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5 अगस्त का भूमिपूजन क्या ‘6 दिसंबर 1992’ के बिना संभव था

  • Updated on 8/7/2020

विगत बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में भूमिपूजन होने के साथ राम मंदिर पुनर्निर्माण कार्य का शुभारंभ हो गया। प्रस्तावित राम मंदिर पत्थर और सीमेंट का एक भवन न होकर भारत की सनातन बहुलतावादी संस्कृति की पुनस्र्थापना का प्रतीक है- जिसे सैंकड़ों वर्षों से विदेशी आक्रांता नष्ट करने का असफल प्रयास कर रहे हैं। 

क्या इस ऐतिहासिक क्षण की कल्पना 6 दिसंबर 1992 के उस घटना के बिना संभव थी, जिसमें कार सेवकों ने बाबरी नामक ढांचे को कुछ ही घंटे के भीतर ध्वस्त कर दिया और इस घटनाक्रम में कई कारसेवक शहीद भी हो गए? वास्तव में, यह कई सौ वर्षों के अन्याय से उपजे गुस्से का प्रकटीकरण था। इसमें 1990 का वह कालखंड भी शामिल है, जब तत्कालीन मुलायम सरकार के निर्देश पर कारसेवकों पर गोलियां चला दी गई थीं, जिसमें कई निहत्थे रामभक्तों की मौत हो गई थी। 

शताब्दियों से कितने भारतीयों के नाम में किसी न किसी रूप में राम विराजित हैं- जैसे डा. भीमराव रामजी अंबेडकर और समाजवादी राममनोहर लोहिया। विडंबना देखिए, जो लोग श्रीराम के अस्तित्व को नकारते रहे हैं, उनके लौकिक नाम में भी राम है- जैसे वामपंथी सीताराम येचुरी और दलित राजनीति के प्रमुख चेहरे कांशीराम। सबसे महत्वपूर्ण सिख पंथ के पवित्र ग्रंथ श्रीगुरुग्रंथ साहिब में ईश्वर को जिन 35 नामों से पुकारा गया है, उसमें सर्वाधिक हरि (विष्णु) का नाम 8,000 बार, तो राम का उल्लेख 2,500 से अधिक बार है। 

6 दिसंबर 1992 को, जो ढांचा कारसेवकों द्वारा गिराया गया था, वह मुसलमानों का कोई पूजास्थल या आस्था का केंद्र न होकर उस बहुलतावाद विरोधी ‘काफिर-कुफ्र’  चिंतन का प्रतीक था, जिसमें किसी भी गैर-इस्लामी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं का कोई स्थान नहीं है। राम मंदिर को केवल लूटपाट की नीयत से नहीं तोड़ा गया था, अपितु वह इस्लामी विजेताओं द्वारा पराजितों की आस्था को कुचलना, उनकी पहचान को नष्ट और उसे अपमानित करना चाहते थे। 

मजहबी उन्माद में मुगल आक्रांता बाबर ने पहले अयोध्या में निर्मित विशाल राम मंदिर को जमींदोज करने का आदेश दिया, फिर उसी मंदिर के अवशेषों पर विजितों को संदेश देने के लिए एक ऐसी इमारत का निर्माण किया-जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करके यहां इस्लामी परचम को फहराना था। 

प्राचीन राम-मंदिर की रक्षा और 1528 में ध्वस्त मंदिर की पुनस्र्थापना हेतु असंख्य संघर्षरत रामभक्तों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है, जिसमें सिख समाज ने भी प्रमुख भूमिका निभाई। इस मामले में जो पहली प्राथमिकी दर्ज हुई थी, वह किसी बिंदू के विरुद्ध नहीं, अपितु रामभक्त सिख के खिलाफ थी। 28 नवंबर 1858 को अवध के तत्कालीन थानेदार शीतल दुबे द्वारा लिखी प्राथमिकी संख्या 884 इसका प्रमाण है। 

रामजन्मभूमि मुक्ति के लिए कुल 76 युद्ध लड़े गए, जिसमें 1658 से 1707 ई. के अंतराल में ही अकेले 30 बार युद्ध हुआ। 1735-59 में भी हिंदुओं ने रामजन्मभूमि को पुन: प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु अपेक्षित सफलता नहीं मिली। स्वाधीनता के पश्चात भी रामजन्मभूमि का जिहादी बेडिय़ों में जकड़ा रहना, भारतीय न्याय व्यवस्था की बेमानी और हिंदू समाज की कमजोरी को ही रेखांकित करती है। इस रोष ने 1980 के दशक में रामजन्मभूमि आंदोलन को जन्म दिया। 

यूं तो बाबर के दौर में रामजन्मभूमि अयोध्या पर पहली बार मजहबी आक्रमण हुआ। किंतु इस पर इस्लामी आक्रमणकारियों की गिद्ध-दृष्टि 11वीं शताब्दी के प्रारंभ में तब से थी, जब सन् 1024 को महमूद गजनवी ने इस्लाम के नाम पर सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त किया था। तब कालांतर में गजनवी का भांजा गाजी सैयद सालार मसूद सिंधु नदी पार करके मुलतान, दिल्ली, मेरठ होते हुए अयोध्या स्थित राम मंदिर को ध्वस्त करने बहराइच तक पहुंच गया था। इस दुस्साहस की भनक लगते ही तत्कालीन कौशलाधिपति महाराज सुहेलदेव, जोकि श्रीराम पुत्र लव के वंशज थे और उस समय अयोध्या उनके साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी-उन्होंने अन्य 25 हिंदू राजाओं के साथ मिलकर मसूद की इस्लामी सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 

तब साधु-संन्यासी, अखाड़ों के महंत और उनकी प्रचंड शिष्य वाहनियां भी शस्त्रों के साथ इस संघर्ष में कूद पड़ी थीं। 1034 में घाघरा नदी के निकट 7 दिन चले महायुद्ध में संपूर्ण इस्लामी सेना का सफाया हो गया और सालार मसूद भी मारा गया। सालार की जीवनी ‘मीरात-ए-मसूदी’ लिखने वाले शेख अब्दुल रहमान चिश्ती ने लिखा है, ‘‘इस्लाम के नाम पर जो अंधड़ अयोध्या तक जा पहुंचा था, वह सब नेस्तोनाबूद हो गया।

इस युद्ध में अरब और ईरान के हर घर का चिराग बुझा, यही कारण है कि 200 वर्षों तक विदेशी और विधर्मी भारत पर हमला करने का मन न बना सके।’’ स्पष्ट है कि संगठित हिंदू समाज अपनी सनातन संस्कृति की रक्षा हेतु उस समय विदेशी इस्लामी शक्तियों को प्रचंड चुनौती दे रहा था। लगभग 958 वर्ष पश्चात पीढिय़ों के संघर्ष में तपे हिंदुओं की आहत भावना एकाएक अदम्य हो गई और कारसेवकों ने 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कलंक रूपी भवन को गिरा दिया। 

स्वतंत्रता के बाद से भारत में गुलाम प्रतीकों का विरोध होता रहा है। वर्ष 1947 में स्वतंत्रता पश्चात भारतीय सत्ता अधिष्ठान ने उन प्रतिमाओं, नीतियों और योजनाओं का बहिष्कार किया, जो ब्रितानी प्रभुत्व के प्रतीक थे। इसी कड़ी में औपनिवेशी दासत्व की पहचान किंग जॉर्ज (पांचवें) की मूर्ति सहित कई प्रतिमाओं को 1960 के दशक में उनके मूल स्थान से हटाकर तत्कालीन भारत सरकार द्वारा दिल्ली में बुराड़ी स्थित कॉरोनेशन पार्क में स्थानांतरित किया गया था। 

यदि जब पराधीनता के प्रतीक किंग जॉर्ज की प्रतिमा तत्कालीन भारतीय सत्ता अधिष्ठान से बर्दाश्त नहीं हुई, तब अयोध्या में 16वीं शताब्दी में भारतीय संस्कृति के प्रतिङ्क्षबब राम मंदिर को तोड़कर बनाए गए अपमान रूपी इस्लामी स्मारक को लेकर ऐसा विरोधाभास क्यों था? स्वघोषित प्रगतिशील और उदारवादी अक्सर, अयोध्या में राम-मंदिर के निर्माण में उपयोग हो रही भूमि पर आबंटित धन से अस्पताल, विश्वविद्यालय और सार्वजनिक शौचालय बनवाने का सुझाव देते हैं। 

क्या कारण है कि इस वर्ग का यह सुझाव किसी सिनेमाघर, शराबखाने, मॉल या रेस्तरां के संबंध में क्यों नहीं आता है? क्या यह तर्क केवल हिंदू मंदिर के लिए ही होना चाहिए? चर्च, मस्जिद आदि धार्मिक स्थल इस तर्क की श्रेणी में क्यों नहीं आते हैं? सच तो यह है कि हिंदू मंदिरों के स्थान पर स्कूल-कॉलेज आदि खोलने की बात करने वाले विश्व के सबसे प्रारंभिक महाविद्यालय-नालंदा विश्वविद्यालय के हश्र पर सुविधाजनक चुप्पी साध लेते हैं। इस प्राचीन शैक्षणिक अधिष्ठान को भारत पहुंचे इस्लामी आक्रांता बख्तियार खिलजी ने वर्ष 1193 में जमींदोज कर दिया था।

-बलबीर पुंज

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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