Tuesday, Jun 22, 2021
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if ambedkar was present today he would have been in jail due to the up ordinance aljwnt

आज अम्बेदकर होते तो यू.पी. अध्यादेश के चलते वह भी जेल में होते

  • Updated on 12/21/2020

14 अक्तूबर 1956 को नागपुर की दीक्षा भूमि में डा. बाबा साहेब अम्बेदकर (Dr. B. R. Ambedkar) हिन्दू धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म में परिवर्तित हो गए। उनके साथ करीब 3 लाख 65 हजार अन्य लोग भी थे। सबसे उत्पीड़ित जाति समूह के नेता के रूप में अम्बेदकर ने अपने अनुयायियों से पूछा, ‘‘आपको उस ईश्वर की पूजा क्यों करनी चाहिए जो आपको अस्वीकार करता है,  जो आपकी छाया तक देखना नहीं चाहता।’’ यह धर्मांतरण उनके राजनीतिक दृष्टिकोण, धर्मों के उनके अध्ययन और बौद्ध धर्म में विश्वास के तर्कसंगत के रूप में उभरा। 

आज अम्बेदकर अपने कार्यों के लिए जेल में जा सकते थे। धर्मांतरण को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार का हालिया अध्यादेश  कहता है कि, ‘‘बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के लिए संगठन अपना पंजीकरण खो देगा और इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।’’ स्थानीय प्रशासन को 2 महीने का नोटिस दिया जाना चाहिए जो यह तय करेगा कि आपके इच्छित कार्य कानूनी हैं या नहीं। ये धर्मांतरित और उन्हें परिवर्तित करने वाले व्यक्तियों पर प्रमाण का स्थान रखता है।

कृषि कानून की समस्याओं को सरकार भी स्वीकार करने से है डरती

अम्बेदकर की तरह सांस्कृतिक विद्वान पंडिता रामाबाई या कवि नारायण वामन तिलक जैसे मराठी ब्राह्मणों ने एक बार धर्म का अध्ययन किया और फिर राजनीतिक या आध्यात्मिक कारणों से धर्मांतरण किया। यहां तक कि उन अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों को भी यू.पी. अध्यादेश द्वारा परेशान किया जा सकता था फिर आम लोगों का क्या जो बेहतर जीवन की आशा के साथ धर्मांतरण कर सकते हैं। यदि कोई गरीब व्यक्ति शिक्षा, गरिमा और मूलभूत सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए ईसाई धर्म में परिवर्तित होता है तो यू.पी. अध्यायदेश इसे ‘प्रलोभन’ मानता है और उसे एक अपराधी में बदल देता है। 

यू.पी. अध्यादेश में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं का विशेष उल्लेख किया गया है। जिनके धर्मांतरण पर कड़ी से कड़ी सजा होगी। अम्बेदकर के बौद्ध धर्म का पालन करने वाले ज्यादातर लोग महार जाति के थे और उनमें से लगभग आधी तो महिलाएं थीं। निश्चित रूप से ये गरीबी और शिक्षा तक की पहुंच की कमी के कारण एक कमजोर आबादी है। क्या कानून को यह मान लेना चाहिए कि उनकी पसंद में कोई एजैंसी नहीं या उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि उनके लिए क्या बेहतर है?

चुनौतियों का मुकाबला करने के बाद भारत विकास की डगर पर

भारत में इस्लाम और ईसाई धर्म के आगमन के बाद से, निचली जाति के लोगों ने अपनी सामाजिक स्थिति को अस्वीकार करने तथा मनुष्य के रूप में गरिमा हासिल करने के लिए धर्मांतरण का 15वीं सदी के संत रविदास महाराज ने अपनी रचना ‘बेगमपुरा’ में ‘दुख के बिना भूमि’ का वर्णन किया।  

कबीर तथा रविदास यू.पी. में दोनों ही समकालीन थे। उस समय इस्लाम के भाईचारे और करुणा की विचारधारा ने निचली जातियों को आकृष्ट किया। उत्तर भारत में सूफी आंदोलन उदारवादी धार्मिक ताकतों के लिए चरम बिंदू पर था।

यू.पी. अध्यादेश का दूसरा मुख्य लक्ष्य मुस्लिम पुरुष हैं जो महिलाओं को धर्मांतरित कर रहे हैं। यह यहां तक यू.पी. में 1920 में भी जारी था। जैसा कि इतिहासकर चारू गुप्ता ने प्रलेखित किया है। उनके अनुसार विशेष कर जब दलित महिलाओं ने धर्मांतरण शुरू किया तथा मुस्लिम पुरुषों से शादी करनी शुरू की। उनमें दर्दनाक दैनिक जीवन से बचने की इच्छा थी। ‘चांद’ तथा ‘अभ्युदय’ जैसी पत्रिकाओं ने बहिष्कृत महिलाओं के बेहतर जीवन की वकालत की जो अन्यथा मुस्लिम पुरुषों से शादी करती हैं और गौ हत्यारों को उत्पन्न करती हैं। 

गिलगित बाल्टिस्तान की लूट और दमन निरंतर जारी

हिन्दू महासभा ने निचली जाति की महिलाओं के धर्मांतरण को रोका और उनका विवाह उच्च जाति के हिन्दू लड़कों से किया। ब्रिटिश जनगणना ने धर्म के द्वारा आबादी की गणना शुरू कर दी थी और संख्या तथा संभावित बच्चे पैदा करने वाली महिलाओं के नुक्सान को रोकने हेतु दलित महिलाएं महत्वपूर्ण हो गईं। 

असली कलह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच में नहीं है। जैसा कि डा. राम मनोहर लोहिया ने अपने सैमीनार निबंध ‘हिन्दू बनाम हिन्दू’ में लिखा, ‘‘भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा युद्ध रुढि़वादी और उदारवादी ताकतों के बीच संघर्ष को लेकर है। जो पिछले 5000 वर्षों से जारी है। कलह के मुख्य मुद्दे जाति, वर्ग, महिला और सहिष्णुता है। 

दलित महिला स्पीक आऊट (2014) 500 साक्षात्कारों के माध्यम से प्रलेखित, मौखिक, शारीरिक और यौन ङ्क्षहसा की रिपोर्ट है। उच्च जाति के अपराधियों के साथ अक्सर कानूनी प्रणाली के ठकराव के बावजूद, दलित महिला ङ्क्षहसा के खिलाफ आवाज उठाती है। जातिगत अन्याय को स्वीकार करने से इंकार करने पर वह विश्वास रखती है कि लोकतंत्र समाज के सबसे निचले पायदान पर रहने वालों के लिए भी न्याय और समानता प्रदान करता है। इस अर्थ में दलित महिलाएं भारतीय संवैधानिकता के सच्चे नागरिक के रूप में उभरती हैं।

रुढि़वादी व प्रगतिवादियों के बीच आज युवा पीढ़ी स्वतंत्र तौर पर जीना चाहती है, पुरानी पीढ़ी  नियंत्रण बनाए रखना चाहती है, महिलाएं जो अपनी पसंद खुद तय करना चाहती हैं और अपना परिवार बनाना चाहती हैं, उच्च जाति, न्याय और समानता की तलाश करती हैं और निचली जातियां न्याय और समानता को ढूंढती हैं।

अब हम इस लड़ाई की जड़ में हैं। मनु का कोड या फिर अम्बेदकर के संविधान में से हमें किसको चुनना है। (साभार टा.आई.)

- समीना दलवई

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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