Friday, Apr 10, 2020
judiciary being weak strikes democracy

न्यायपालिका का ‘कमजोर’ होना लोकतंत्र पर प्रहार

  • Updated on 3/19/2020

न्याय के मूल सिद्धांतों में से एक यह है कि आरोपी को तब तक बेकसूर माना जाए जब तक कि उसका अपराध साबित नहीं हो जाता। इसका मतलब यह है कि जब तक आरोप न्याय की अदालत में बनती प्रक्रिया के द्वारा साबित नहीं हो जाते हैं तब तक सरकार उन पर न तो कोई कार्रवाई तथा न ही सजा दे सकती है। आज के दौर में यह बेहद अहम बात हो गई है और सरकारें ज्यादा से ज्यादा आलोचना के तहत असहनशील हो गई हैं। कुछ सरकारें न्याय के विपरीत उन लोगों का पीछा करती हैं जिन्होंने उसकी विचारधारा का या तो विरोध किया या फिर प्रदर्शन द्वारा अपनी आवाजें उठाईं। यह ऐसा समय भी है जब मॉब लिंचिंग की घटनाएं हो रही हैं तथा लोग न्याय देने के लिए कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं। कुछ सरकारें इसके उलट देखती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की फुल बैंच ने 2017 के ऐतिहासिक निर्णय में घोषित किया था कि निजता आर्टीकल 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। उस बैंच की अगुवाई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे.एस. केहर ने की थी तथा कहा था कि निजता का अधिकार जीवन के अधिकार तथा निजी स्वतंत्रता का एक स्वाभाविक हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार क्रूरता के लिए जानी जाती है। उसका उदाहरण उस समय देखने को मिला जब इसने यू.पी. में ङ्क्षहसा तथा प्रदर्शनों में कथित तौर पर भाग लेने वाले लोगों के चित्र तथा उनके निजी विवरण दीवारों पर चिपकाए थे। इन चित्रों तथा निजी विवरणों को सार्वजनिक स्थलों पर प्रदॢशत किया गया था ताकि उनके नाम उजागर हों तथा कथित प्रदर्शनकारियों की बदनामी हो।

हालांकि योगी सरकार का दावा है कि उसके पास ऐसे साक्ष्य हैं कि वे लोग ङ्क्षहसा में शामिल थे। हालांकि इन आरोपों को न्यायालय में साबित करना बाकी है। इस तरह सरकार ने उनको दोषी ठहरा दिया। इस तरह ऐसे लोगों पर खुले तौर पर निजी सुरक्षा के जोखिम का डर मंडराने लगा। नामों, चित्रों तथा उनके घर के पतों को सरेआम उजागर कर ये लोग गुंडों के राडार पर आ गए, जो अपनी ही विचारधारा में भरोसा करते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया तथा पुलिस की इस कार्रवाई को ‘अनुचित दखलंदाजी’ करार दिया तथा राज्य सरकार को अलोकतांत्रिक कार्रवाई के चलते लताड़ा। कोर्ट ने कहा कि यह निजता के मूल अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने सरकार को पोस्टर उतारने का आदेश दिया। हालांकि अपनी इस चूक का अनुभव करने के विपरीत राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी जिम्मेदारियों से सरकते हुए कहा कि यू.पी. सरकार की कार्रवाई कानून के दायरे में नहीं और इस मामले को बड़ी बैंच के हवाले कर दिया। यह कार्रवाई बेहद निराशाजनक रही क्योंकि निजता का अधिकार एक आम ज्ञान है तथा जो कुछ उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने किया वह बिल्कुल ही गलत था।

लोगों के चित्र को सार्वजनिक करना और भी बुरी बात
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्देशों पर स्टे नहीं किया मगर राज्य सरकार ने यह कह कर व्याख्या की कि उसे पोस्टरों को हटाने की जरूरत नहीं क्योंकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय की एक अन्य पीठ द्वारा सुना जा रहा है। राज्य सरकार अब एक कदम आगे बढ़ते हुए एक अध्यादेश लाई जिसमें उसने निजता पर हमले तथा भीड़ के न्याय को आमंत्रित करने को कानूनी जामा पहनाना चाहा। लोगों को दोषी ठहराने तथा उनके चित्र तथा निजी विवरणों को सार्वजनिक तौर पर प्रदॢशत करना और भी बुरी बात है। हाल ही के दिनों में ऐसी कुछ व्यवस्थाओं तथा निर्णयों में खामियों ने बुरी तरह से न्याय तंत्र की छवि को धूमिल किया है। पिछले कुछ दिनों में न्यायपालिका ने अलग नजरिए से देखा जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का बुरी तरह से हनन हो रहा था।

धुंधले दौर से गुजर रही न्यायपालिका
देश के इतिहास में न्यायपालिका निश्चित तौर पर एक सबसे धुंधले दौर से गुजर रही है। इसने उस समय ऐसा उतावलापन तथा अनुपालन दिखाया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंदरूनी आपातकाल घोषित किया था। कुछ अलग तरीकों में शायद कुछ न्यायाधीशों का व्यवहार ज्यादा बुरा दिखाई दिया। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई द्वारा सेवानिवृत्त होने के 4 माह के बाद राज्यसभा की सीट स्वीकारना यह दर्शाता है कि न्यायपालिका में कुछ गलत चल रहा है। उनका व्यवहार तथा एकतरफा निर्णय जगजाहिर है। उन्होंने एक परेशान तथा निराशाजनक विरासत छोड़ी। उनकी सेवानिवृत्ति के बाद कुछ लोगों ने राहत की सांस ली होगी और सोचा होगा कि बुरा दौर खत्म हुआ क्योंकि नागरिकों के लिए न्यायपालिका उम्मीद की अंतिम किरण है, उसका कमजोर होना लोकतंत्र पर प्रहार है।
 

 


 


 

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