Tuesday, Oct 19, 2021
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भारत और चीन : संबंधों के बदलते आयाम

  • Updated on 7/2/2021

चीन दुनिया के उन गिने- चुने समाजों मेंं से एक है जो एक संस्कृति के रूप में लगातार बदलते रहे हैं परन्तु अपनी विस्तारवादी राष्ट्रवाद की नीति को मूल में रखे हुए हैं। पिछले काफी समय से चीन दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। दशकों से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का एजैंडा वैज्ञानिक समाजवाद, नियोजित अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक केंद्रीयवाद के माध्यम सेे ‘प्रगति’  को एक ‘उत्पाद’ के रूप में परोस रहा है। 

‘सांस्कृतिक क्रांति’ की ‘बड़ी छलांग’ से ‘उपभोक्तावाद की जीत’ तक चीन में काफी विकास हुआ है और आज यह आर्थिक रूप से मजबूत व ताकतवर राष्ट्र है। चीनी विकास का एक दूसरा पहलू भी है जिसका मुख्य बिंदू आत्मकेन्द्रित दृष्टिकोण है। उदार मूल्यों, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए यहां कोई जगह नहीं है।

सोवियत रूस की भूमिका : वर्ष 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के गठन के तुरन्त बाद ही, माओ त्से तुंग अपनी पहली विदेश यात्रा पर जोसेफ स्टालिन से मिलने मास्को गए। ‘मैत्री’ गठबंधन और पारस्परिक सहायता की संधि ने चीनी विश्वास को बल दिया और उन क्षेत्रों विशेष रूप से मंचूरिया और शिनजियांग प्रांत के पुन: एकीकरण की राह प्रशस्त की, जो रूस द्वारा विवादित समझे जाते थे। उस समय भारत सोवियत संबंध ऐसे थे जोकि भारतीय चुप्पी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। 

जब तिब्बत पर दावा किया गया तो भी इसी कारण से भारत मुखर नहीं हो पाया। 60 के दशक में जब चीनी विस्तारवादी मंसूबों का खुलासा होना शुरू हुआ तो हमारी विस्मयकारी चुप्पी शायद पंडित नेहरू को गुट निरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में देखे जाने की हमारी इच्छा के कारण थी। लेकिन आज हम सभी जानते हैं कि यह नीति हमें महंगी पड़ी। हम न तो विश्व में अहिंसा का प्रतीक बन सके और न ही अपनी सीमाओं की रक्षा ही कर सके। 

गैर-सांस्कृतिक क्रांति : यह विड बना है कि माओ त्से तुंग ने विचारों के सौ स्कूल और सौ फूलों के खिलने की बात तो की लेकिन उन्होंने हर असहमति को बेरहमी से कुचल दिया। 1958-61 के अकाल में लाखों चीनी मारे गए और क यून्स का उत्पादन केन्द्रित ढांचा बुरी तरह विफल हुआ लेकिन बेरहम दमन जारी रहा। माओ के सहयोगियों, चाऊ एन लाई और देंग शियाओपिंग ने राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आॢथक नीतियों को फिर से परिभाषित किया। वास्तव में सांस्कृतिक क्रांति के बाद के दशक ‘संस्कृति’ से कोसों दूर थे। 

वैश्वीकरण की दुनिया में उपभोक्तावादी चीन : 1977 में देंग शियाओपिंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की बागडोर संभाली और चीन को दुनिया की कार्यशाला में बदलने के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरूआत की। माओ का लक्ष्य चार पुराने विचार, संस्कृति, रीति-रिवाज और आदतों, स्त भों को समाप्त करना था और देंग का लक्ष्य था। चार नए कृषि उद्योग, रक्षा और प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण विचारों को बढ़ावा देना। 80 के दशक से चीनी अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ने लगी तो जल्द ही वाॢषक वृद्धि दर दोहरे अंकों में पहुंच गई। हालांकि दुनिया ने चीन में राजनीतिक उत्पीडऩ की बात की लेकिन आॢथक मोर्चे पर किसी भी देश ने चीन से व्यापारिक संबंध नहीं तोड़े। कोई बहुराष्ट्रीय क पनी पीछे नहीं हटी और हमेशा की तरह कारोबार जारी रहा। 1997-98 में, राष्ट्रपति जियांग जेमिन और बिल किं्लटन ने एक-दूसरे के देशों का दौरा किया और इसके तीन साल बाद चीन को विश्व व्यापार संगठन में शामिल कर लिया गया। 

भारत की ताकत और भावी राह: 13वें दलाई लामा की अंगे्रजों के प्रति नापसंदगी का परिणाम हुआ कि चीन ने उनकी मातृभूमि पर कब्जा कर लिया। भारत के प्रति पाकिस्तानियों की नापसंदगी का परिणाम चीन के पाकिस्तान पर नियंत्रण में हो सकता है। हमारे पड़ोस में चीन की बढ़ती उपस्थिति और विशेष रूप से अफ्रीका में इसके संसाधन आधार, जहां बहुत से देश चीनी ऋण जाल में फंसते जा रहे हैं, हमारे लिए चिंता के विषय होने चाहिएं। 

विश्व स्तर पर भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्य चीन की विस्तारवादी सोच की नीति का विकल्प हो सकता है। साथ ही हमें चीनी सीमा पर रणनीतिक रूप से प्राप्त सैन्य सफलताओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही दक्षिण चीन सागर के साथ लगते अंडमान निकोबार द्वीप समूह का सामरिक फायदा लिया जा सकता है। लद्दाख सैक्टर में भारतीय सेना से चीन के प्रतिष्ठित सी.पी.ई.सी. को खतरा पैदा हुआ तो गलवान टकराव की परिस्थितियां बन गईं। इसी तरह उत्तराखंड सीमा पर भारतीय सड़क नैटवर्क से जैसे ही चीनी सीमा निर्माण को खतरा पैदा हुआ तो कालापानी सैक्टर पर नेपाल ने छद्म दावा पेश कर दिया। 

उनके गले की नस दक्षिण चीन सागर समुद्री नियंत्रण को अंडमान सामरिक कमान से खतरा है। भारतीय समुद्री संप्रभुता को भंग करने के उनके प्रयास निरंतर असफल रहे हैं। भारत सक्षम है, चीन यह अच्छी तरह जानता है लेकिन समय आ गया है कि हम भी इसे जानें और उस पर दबाव बनाए रखें। चीन उभरते हुए मजबूत भारत की ताकत को अच्छी तरह जानता है इसलिए वह लगातार शरारतपूर्ण हरकतों में शामिल रहता है। आज का भारत एक अलग राष्ट्र है, आत्मविश्वास से भरा, मजबूत और सक्षम है। यह बात चीन सहित दुनिया के अन्य देश भी जानते हैं। 

भारत को गरीबी उन्मूलन और नवाचार, प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और निवेशक अनुकूल वातावरण के माध्यम से विकास को बढ़ावा देकर अपने आॢथक दायरे को स्थानांतरित करके प्रत्येक नागरिक के जीवन स्तर को ऊपर उठाने पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। हमें भारत के कृषि और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में गंभीरता से सुधार करने की जरूरत है। भारत को 2031 तक कच्चे माल के उत्पादन का केंद्र बनना है तथा माइक्रो, चिप निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में चीन को हराना है। हमें इस महान राष्ट्र के लोगों को अपने दैनिक कार्यों में राष्ट्रवाद की भावना का प्रदर्शन करके अपना योगदान देना चाहिए। आज का भारत 60 और 70 के दशक का भारत नहीं रहा। हम चीन को उसकी दवा का स्वाद चखाने में सक्षम हैं। यह अवसर है यही वह पल है और यह भारत का युग है। नई सदी भारत की है और इन क्षणों का हमें लाभ उठाना है।

-बंडारू दत्तात्रेय(माननीय राज्यपाल हि.प्र)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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