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स्वस्थ रहना है तो एक ‘बच्चा बनें’

  • Updated on 7/31/2020

स्वस्थ होना परमात्मा का सबसे बड़ा आशीर्वाद है। हम सभी परम पिता परमात्मा से हमें अच्छा स्वास्थ्य देने की प्रार्थना करते हैं क्योंकि जब भी कोई किसी पीड़ा में या बीमारी से पीड़ित होता है तो उसे तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक उसे उससे राहत नहीं मिल जाती। कोई भी किसी डाक्टर अथवा वैद्य या फिर किसी ज्योतिषी अथवा तांत्रिक से सलाह लेने में कितनी भी धन राशि खर्च करने को तैयार रहता है ताकि आराम मिल सके।

बिल्कुल सही कहा गया है कि स्वर्ण बिस्तर अच्छी नींद सुनिश्चित नहीं कर सकता। कोई भी अपने स्वास्थ्य की कीमत पर धन कमा सकता है लेकिन अपनी कमाई दौलत के बल पर स्वास्थ्य वापस प्राप्त नहीं कर सकता। जब किसी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं होता तो उसके लिए जीवन एक बोझ बन जाता है और यदि राहत मिलती नहीं नजर आती तो कई बार वह परमात्मा से मौत की दुआ भी मांगने लगता है। 

हम सभी जानते हैं कि डाक्टर, वैद्य केवल रोगी का उपचार कर सकते हैं लेकिन यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि रोगी पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा। केवल परमात्मा ही किसी को भला-चंगा कर सकते हैं। यही कारण है कि हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हैं लेकिन परमात्मा केवल उन लोगों की मदद करते हैं जो स्वस्थ रहने के लिए अपनी ओर से कर्मों द्वारा बेहतरीन प्रयास करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए अपनी ओर से कर्म करने पड़ते हैं तो फिर हमारा कर्म क्या है? हमें क्या कर्म करना है, यह एक बच्चे से सीखना चाहिए। 

कोई यह प्रश्र पूछ सकता है कि बच्चे से ही क्यों? बच्चा जो भी गतिविधियां करता है उन्हीं के अनुरूप अपने आकार, वजन तथा स्वास्थ्य के साथ विकसित होता है। जहां तक हमारी गतिविधियों की बात है, वे हमें बीमार बनाती हैं। हमें एक बच्चे की तरह जीवन जीना सीखना चाहिए ताकि हम भी स्वस्थ विकसित हो सकें और अपनी सेहत को बनाए रख सकें। अब जरा नजर डालते हैं कि बच्चे में कौन से गुण तथा विशेषताएं होती हैं, जो उसे स्वस्थ बनाए रखती और विकसित करती हैं। 

बच्चे की विशेषताएं 
जब कोई बच्चा जन्म लेता है, वह अपने साथ पिछले जन्मों के संस्कारों की एक कम्पैक्ट डिस्क साथ लेकर आता है। वह एक पवित्र आत्मा (दैवीय रोशनी) के तौर पर इस धरती पर कदम रखता है जिसे पृथ्वी के रचनाकार तथा सभी आत्माओं के मालिक द्वारा पवित्र किया गया होता है। वह पवित्र, मासूम, मस्तीखोर व खुश है और इसके साथ ही उसे अपने खुद पर और अपने आसपास की दुनिया पर विश्वास होता है। वह भावुक भी होता है तथा अपने प्राकृतिक व्यवहार के अनुसार अपने कर्म करता है। 

जब हम बड़े होते हैं तब हमारा मूल स्वभाव अप्राकृतिक कार्रवाइयों तथा व्यवहार से विचलित हो जाता है जिससे हमारी आत्मा को चोट पहुंचती है और हमारी शारीरिक प्रणाली में भी गड़बडिय़ां आ जाती हैं। उदाहरण के लिए जब कोई झूठ बोलता है, जोकि आत्मा की प्राकृतिक प्रणाली के खिलाफ है तो वह डरना शुरू कर देता है तथा उसे अपनी गलती को छिपाने की चिंता होने लगती है। इससे हमारे शरीर में तनाव पैदा हो जाता है। 

अत: किसी भी अप्राकृतिक व्यवहार का परिणाम चिंता, डर अथवा ग्लानि के रूप में निकलता है, जो हमारे दिमाग पर बिना किराए के कब्जा कर लेता है। इससे हमारे मन में जो तनाव पैदा होता है, वह हमारी शारीरिक प्रणाली पर भी असर डालता है। इसके अतिरिक्त जब कोई चीज हमारी आशाओं के अनुरूप नहीं घटित होती उससे भी हमारी शारीरिक प्रणाली में तनाव तथा गड़बड़ी पैदा हो जाती है। अब हम किसी बच्चे में पाई जाने वाली विशेषताओं पर नजर डालते हैं, जो उसे प्राकृतिक तथा शुद्ध अर्थात तनावमुक्त बनाती हैं जो हमें भी स्वस्थ रहने में मदद कर सकती हैं : 

भोलापन : भोलेपन का मतलब है पाप, ग्लानि तथा बुरे कार्यों से मुक्ति। एक बच्चे का मन साफ स्लेट अथवा ब्लैंक सी.डी. की तरह होता है। हम उस पर कुछ भी लिख सकते हैं। जब यह बच्चा बड़ा होता है तो उसका मन पाप तथा गलत कार्यों जैसी कार्रवाइयों को समझने लगता है। जब वह पाप तथा गलतियां करके अपनी आत्मा के खिलाफ जाता है तो इससे उसके आसपास तनाव तथा खुशी रहित माहौल बन जाता है। ये तनाव बीमारियों का कारण बनते हैं और शरीर को अस्वस्थ बनाते हैं। 

आत्मा की शुद्धता : शुद्धता का अर्थ किसी भी वस्तु से मिश्रित नहीं होना है। जैसे कि मिलावट रहित। बच्चा किसी भी माहौल में मिलावट से मुक्त होता है जिसमें हम रहते हैं। इस कारण  उसका व्यवहार तथा कार्रवाइयां आत्म केन्द्रित होती हैं। वह उन तनावों से मुक्त होता है जो किसी वयस्क को मार देते हैं। 

चंचलता : (क) एक बच्चा एक मिनट में 5-10 बार मुस्कुराता है जबकि एक वयस्क पूरे दिन में 5-10 बार मुस्कुराता है। एक मुस्कुराता हुआ बच्चा अन्यों के चेहरों पर भी मुस्कुराहट ले आता है। मुस्कुराहट शरीर में ऐसे रसायनों का निर्माण करती है जो बीमारियों के खिलाफ लडऩे में हमारी मदद करते हैं। संदेश यह है-मुस्कुराना जीवन में स्वस्थ रहने का एक रास्ता है।

(ख) बच्चे हमेशा किसी न किसी के साथ खेलने में व्यस्त रहते हैं। उनके पास नकारात्मकता अथवा पीड़ा के बारे में सोचने का समय नहीं होता तथा अपने खेल में अत्यंत व्यस्त होने के कारण उन्हें भूख से होने वाली पीड़ा भी भूल जाती है। यहां संदेश यह है कि खुद को किसी न किसी गतिविधि में व्यस्त रखें ताकि आप जीवन में आने वाली पीड़ाओं तथा समस्याओं को भूल सकें क्योंकि सही कहा गया है कि ‘खाली दिमाग शैतान का घर होता है।’ 

रचनात्मकता : आप पाएंगे कि बच्चा हमेशा रचनात्मक होता है और हर समय कुछ न कुछ अलग करना चाहता है। मगर जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है रचनात्मकता कम होती जाती है। रचनात्मकता दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय करती है लेकिन जब रचनात्मकता कम हो तो दिमाग की कोशिकाएं मरना शुरू हो जाती हैं। आपने संभवत: देखा होगा कि बड़ी उम्र के लोग पार्किंसन्स बीमारी से पीड़ित होते हैं। 

विश्वास तथा भावनाएं : बच्चे को अपनी क्षमताओं तथा अपने आसपास के लोगों पर विश्वास होता है तथा उसके साथ ही उसमें भावनाएं भी खूब होती हैं। यदि इन गुणों को बड़ी उम्र के लोग भी अपनी खुद की शक्तियों तथा अपने आसपास के लोगों पर विश्वास करके अपना लें तो अपने जीवन को तनावमुक्त बना सकते हैं। भावनाओं का बहाव हमारे मन तथा आत्मा को साफ तथा स्वच्छ करके तनावमुक्त भी बनाता है।

- इंजी. ए.के. गोस्वामी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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