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बेरोजगारी के 'भयावह दौर' की तरफ बढ़ता भारत

  • Updated on 5/13/2020

पहले उसकी नौकरी के मौक़े ख़त्म कर दो, उसे भूखा रहने दो, कोई राहत उस तक मत पंहुचने दो, फिर वह घर जाना चाहे तो उसे जाने मत दो, उसे रोको, उसकी पिटाई करवाओ, उसे पैदल चलने के लिए मजबूर करो और फिर कहो ट्रेन में चढ़ना है, तो पहले स्मार्टफ़ोन, डाटा, और ये ऐप लेकर आओ। उससे कहो कि अगर स्मार्टफ़ोन नहीं है मेरे प्यारे देशवासी मज़दूर भाई  तो आप अपने घर की तरफ़ जा रहे ट्रैन पर नहीं चढ़ सकते।

उधर दिल्ली पुलिस के एक डिलीट किये गये ट्वीट में विदेश से आने वाले ओरियो नाम के एक यॉर्कशायर टेरियर कुत्ते के आगमन पर वादे भारत मिशन की तरफ़ से स्वागत किया गया है। स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने भी एक डिलीट किये गये ट्वीट में कोरोना को “ब्लेसिंग इन डिसगाइस” बताया था। सरकार की तरफ़ से जितने ट्वीट कोरोना के दौरान डिलीट किये गये, शायद पहले नहीं हुए होंगे। ऐसा इसलिए हो रहा है कि वे ज़मीनी हक़ीक़त से थोड़ा दूर हो चले हैं।

कोरोना और लॉक डाउन का जबसे बड़ा नज़ला नौकरियों और रोज़गार पर झड़े रहा है इसके आंकड़े सामने आने लगे हैं। सीएमआईई (सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) की रिपोर्ट के मुताबिक़ लॉक डाउन के कारण १२.२ करोड़ लोगों ने अपने रोज़गार खोए हैं. ३.३ करोड़ तो वे लोग हैं जो ३०-४० की उम्र के बीच हैं और २०-३० के बीच नौकरी खोने वाले लोगों की संख्या २.७ करोड़ है. इन दिनों भारत की मीडियन उम्र २९ साल है। रोज़गार के मौक़ों में इतनी गिरावट शायद ही कभी आज़ाद भारत ने देखी हो।

चोट बहुत गहरी है और मरहम बहुत कम
इन दिनों जो तस्वीरें हम देखते रहे हैं, सड़कों पर लोगों के चलने की, बाहर निकल प्रदर्शन करने वालों की, घर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने की कोशिश करने वालों की, शायद उस असली संख्या से बहुत कम हैं,  जिन पर रोज़गार छिनने की चोट लगी है। भारत ने भले ही दुनिया में सबसे कड़क लॉक डाउन लगा कर कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या पर क़ाबू कर लिया हो, पर उसी का दूसरा पहलू यह भी है कि करोड़ों में नौकरियां और रोज़गार गये हैं और उनके कारण कितने घरों में फाक़ा पड़ेंगे, चूल्हे बुझे रहेंगे, इसका कोई आंकड़ा अभी नहीं है। कितने लोग इस त्रासदी से मर रहे हैं और मरते रहेंगे, इसकी गिनती कोई नहीं कर रहा है. सरकार के पास इसके लिए कोई ट्रैकर ऐप नहीं है।

अर्थव्यवस्था की सेहत पर जारी होने वाले आंकड़ों को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार कितनी तत्पर, जागरूक, जवाबदेह और पारदर्शी रही है, देश ने देखा है। पर वे ज़िंदगियां असली हैं जो इस विभीषिका से गुजर रहीं हैं। यह भी देखने वाली बात है कि ये वर्क फ़ोर्स कहां से आती है, कहां उन्हें काम मिलता है और कौन से राज्य हैं जहां बेरोज़गारी से निपटने के लिए ठीक ठाक बंदोबस्त हैं। कोरोना कुछ करे न करे शायद उन सारे झूठों को तो उघाड़ ही देगा, जिन्हें झुनझुनों की तरह बजाकर वोट बटोरे गये थे। ऐसा क्यों हो रहा है कि वे राज्य उनसे बेहतर हैं, जहां साक्षरता अधिक है, जहां मनरेगा जैसे ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम ठीक से लागू किये गये हैं, जहां विकास एक बेतरतीब मुनाफ़ाख़ोरी का नाम नहीं हैं और जहां सामाजिक परस्परता बनी रही है, जहां लोग नौकरियां छूटने पर खेतों की तरफ़ लौट सकते हैं. खेती अकेला क्षेत्र हैं जहां पहले से ज़्यादा रोज़गार मिल रहा है. जब इंडिया बैठने लगेगा, तो भारत उसे बचाएगा।

छोटे व्यापारियों और उद्यमियों का भी चौपट होता धंधा
सिर्फ़ रोज़गार नहीं गये, बचत और संपत्ति रखने वाले बड़े उद्यमियों की हालत भी ख़राब है. इस वर्ग में 23 फ़ीसदी रोज़गार कम होने का अनुमान है। ये इसलिए महत्वपूर्ण है कि कोई भी व्यापारी या उद्यमी तभी ख़ुद को बेरोज़गार बताता है जब उसे लगता है कि उसका धंधा पूरी तरह चौपट हो गया हो। इससे ये भी पता चलता है कि सिर्फ़ नौकरी करने वालों पर ही नहीं, बल्कि धंधा करने वालों पर इस लॉक डाउन से बड़ी चोट लगी है। 2019-20 में बड़े उद्यमियों की औसत संख्या 7.8 करोड़ थी. अप्रैल 2020 में वह घटकर 6 करोड़ रह गई. यानी 1.8 करोड़ लोगों का काम ख़त्म हो गया है।

सिर्फ़ खेती बाड़ी का काम कर रहे लोग इस पूरी गिरावट का अपवाद हैं।  कृषि क्षेत्र में काम कर रहे लोगों ने मार्च- अप्रैल 2020 में 5 फ़ीसदी (.6 करोड़ लोग) की बढ़ोतरी दर्ज की है। रिपोर्ट के मुताबिक़ ऐसा इसलिए हो रहा है कि शहरों में रोज़गार छूटने के बाद लोग गाँव लौट रहे हैं।
 
बेहतर हालात कहां है, बदतर कहां
सीएमआई रिपोर्ट के मुताबिक़ पंजाब बड़े राज्यों में आगे है जहां बेरोज़गारी काफ़ी कम है। पंजाब  में  जहां बेरोज़गारी 2.9% है, वहीं छत्तीसगढ़ में  3.4% है. सबसे ज़्यादा चुनौतीपूर्ण हालात तमिलनाडु (49.8%),  झारखंड (47.6%), बिहार (46.6%), हरियाणा (43.4%) और कर्नाटक (29.8%) हैं।

केरल जैसे राज्य ने - सबसे बेहतर तरीक़े से कोरोना से निपटारा किया और उनके आंकड़े पड़ोसी तमिलनाडु की तरह नहीं है, जहां कोरोना भी फैल रहा है और बेरोज़गारी की दर देश में सबसे ज़्यादा है। इसी तरह की बदहाली झारखंड, बिहार, हरियाणा और कर्नाटक में है। भारत में अब ये नया बखेड़ा खड़ा होने वाला है. जहां काम करने वाले लोग होंगे, वहां धंधे नहीं होंगे, जहां धंधे हैं वहाँ वर्कफोर्स नहीं मिलेगी। हमारी अर्थव्यव्स्था कोरोना से पहले ही उल्टे मुंह गिर रही थी।

हालात वहीं ठीक रहेंगे, जहां लोगों को स्थानीय स्तर पर रोज़गार के मौक़े मिल सकेंगे. जहां एक तरह की सामाजिक सुरक्षा रहेगी। जहां ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम ठीक से चल रहे होंगे. जहां स्वास्थ्य, साक्षरता, स्वावलंबन, उद्यमिता पर ज़ोर दिया जाएगा. जहां सरकार का पैसा सकारात्मक और उत्पादक कामों में लगेगा न कि जुमले उछालने में. मसलन देश में मनरेगा के कारण ७७ लाख रोज़गार मिलते हैं उनमें से एक चौथाई रोज़गार छत्तीसगढ़ में मिले हैं. ग्रामीण क्षेत्र में मनरेगा के ज़रिये रोज़गार के अवसर पंजाब भी अगड़े राज्यों में है. उसके बरक्स मोदी जी ने जो स्किल अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया का ऐलान अपने शुरूआती दिनों में किया था, अगर उसपर अमल भी किया होता, तो हालात थोड़े बेहतर होते. पर अब उन्हें उसी मनरेगा का सहारा लेना पड़ेगा, जिसे वे पानी पी कर कोस रहे थे। अगर केंद्रीयकृत तरीक़े से सारे समाधान मिल जाते तो न तो इतनी अफ़रातफ़री होती और न ही लोगों को इतनी तकलीफ़।

जैसे मज़दूर होना गुनाह हो गया
मसलन फंसे हुए मज़दूरों के लिए ट्रेन चलाने, उसके टिकट वसूलने की मगजपच्ची में सरकार ने पहले ऐतिहासिक अनिर्णय की मिसाल क़ायम की और फिर कांग्रेस से श्रेय छीनने की भी। भारत ने दरअसल देश के असंगठित और दिहाड़ीदार मज़दूरों को उनकी असली औक़ात बता दी। बता दिया कि उनकी भारतीयता उनके अधिकार, उनकी अहमियत दोयम दर्जे की है. घर लौटना चाहने वाले मज़दूरों को रसूखदार व्यापारी पुलिस से कहकर पकड़वा रहे हैं कि उन्हें जाने न दिया जाए। उनकी रेलगाड़ियां रुकवाई गईं। जिसके पास न खाने को रोटी है, न करने को काम, उससे कहा गया कि पहले अपने स्मार्टफ़ोन में आरोग्यसेतु डाउनलोड करो। उनसे अपराधियों की तरह बरताव किया गया जैसे बेकारी और भुखमरी में घर जाने की इच्छा करना उनका गुनाह हो। बता दिया कि श्रम की कोई गरिमा नहीं है।

ये एक न ख़त्म होता बुरा सपना है, जिसका जिम्मेदार कोरोना नहीं है, बल्कि हम में से ही वे लोग हैं जिन्हें चुना गया था सबके विकास और विश्वास के लिए. फ़िलहाल वे अपने ट्वीट डिलीट करने में लगे हैं, पर लोगों के पास उनके स्क्रीन ग्रैब हैं। वीर रस से ओतप्रोत जिन दीवारों पर बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर के नारे लिखे थे, वे दीवारें भीतर से सीली हुई, दरकी हुई और गली हुई निकल रही हैं।

- निधीश त्यागी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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