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‘अमर’ होना है तो करें ‘अंगदान’

  • Updated on 12/30/2020

अमर होने के लिए अब कठोर तपस्या करने की या अमृत पीने की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने अंगों का दान करके मृत्यु के पश्चात भी अमर हुआ जा सकता है। डी.एन.ए. के रूप में अंगदान करने वाले व्यक्ति का अस्तित्व उसकी मृत्यु के बाद भी मौजूद रहेगा। उस अंग में मौजूद डी.एन.ए. एक जैनरेशन से दूसरे जैनरेशन में चलता रहेगा। अगर उस व्यक्ति के अंग चार पांच लोगों को ट्रांसप्लांट हो गए तो यह अमरता और अधिक प्रबल हो जाएगी और वह उन सभी लोगों में अपने अंगों के रूप में जीवित रहेगा। 

व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसकी यादें और अच्छी बातें ही उसे संसार में जिंदा रखती हैं किंतु अंगदान करके वह कई लोगों को नया जीवन दे सकता है और उनमें अपने अंगों के जरिए जिंदा रह सकता है। इंसानी अंगों को बनाना अभी मुमकिन नहीं हुआ है, इस पर रिसर्च चल रही है। 

वैज्ञानिकों का मानना है कि शरीर से मिलते-जुलते कुछ अंग बनाने में उन्हें सफलता मिल सकती है किंतु इसमें अभी 5 से 10 वर्ष तक का समय लग सकता है इसलिए यदि किसी रोगी का कोई अंग काम करना बंद कर देता है तो ट्रांसप्लांट के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति का अंग लगाकर उसे स्वस्थ किया जा सकता है, किंतु अभी भी लोग अंगदान करने से झिझकते हैं। इसलिए ट्रांसप्लांट के लिए अंगों का मिलना बहुत कठिन हो जाता है। 

आंखों को छोड़कर बाकी अंगों का ट्रांसप्लांट तभी संभव है जब अंगदान करने वाले व्यक्ति के दिल की धड़कनें चलती रहें, भले ही उसके ब्रेन ने काम करना बंद कर दिया हो। जब शरीर के बाकी अंग काम कर रहे हों किंतु ब्रेन ने किसी वजह से काम करना बंद कर दिया हो और फिर से उसके काम करने की संभावना भी न हो तो व्यक्ति को ब्रेन डैड माना जाता है। इसकी कई वजहें हो सकती हैं जैसे सिर में गंभीर चोट लगना, ट्यूमर या लकवे की वजह से। ब्रेन डैड और कोमा में फर्क है। कोमा से इंसान फिर से नॉर्मल हो सकता है किंतुु ब्रेन डैड होने के बाद ऐसा नहीं होता। कोमा की स्थिति में इंसान के दिमाग का कुछ हिस्सा काम कर रहा होता है, जबकि ब्रेन डैड में नहीं। इसलिए अंगदान ब्रेन डैड वाले मरीजों का ही हो सकता है कोमा के मरीजों का नहीं। 

वैसे तो अंगदान किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही होता है पर ब्रेन डैड को मौत के बराबर ही माना जाता है। जीवित व्यक्ति दो में से अपनी एक किडनी का दान कर सकता है, लिवर का एक छोटा हिस्सा भी दान किया जा सकता है। मरने के बाद सबसे ज्यादा आंखों का दान किया जाता है। अंगदान करने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती, किंतु 18 साल से 65 साल तक की उम्र में अंगदान करना सबसे बेहतर होता है। अंगदान करने से पहले कई चीजों की मैचिंग कराई जाती है। मसलन किडनी के मामले में एच.एल.ए., लिवर और हार्ट के मामले में ब्लड ग्रुप की मैचिंग कराई जाती है। हैपेटाइटिस बी और सी, एच.आई.वी. पॉजिटिव, सिफलिस और रैबीज जैसी बीमारियों से ग्रस्त मरीज अंगदान नहीं कर सकते। 

अंगदान करने वाले ब्रेन डैड व्यक्ति के शरीर के अंगों को जितनी जल्दी हो सके, निकालने की कोशिश की जाती है। अंग निकालने के 6 से 12 घंटों के अंदर ही ट्रांसप्लांट हो जाना चाहिए नहीं तो अंग ट्रांसप्लांट करने योग्य नहीं बचता। लोग मृत्यु के बाद भी अमर रहना चाहते हैं। इसके लिए कुछ लोग अपने नाम पर समाधि, सड़क, इमारतें और संस्थान बनवाते हैं। सार्वजनिक स्थानों या पार्क में अपनी प्रतिमा लगवाते हैं। पुराने जमाने में लोग अपने पूर्वजों के नाम पर धर्मशाला और मंदिर बनवाते थे। लोगों की चाहत होती है कि मृत्यु के बाद भी उनको याद रखा जाए। हालांकि अमर होने का सबसे बढिय़ा तरीका अंगदान ही है। दुनिया में याद किए जाने के लिए एक लंबे जीवन की नहीं बल्कि प्रभावशाली जीवन जीने की आवश्यकता होती है।

- रंजना मिश्रा

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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