Friday, Jul 30, 2021
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is narendra modi and amit shah influence becoming weak aljwnt

क्या मोदी और शाह का प्रभाव क्षीण हो रहा है!

  • Updated on 6/22/2021

नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा इस समय जिन विकट परिस्थितियों और कठिन चुनौतियों से घिरी है कुछ महीनों पूर्व तक उसकी कल्पना नहीं थी। आप सोचिए, सामान्य परिस्थितियों में अगर पश्चिम बंगाल की मु यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के नेता दावा करते कि भाजपा के अनेक विधायक, सांसद और नेता हमारे संपर्क में हैं और वे शीघ्र पार्टी में शामिल होंगे तो भाजपा का प्रत्युत्तर कैसा होता?  मुकुल रॉय को तृणमूल से लाकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया, वे पार्टी छोड़ कर चले गए। भाजपा न तो उनको रोक सकी और न प्रतिवाद कर

ठीक प्रकार से प्रतिवाद कर रही है। यह मामला मोदी एवं अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा के चरित्र के बिल्कुल विपरीत है। ऐसा लगता है जैसे पार्टी कुछ ऐसी औषधियां ले चुकी है जिससे शारीरिक और मानसिक रूप से सुन्न की अवस्था में है। 

कर्नाटक में मुख्यमंत्री बी.एस. येद्दियुरप्पा के खिलाफ असंतोष सिर से ऊपर जाता दिखा तो केंद्र से अरुण सिंह को भेजना पड़ा। यह नौबत आनी ही नहीं चाहिए थी। उत्तर प्रदेश में केंद्रीय नेतृत्व द्वारा स्पष्ट संकेत देने के बावजूद कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कह रहे हैं कि नेतृत्व का फैसला केंद्र करेगा। 

कई अन्य पार्टियों के लिए यह सामान्य घटना हो सकती है लेकिन वर्तमान भाजपा के लिए नहीं। 2004 से लेकर 2013 के पूर्वाद्र्ध तक भाजपा में ऐसा होना कतई असामान्य नहीं माना जाता लेकिन मोदी के शीर्ष पर आने के बाद ऐसा लगा जैसे भाजपा का कायाकल्प हो गया है। न असंतोष के सार्वजनिक स्वर, न चिल्ल पों, न दिल्ली आकर केंद्रीय नेतृत्व से कोई बड़ी शिकायत, मोदी ने जिसे प्रदेश का नेतृत्व दिया उसे चाहे-अनचाहे स्वीकार किया गया। झारखंड, हरियाणा में जरूर चुनाव के समय वहां के मु यमंत्रियों का विरोध हुआ लेकिन मोदी का आभामंडल इतना बड़ा था कि किसी की सुनी नहीं गई। तो यह विचार करना पड़ेगा कि कल तक जीवंत और प्रखर पार्टी के अंदर क्या हुआ? क्या मोदी और शाह का प्रभाव क्षीण हो रहा है? 

सच कहा जाए तो मार्च तक सरकार और पार्टी दोनों स्तरों पर निशिं्चतता का माहौल था। नेतृत्व मान चुका था कि लंबे समय तक बड़ी राजनीतिक चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। हालांकि यह कहना ठीक नहीं है कि मोदी और शाह का आभामंडल पार्टी के अंदर कमजोर हुआ है या इन्हें लेकर सम्मान में कमी आई है लेकिन कोरोना के पुनरावृत्त प्रकोप तथा बंगाल चुनाव परिणाम ने नेतृत्व, सरकार और पार्टी को लेकर आम जन के साथ समर्थकों के भीतर भी धारणा, मनोविज्ञान एवं व्यवहार के स्तर पर बहुत कुछ बदल दिया है।

यह स्थिति देश के साथ विदेशों में भी है। भारत की सीमाओं से परे स पूर्ण विश्व में नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत छवि तथा सरकार के बारे में कायम धारणा पिछली कई सरकारों से ज्यादा सकारात्मक रही है। संघ, भाजपा और मोदी विरोधी शक्तियां देश के अंदर और बाहर इस पर चोट करने की लगातार कोशिश करती रहीं लेकिन उन्हें कभी अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 

कोरोना संकट के समय स्वास्थ्य ढांचे की जो विकृत तस्वीर उभरी उसने मोदी और सरकार दोनों की छवि पर गहरा आघात पहुंचाया। विरोधी स्वाभाविक इसका हरसंभव लाभ उठाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इनकी कोशिश है कि देश के अंदर कायम संतोष और घोर समर्थकों में मोदी को लेकर उत्पन्न उहापोह घनीभूत हो तथा विदेशों में भी छवि और बिगड़े। 

यह सही है या गलत इस पर दो राय हो सकती है लेकिन जब देश में विचारधारा और राजनीति की आर-पार की लड़ाई हो रही है तो विरोधी ऐसा करेंगे। आप भी ऐसा करते रहे हैं। अगर चुनाव के पहले आपने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के लिए दरवाजा खोला तो सत्ता में आने के बाद वह भी अपने तरीके से प्रतिघात करेगी। भाजपा की दृष्टि से फिर यहां यह मूल प्रश्न उठाना होगा कि आखिर कुछ महीने पहले तक व्यवस्थित राजनीति करती, राजनीतिक-वैचारिक विरोधियों पर  प्रतिघात के माध्यम से अपने समर्थकों का उत्साह बनाए रखने में सफल दिख रही तथा सत्ता नेतृत्व और पार्टी की देश और विदेश में मीडिया और सोशल मीडिया के व्यवस्थित उपयोग कर अपनी छवि बिल्कुल दुरुस्त दिखाती पार्टी से चूक कहां हो गई? 

ममता बनर्जी देश के अन्य राज्यों में भले अपनी बदौलत भाजपा को ज्यादा नुक्सान न पहुंचा पाएं, पर घोषणा के अनुरूप उन्होंने त्रिपुरा में अपनी पार्टी को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। भाजपा ने अपने जीवन काल में पहली बार किसी वामपंथी शासन को पराजित कर सरकार बनाई। कोई भी पार्टी इन परिस्थितियों का मुकाबला अपने समर्थकों व कार्यकत्र्ताओं के बल पर ही कर सकती है। भाजपा इस पायदान पर भी अत्यंत कठिन दौर से गुजर रही है। भाजपा के समर्थकों में ऐसे लोगों की सं या बहुत बड़ी है जो तथ्यों और विचारों से ज्यादा भावुकता में फैसला करते हैं।

-अवधेश कुमार

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