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himachal government moving towards giving legitimacy to cannabis cultivation aljwnt

भांग की खेती को वैधता देने की ओर बढ़ रही हिमाचल सरकार

  • Updated on 12/22/2020

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के विशेषज्ञों की सिफारिश के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के मादक पदार्थ आयोग द्वारा भांग को खतरनाक ड्रग्स की सूची से हटा देने के बाद हिमाचल सरकार ने राज्य में भांग की खेती को वैधता देने की तैयारी शुरू कर दी है। प्रदेश और कुछेक जिलों के किसानों की आर्थिकी को बल देने के लिए भांग के औद्योगिक प्रयोग के लिए खेती की इजाजत देने बारे इन दिनों राज्य का आबकारी एवं कराधान विभाग एक पालिसी ड्राफ्ट तैयार कर रहा है। हालांकि गत वर्ष ग्लोबल इंवैस्टर मीट के दौरान कई देशों के उद्योगपतियों की ओर से राज्य में भांग के औद्योगिक प्रयोग की मांग उठाई गई थी। उसके बाद से ही सरकार के आदेशों पर आबकारी एवं कराधान विभाग इस पर काम कर रहा था। 

राज्य के अधिकारियों ने पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में चल रहे इसके पायलट प्रोजैक्ट का भी अध्ययन किया है। लेकिन अब भांग को खतरनाक ड्रग्स की सूची से हटा देने के बाद से राज्य सरकार अपने खाली खजाने को भरने की गरज से जल्द इस पालिसी को मंजूरी देने के मूड में है। राज्य सरकार इसकी खेती के लाइसैंस और औद्योगिक खपत पर लगाए जाने वालों करों से सालाना 500 करोड़ रुपए से अधिक के राजस्व होने का अनुमान लगा रही है। वहीं राज्य के कुल्लू, मंडी, शिमला, सिरमौर और चम्बा जिला के हजारों किसानों की आर्थिकी में भी सुधार आ सकता है। क्योंकि सरकार की सख्ती के बावजूद भी हर साल लगभग 1 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र पर इन जिलों में भांग की खेती होती आ रही है।

पुलिस व अन्य एजैंसियां हर साल हजारों बीघा भूमि से भांग की खेती नष्ट करते हैं और भांग के तस्करों को भी पकड़ रहे हैं। अगर समय रहते राज्य की भाजपा सरकार भांग की खेती को औद्योगिक प्रयोग के लिए मान्यता दे तो न केवल इस बड़ी समस्या से छुटकारा मिलेगा बल्कि  प्रदेश के किसान भी समृद्ध हो सकते हैं। अमरीका, फ्रांस, कनाडा, चीन और यूरोप के कुछेक भागों में भांग की खेती को मान्यता प्राप्त है। जबकि यूरोप के कुछ देशों में भांग की खेती को मान्यता देने की मांग चल रही है। 

आज अम्बेदकर होते तो यू.पी. अध्यादेश के चलते वह भी जेल में होते

फार्मा और टैक्सटाइल सैक्टर सबसे बड़े खरीददार
भांग के पौधे से मुख्यता तेल और रेशा ही प्रयोग में लाया जाता है। जिससे आगे मैडिसिन, कास्मैटिक, टैक्सटाइल, पेपर और फूड से जुड़े प्रोडक्ट बनाए जाते हैं। वैसे तो वैदिक काल से भारत में भांग का प्रयोग लोग चिकित्सा, खाने और धार्मिक आयोजनों में करते आ रहे हैं। लेकिन वर्तमान में जो शोध हुए हैं उनमें यह सामने आया है कि आंख, हृदय, कैंसर, अल्जाइमर, दर्द सहित 23 प्रकार के रोगों में भांग से बनी दवाएं असरकारक हैं। वहीं उत्तराखंड में इसकी खेती के लाइसैंस दिए जाने के बाद कुछ स्टार्टअप ने इसके विभिन्न प्रकार के उत्पाद बाजार में उतारे हैं। जिनमें बिल्डिंग मैटीरियल में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टर विशेष है। 

वर्तमान में देश का सबसे बड़ा फार्मा हब भी हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी में है, वहीं ऊना जिला के पंडोगा में उत्तरी भारत का एकमात्र बल्क ड्रग पार्क बनने का भी रास्ता साफ होता दिख रहा है। बद्दी में लगभग सभी प्रकार की दवाएं और बाडी केयर प्रोडक्ट बनते हैं। जिनमें भांग के तेल की जरूरत भी रहती है। वैसे भी एक अनुमान के तौर पर भारत में भांग के औद्योगिक प्रयोग के लिए 1 ट्रिलियन डालर के कारोबार की गुंजाइश है। वर्तमान में यह जरूरत विदेशों से पूरी हो रही है। 

1971 का भारत-पाक युद्ध एक निर्णायक युद्ध था

वहीं पड़ोसी राज्य उत्तराखंड ने एक पायलट प्रोजैक्ट के आधार पर पौड़ी-गढ़वाल क्षेत्र में एक गैर लाभकारी संस्था इंडिया इंडस्ट्रियल हेम्प एसोसिएशन (आई.आई.एच.ए.) को किसानों से खेती करवाने का लाइसैंस वर्ष 2018 से ही जारी किया हुआ है। पांच साल के इस पायलट प्रोजैक्ट में फिलहाल 1000 हैक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की इजाजत दी गई है जिसका विस्तार आगे 1 लाख हैक्टेयर भूमि तक किया जाना है। भांग की औद्योगिक खेती के लिए भारत में 1 टिलियन डालर का बाजार उपलब्ध है। जिसमें पहली हिस्सेदारी उत्तराखंड की हो चुकी है। वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर सिराज विधानसभा क्षेत्र से संबंध रखते हैं और उनका विधानसभा क्षेत्र भी भांग की अवैध खेती से अछूता नहीं है। 

वहीं उनके विधानसभा क्षेत्र के साथ ही कुल्लू जिला लगता है। इन क्षेत्रोंं में भांग की खेती अवैध रूप से होती है। अगर राज्य में केवल इंडस्ट्रियल प्रयोग के लिए भांग की खेती को वैधता प्रदान की जाती है तो राज्य के किसान एक हैक्टेयर भूमि पर भांग की खेती से सालाना 3.75 लाख रुपए आमदनी कमा सकता है। जबकि पेपर इंडस्ट्री की जरूरतें पूरी कर यह हर साल कटने वाले लाखों-करोड़ों पेड़ों को बचाकर पर्यावरण में भी अपना योगदान दे सकती है।

-डॉ. राजीव पत्थरिया

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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