंद सिंह लौंगोवाल के बीच हुए समझौते के अनुसार चंडीगढ़ का 1986 में पंजाब में स्थानांतरित होना तय हुआ था लेकिन क्योंकि दक्षिण पंजाब के कुछ ङ्क्षहदी भाषी गांवों को हरियाणा और पश्चिम हरियाणा के कुछ पंजाबी भाषी गांवों को पंजाब को देने पर विवाद था इसलिए प्रशासनिक कारणों से यह समझौता सिरे नहीं चढ़ पाया।

पंजाब में जब भी  चुनावी माहौल  उफान पर होता है, तब  चंडीगढ़ पंजाब को देने की डफली बजने लगती है। हर पार्टी का नेता इसके लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने की डींगें भी मारता है। प्रत्युत्तर में हरियाणा के नेता भी  चंडीगढ़ पर अपना हक जमाने के लिए अपने तरकश से तीर निकालने लगते हैं। 

वास्तविकता तो यह भी है कि चंडीगढ़ को तराशने, संवारने व विकसित करने में हिमाचलियों का भी बहुत बड़ा योगदान है। हिमाचल प्रदेश की सीमाएं भी चंडीगढ़ के साथ सटी हैं। इस शहर में हजारों हिमाचली रह रहे हैं। बहुत से हिमाचली उद्यमी जिनका हिमाचल में कारोबार है, वे भी चंडीगढ़ में बसे हुए हैं। हिमाचली संस्कृति की महक भी इस शहर की फिजाओं में महसूस की जा सकती है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब चंडीगढ़ को पंजाब व हरियाणा की राजधानी बनाया गया तो हिमाचल प्रदेश की पूरी तरह से अनदेखी की गई। हिमाचल प्रदेश को भी चंडीगढ़ में हिस्सा मिलना चाहिए था। 1 नवम्बर, 1966 को जब पंजाब का पुनर्गठन हुआ था तो यह तय हुआ था कि आबादी के हिसाब से परिसम्पत्तियों और देनदारियों का बंटवारा होगा। हरियाणा को तो उसका हिस्सा मिल गया था लेकिन हिमाचल प्रदेश का 7.19 प्रतिशत हिस्सा बनता था जो आज तक नहीं मिल पाया।

भाखड़ा ब्यास मैनेजमैंट बोर्ड में हिमाचल 45 करोड़ की रॉयल्टी का दावा करता है और बी.बी.एम. बोर्ड में भी 7.19 फीसदी हिस्से की मांग लगातार कर रहा है। इस मसले पर सितम्बर, 2011 में देश की सबसे बड़ी अदालत भी हिमाचल के हक में फैसला सुना चुकी है। 

इतिहास गवाह है कि पहले पंजाब, हरियाणा और हिमाचल एक ही भाग थे और जब ये अलग हुए तो हिमाचल को चंडीगढ़ में उसका वैधानिक हिस्सा नहीं मिला। जिस तरह पंजाब व हरियाणा के नेता चंडीगढ़ पर जोर-शोर से अपना दावा जताते रहे हैं,  वैसा जोशो-खरोश हिमाचल के नेताओं ने कभी नहीं दिखाया और इसी बात का चंडीगढ़ में बसे हिमाचलियों को मलाल है।
आज हिमाचल प्रदेश व केंद्र दोनों जगह एक ही दल की सरकार है। ठाकुर जयराम सरकार को प्रदेश हित में चंडीगढ़ में हिमाचल के हिस्से की मांग को जोरदार तरीके से केंद्र के समक्ष उठाना चाहिए और जरूरत पड़े तो अदालत का दरवाजा भी खटखटाना चाहिए।

हिमाचल कैडर के कई ऑफिसर आज भी केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में अपनी बेहतरीन सेवाएं दे रहे हैं। हिमाचल के लोग चंडीगढ़ के चहुंमुखी विकास में भी नए रंग भर रहे हैं। चंडीगढ़ के किसी भी सैक्टर में चले जाएं, आपको हिमाचल के लोग बहुतायत में मिलेंगे। 

प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों चंडीगढ़ में हिमाचल के हिस्से की मीडिया में दावेदारी तो उठाई है लेकिन जिस तरीके से प्रदेश की भाजपा सरकार को इस मुद्दे पर हुंकार भरनी चाहिए, वैसा नहीं हुआ है। कहते हैं, ‘‘लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।’’ हिमाचल की भाजपा सरकार को और सभी राजनेताओं को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चंडीगढ़ पर अपने लम्बित व वाजिब हिस्से की मांग को पूरे दमखम के साथ उठाना चाहिए।

मुख्यमंत्री व उनकी टीम को दिल्ली जाकर मोदी सरकार के समक्ष इस मांग की जोरदार पैरवी करनी चाहिए। यह मुद्दा हिमाचलियों की आन, बान और शान से भी जुड़ा है। आखिर कब तक हिमाचली हितों की अनदेखी होती रहेगी?
-------राजेन्द्र राणा
 

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